श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1095, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय 8/60-62 ] समझना चाहिये कि वैदिक कर्म भी जिस किसी भी देवता या सङ्कल्पके साथ क्यों न हो, केवल स्मार्त्तोंकी भाँति 'श्रीकृष्णाय समर्पणमस्तु'– यह मन्त्र पढ़नेसे ही समर्पण हो जायेगा। दुर्योधनकी भाँति आसुरी बुद्धिवाले कहते हैं कि 'मेरे पाप इत्यादि जो भी हैं, आप करवानेवाले हैं। मैं निमित्त मात्र हूँ और आप मूल हैं।' यह ठीक नहीं है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्त्ती ठाकुर 'यत्करोषि' श्लोककी टीकामें कहते हैं—कर्मी केवल वैदिक कर्मोंको भगवान्को अर्पित करते हैं, वह भी इसलिये कि उनकी कर्मकी कामना विफल न हो जाय। किन्तु भक्तगण 'भगवान् ही मेरे प्रभु हैं'– ऐसी भावनाकर अपने लौकिक, वैदिक, दैहिकादि समस्त कर्मोंको भगवान्की प्रीतिके लिये ही उनके चरणोंमें समर्पित करते हैं। दोनोंमें यही महान पार्थक्य है। इसलिये महाप्रभुने इसे बाह्य कहा है।"- श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 60 ॥ (3) केवल फलभोग-त्याग या नैष्कर्म्य शुद्धभक्ति नहीं :– प्रभु कहे, - "एहो बाह्य, आगे कह आर।" राय कहे, - "स्वधर्म-त्याग, - एइ साध्य-सार ॥" 61 ॥ अनुवाद–कर्मार्पणकी बात सुनकर महाप्रभुने कहा, - "यह भी बाहरकी बात है, इससे आगे कुछ और बतलाओ।" तब श्रीरामानन्द रायने कहा, - "स्वधर्मका त्याग ही सभी साध्योंका सार है॥" 61 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कर्मार्पणकी बात सुनकर भी महाप्रभुने कहा, - यह भी बाहरी है, मेरे प्रश्नका उत्तर इसके भी आगे है, उसे बोलो। उसके उत्तरमें श्रीरायने कहा, - स्वधर्म-त्याग ही साध्यसार है, अर्थात् चारों वर्णोंमेंसे ब्राह्मण अपने (गृह) धर्मको त्याग करके संन्यास ग्रहण करता है एवं अन्य सब वर्ण उसके अनुसार वैराग्य-लक्षण ग्रहण करके गृहत्याग करते हैं। इस संन्यासका नाम स्वधर्मत्याग अथवा कर्मत्याग है। त्यागधर्मसे हरिको प्रसन्नता प्राप्त होती है ॥ 61 ॥ अनुभाष्य– 'मदर्पण'-शब्दसे यद्यपि जड़-निर्विशेषको छोड़कर स्वतन्त्र सविशेषतत्त्व-स्वरूप श्रीकृष्णको ही अर्पण करना समझा जाता है, तथापि साधककी मैं और मेरेपनकी उपलब्धि ब्रह्माण्डके अन्तर्गत है एवं साधनकी वृत्ति भी ब्रह्माण्डके अन्तर्गत है, इसलिये यह भी बाहरी है। अर्थात् कर्मी जीव अपनी बाहरी-अनुभूतिसे किये गये बाहरी-कर्मोंको श्रीकृष्णको प्रदान करनेका उपदेश-मात्र प्राप्त कर रहे हैं। तब श्रीरामानन्द इस भावका शोधन करके कर्मोन्नत जीवको जिस प्रकारकी उन्नति करनी होती है, उसी भावके अनुरूप होकर स्वधर्म त्यागके द्वारा जो साध्य प्राप्त होता है, ऐसा प्रमाण कहा ॥ 61 ॥ वर्णाश्रमरूप स्वधर्म-त्याग करके हरिभजन :– श्रीमद्भागवत (11/11/32) – आज्ञायैवं गुणान् दोषान्मयादिष्टानपि स्वकान्। धर्मान् संत्यज्य यः सर्वान् मां भजेत् स सत्तमः ॥ 62 ॥ अनुवाद–अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 62 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-धर्मशास्त्रोंमें मुझ भगवान्ने जिनको 'धर्म' कहकर आदेश किया है, उनके गुण-दोषका विचार करके, उन सभी प्रकारके धर्मोंकी प्रवृत्तिको छोड़कर जो मेरा भजन करते हैं, वे ही सबसे श्रेष्ठ (साधु) हैं ॥ 62 ॥ अनुभाष्य–जब उद्धवजीने भगवान्के प्रिय साधुओंके लक्षण जाननेकी अभिलाषा दिखलायी, तब उसके उत्तरमें श्रीभगवान्ने कहा– यः (साधकः) गुणान दोषान् (प्राकृत-सदसद्भावादीन्) आज्ञाय (ज्ञात्वा) अपि मया (वैदिककर्मोपदेशकेन) [कर्मरतान्] आदिष्टान् (उपदिष्टान्) सर्वान् स्वकान् धर्मान् (लौकिक- विप्रक्षत्रियवैश्यशूद्र-वर्णधर्मान् ब्रह्मचारिगृहस्थवानप्रस्थ- संन्यासाद्याश्रमधर्मांश्च) संत्यज्य (दूरे सम्यक् विहाय) मां (विशेषतत्त्वाश्रयं स्वतन्त्रं भगवन्तं कृष्णं) भजेत्, स तु सत्तमः (साधूनां श्रेष्ठः)। श्लोक-भावानुवाद–अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 62 ॥ । 247