भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1087

आठवाँ अध्याय 8/22-33 ]

अनुवाद—तब महाप्रभुने श्रीरामानन्द रायका दृढ़तापूर्वक आलिङ्गन किया। दोनों ही अर्थात् स्वामी और दास प्रेमावेशमें मूर्च्छित हो गये। दोनोंके हृदयमें स्वाभाविक प्रेम उदित हो गया। दोनों ही एक-दूसरेको आलिङ्गन करके पृथ्वीपर गिर पड़े। दोनोंके ही श्रीअङ्गोंमें स्तम्भ, स्वेद, अश्रु, कम्प, पुलक और वैवर्ण्य आदि प्रेमके अष्ट-सात्त्विक विकार उदित होने लगे। दोनोंकी वाणी गद्गद हो गयी। दोनों ही 'कृष्ण-कृष्ण' उच्चारण करने लगे॥ 22-24॥

अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीराधाकृष्णका विशाखा-सखीके प्रति और विशाखा-सखीका श्रीराधाकृष्णके प्रति जो स्वाभाविक प्रेम है, वही उदित हुआ॥ 23॥

उनके दर्शनसे ब्राह्मणोंका विस्मय और उनका विचार :- देखिया ब्राह्मणगणेर हैल चमत्कार। वैदिक ब्राह्मण सब करेन विचार॥ 25॥ 'एइ त' संन्यासीर तेज देखि' ब्रह्मसम। शूद्रे आलिङ्गिया केने करेन क्रन्दन॥ 26॥ एइ महाराज-पात्र पण्डित, गम्भीर। संन्यासीर स्पर्शे मत्त हइला अस्थिर॥' 27॥

अनुवाद—श्रीरामानन्द रायके साथ आये हुए वैदिक ब्राह्मणोंको इस मिलनको देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ और वे मनमें विचार करने लगे,—'इन संन्यासीका तेज तो ब्रह्मके समान है, परन्तु ये इस शूद्रका आलिङ्गन करके रो क्यों रहे हैं? और दूसरी ओर ये महाराज (श्रीरामानन्द राय) महापण्डित एवं गम्भीर होनेपर भी संन्यासीके स्पर्शसे उन्मत्तकी भाँति चञ्चल क्यों हो गये हैं?' यही उन ब्राह्मणोंके विस्मयका कारण था॥ 25-27॥

महाप्रभुके द्वारा भाव-वेगका सम्वरण :- एइमत विप्रगण भावे मने मन। विजातीय लोक देखि' प्रभु कैल सम्वरण॥ 28॥

अनुवाद—इस प्रकार वे ब्राह्मण मनमें महाप्रभु और श्रीराय रामानन्दके बारेमें चिन्तन करने लगे। महाप्रभुने उन ब्राह्मणोंको विजातीय जानकर अपने भावोंको सम्वरण कर लिया॥ 28॥

अनुभाष्य—'विजातीय लोक'—श्रीरामानन्द महाप्रभुके स्वजातीय आशय (अन्तःकरण) वाले अन्तरङ्ग-भक्त थे, किन्तु श्रीरामानन्दके साथ आये हुए ब्राह्मणादि कर्ममें निष्ठा रखनेवाले थे। अन्तरङ्ग-भक्त होनेकी बात तो दूर, वे शुद्धभक्त भी नहीं थे, इसलिये वे विजातीय अर्थात् अभक्त थे। परस्परकी प्रीति प्रकाशित होनेपर भी कर्मियोंको बहिर्मुख जानकर उन्होंने अपने भावोंको छिपा लिया॥ 28॥

महाप्रभुके द्वारा अपने आनेके कारणका वर्णन :- सुस्थ हञा दुँहे सेइ स्थानेते बसिला। तबे हासि' महाप्रभु कहिते लागिला॥ 29॥ "सार्वभौम भट्टाचार्य कहिल तोमार गुणे। तोमारे मिलिते मोरे करिल यतने॥ 30॥ तोमा मिलिबारे मोर एथा आगमन। भाल हैल, अनायासे पाइलुँ दरशन॥" 31॥

अनुवाद—तब दोनों अपने-अपने भावोंको सम्वरण करके बाह्यावस्थामें आकर सुस्थिर होकर उसी स्थान पर बैठ गये। तब महाप्रभु मुस्कुराते हुए कहने लगे,—"सार्वभौम भट्टाचार्यने मुझे आपके गुणोंके विषयमें बतलाया था और आपसे मिलनेके लिये उन्होंने बहुत आग्रह किया था। मैं आपसे मिलनेके लिये ही यहाँ आया हूँ। बहुत अच्छा हुआ, जो अनायास ही आपका दर्शन प्राप्त हो गया॥" 29-31॥

श्रीरायकी दीनता और उनके द्वारा महाप्रभुकी स्तुति :- राय कहे,—"सार्वभौम करे भृत्य-ज्ञान। परोक्षेह मोर हिते हय सावधान॥ 32॥ ताँर कृपाय पाइनु तोमार दरशन। आजि सफल हैल मोर मनुष्यजनम॥ 33॥

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