भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1101

आठवाँ अध्याय 8/68 ] 'आरोप-सिद्धा भक्ति'—जिसमें कृष्णकी प्रीति-विषयक कोई क्रिया न हो, परन्तु अपने उद्देश्यकी सिद्धिके लिये भगवान्में कर्मार्पण आदि किये जाँय, वह आरोप-सिद्धा भक्ति है। यह कर्मादि-रूपा है। (1) राजा हरिश्चन्द्रकी सत्यवादिता प्रसिद्ध है, परन्तु उन्होंने देहमें आत्माभिमान होनेके कारण शरीरको ही सत्य और अपने दानको ही भगवद्भक्ति मान लिया था। यही आरोप सिद्धा-भक्ति है। यह वर्णाश्रम धर्मके अन्तर्गत है और इसके द्वारा अधिकाधिक स्वर्गकी प्राप्ति हो सकती है। (2) दधीचि ऋषिने योगबलसे अपनी अस्थियोंका दान दिया, जिससे वज्र बनाया गया। इसमें शुद्धभक्तिकी कोई भी क्रिया नहीं है; योगके द्वारा भक्ति आरोपित हुई है। इसकी गति महर्लोकसे ऊपर नहीं है। (3) महाराज शिविने कबूतरकी रक्षाके लिये अपने मांसका दान किया। इसमें कृष्णसेवाका कोई भाव नहीं है, यह मात्र एक पुण्य कर्म है, यह फलस्वरूप स्वर्ग तक प्रदान कर सकता है। इन सभी उदाहरणोंमें श्रवण, कीर्तन, स्मरणादि भक्तिके अनुष्ठानकी कोई भी क्रिया नहीं है। अपने शरीरको ही श्रेष्ठ मानकर उसकी यातना सहन की गयी है। इन कर्मोंके मध्य जो भक्ति निहित है, उसके द्वारा ही स्वर्गादिकी प्राप्ति सम्भव होती है। यदि कर्ममें भक्ति न हो, तो वह कर्म भी निष्फल होता है, जैसे (मध्यलीला 24/87)— 'भक्ति बिनु कौन साधन दिते नारे फल। सब फल देय भक्ति स्वतन्त्र प्रबल॥' अर्थात् “भक्तिके बिना कोई भी साधन फल प्रदान नहीं कर सकता, किन्तु भक्ति अन्यान्य साधनोंकी अपेक्षासे रहित स्वतन्त्र तथा बहुत बलशाली है।" इन सभी प्रकारकी बिद्धा-भक्तिमें भक्ति मिश्रित अवश्य रहती है, किन्तु उसके परिणाममें भक्ति नहीं होती और न ही भगवत्-सेवा होती है। 'सङ्गसिद्धा भक्ति'—जहाँ भक्ति न होकर भक्तिके अङ्ग-रूपी दान, वैराग्य, ज्ञान आदिकी प्रधानता हो, वह सङ्गसिद्धा भक्ति कहलाती है। अधिकतर लोग इसीको शुद्धभक्ति समझ लेते हैं; विशेषकर स्मार्त्त-सम्प्रदायके अनुयायी इसीका अनुष्ठान करते हैं। भागवत (11/23)में कहा गया है—'सर्वप्रथम देह एवं दैहिक सम्बन्ध यथा—सन्तान आदिसे अनासक्त होना सीखें, फिर भगवान्के भक्तोंसे प्रेम करना सीखें। इसके पश्चात् प्राणियोंसे यथायोग्य मैत्री, दया और विनयकी शिक्षा लें।' ये सब ज्ञान-कर्म आदिके अङ्ग-समूह हैं, भक्ति नहीं है। भक्तिका उदय होनेसे ये सब लक्षण स्वतः ही प्रकट हो जाते हैं, इनका पृथक् रूपसे अनुशीलन करनेसे भक्तिमें कोई लाभ नहीं है। जीवोंपर दया करना सात्त्विक वृत्ति है। भरत महाराज युवावस्थामें राज-पाट, वैभव, परिवारको त्यागकर वनमें भगवद्भजन करने लगे। किन्तु एक हिरण-शावककी रक्षाकर उसका लालन-पालन करनेके कारण उसमें आसक्त हो गये और हिरणका स्मरण करते हुए ही उन्होंने देह-त्याग किया। इस कारण उन्हें अगला जन्म हिरणका मिला। परन्तु पूर्व जन्मकी प्रबल सुकृतिके कारण उन्हें अपना पूर्व इतिहास स्मरण रहा और उससे अगला जन्म जड़ भरतके रूपमें हुआ। सात्त्विक दयाके कारण उनको दो और जन्म ग्रहण करने पड़े। इसके अतिरिक्त केवल श्रीकृष्णके शरणागत होना भी भक्ति नहीं, अपितु वह भक्तिका द्वार-मात्र है। 'स्वरूप-सिद्धा भक्ति'—जिस अनुष्ठानके द्वारा भक्ति स्वतः ही निरूपित हो और उसमें श्रीकृष्णके प्रति अनुकूल रूपमें तैलधारावत् अविच्छिन्न-गतिसे वैष्णवोंके आनुगत्यमें अनुशीलन हो, उसे स्वरूप-सिद्धा भक्ति कहते हैं। भागवत (7/5/23-24)— “श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥ इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा। क्रियते भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम्॥” । 253