श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 8/10-24 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला उन्होंने गोदावरीको पार करके उस पार तटपर स्नान किया। स्नान करनेके बाद घाटसे कुछ दूर जलके निकट ही बैठकर महाप्रभु श्रीकृष्णनामका सङ्कीर्तन करने लगे॥ 10-13॥ स्नानके लिये श्रीराय-रामानन्दका वहाँपर आगमन :- हेनकाले दोलाय चड़ि' रामानन्द राय। स्नान करिबारे आइला, बाजना बाजाय॥ 14॥ ताँर सङ्गे बहु आइला वैदिक ब्राह्मण। विधिमते कैल तेंहो स्नानादि-तर्पण॥ 15॥ अनुवाद—उसी समय पालकीपर चढ़कर स्नान करनेके लिये श्रीरामानन्द राय वहाँ आये। साथमें उनके आगमनकी सूचना देनेके लिये बाजे बज रहे थे। उनके साथ बहुतसे वैदिक ब्राह्मण भी आये थे। श्रीरामानन्द रायने विधिपूर्वक स्नान-तर्पणादि किया॥ 14-15॥ श्रीरामानन्दके साथ मिलनके लिये महाप्रभुकी व्यग्रता :- प्रभु ताँरे देखि' जानिल—एइ रामराय। ताँहारे मिलिते प्रभुर मन उठि' धाय॥ 16॥ अनुवाद—उन्हें देखते ही महाप्रभु समझ गये कि ये श्रीरामानन्द राय हैं। उनसे मिलनेके लिये महाप्रभुका मन अति उत्कण्ठित हो उठा॥ 16॥ महाप्रभुके पास श्रीरामानन्दका आना :- तथापि धैर्य धरि' प्रभु रहिला बसिया। रामानन्द आइला अपूर्व संन्यासी देखिया॥ 17॥ अनुवाद—महाप्रभु हृदयमें मिलनेके लिये उत्कण्ठित होनेपर भी धैर्य धारण करके वहीं बैठे रहे। तब श्रीरामानन्द राय घाटसे कुछ दूर एक अद्भुत और अति सुन्दर संन्यासीको देखकर उनके निकट आये॥ 17॥ महाप्रभुके रूपदर्शनसे श्रीरायका विस्मय और दण्डवत्-प्रणाम :- सूर्यशत-सम कान्ति, अरुण वसन। सुवलित प्रकाण्ड देह, कमल-लोचन॥ 18॥ देखिया ताँहार मने हैल चमत्कार। आसिया करिल दण्डवत् नमस्कार॥ 19॥ अनुवाद—महाप्रभुकी अङ्गकान्ति सैकड़ों सूर्योंके समान देदीप्यमान थी। उन्होंने अरुण (गेरुआ) वस्त्र धारण कर रखा था। उनका सुगठित और विशाल शरीर था तथा नेत्र कमलके समान थे। उन्हें देखकर श्रीरामानन्द रायके मनमें बड़ा ही चमत्कार हुआ और उन्होंने निकट आकर महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया॥ 18-19॥ आलिङ्गनके लिये उत्सुक महाप्रभुका धैर्य, श्रीरायको उठाना और नाम जिज्ञासा :- उठि' प्रभु कहे,—उठ, कह 'कृष्ण' 'कृष्ण'। तारे आलिङ्गिते प्रभुर हृदय सतृष्ण॥ 20॥ तथापि पूछिल,—“तुमि राय रामानन्द?” तेंहो कहे,—“हङ मुञि दास शूद्र मन्द॥” 21॥ अनुवाद—उनको प्रणाम करते देख महाप्रभु उठ खड़े हुए और कहने लगे—उठिये, उठिये, 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहिये। महाप्रभुका हृदय उनका आलिङ्गन करनेके लिये आतुर हो रहा था। यद्यपि महाप्रभुने उनको पहचान लिया था, तथापि उन्होंने उनसे पूछा,—“क्या आप राय रामानन्द हैं?” श्रीरामानन्द रायने दीनतापूर्वक उत्तर दिया,—“हाँ, मैं दुर्भागा शूद्र आपका दास हूँ॥” 20-21॥ परिचय सुनने मात्रसे महाप्रभुके द्वारा श्रीरायका आलिङ्गन और दोनोंका प्रेम :- तबे तारे कैल प्रभु दृढ़ आलिङ्गन। प्रेमावेशे प्रभु-भृत्य, दोँहे अचेतन॥ 22॥ स्वाभाविक प्रेम दोँहार उदय करिला। दुँहाके आलिङ्गिया दुँहे भूमिते पड़िला॥ 23॥ स्तम्भ, स्वेद, अश्रु, कम्प, पुलक, वैवर्ण। दुँहार मुखेते शुनि' गदगद 'कृष्ण' वर्ण॥ 24॥ 238 ।