श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय ८/३-१३ ] पद्मा हैं। वे पद्माके रूपमें नृसिंहदेवकी सेवाका वैचित्र्य प्रकाशित कर रही हैं। उसके रसास्वादनकी अभिलाषा महाप्रभुके हृदयमें जाग्रत हो उठी। उसका ही तब महाप्रभुने आस्वादन किया। इस मनोरथके पूर्ण होनेपर वे नृत्य-कीर्तन करने लगे। दक्षिण भारतमें महाप्रभु मीनाक्षी देवी, कन्याकुमारी आदि अनेक देवालयोंमें गये। वहाँ भावावेशमें उन्होंने नृत्य किया। वे अन्य देवी-देवताओंको भगवान्के परिकरके रूपमें दर्शन करते थे और भावाविष्ट हो जाते थे।"—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी॥ ३-५॥ श्रीनृसिंह अभक्तोंके लिये कठोर और भक्तोंके लिये कोमल :— भागवत (७/९/१)-टीकामें श्रीधरस्वामि-उद्धृत आगमवचन— उग्रोऽप्यनुग्र एवायं स्वभक्तानां नृकेशरी। केशरीव स्वपोतानामन्येषामुग्रविक्रमः ॥ ६॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ ६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सिंह जिस प्रकार उग्र (हिंसक) होनेपर भी अपनी सन्तानके प्रति हिंसक नहीं होता, उसी प्रकार श्रीनृसिंहदेव हिरण्यकशिपु आदि असुरोंके प्रति उग्र होनेपर भी प्रह्लादादि अपने भक्तोंके प्रति स्नेहपूर्ण होते हैं॥ ६॥ अनुभाष्य— अन्येषां (स्वपाल्यशावकाभिन्नानां गज-व्याघ्रादीनां सम्बन्धे) उग्रविक्रमः (प्रचण्डपराक्रमः) स्वपोतानां (निजशावकानां सम्बन्धे) शान्तः केशरी (सिंह) इव अयं नृकेशरी (नृसिंहदेवः) उग्रं (प्रचण्डविक्रमः) अपि स्वभक्तानां (निजपाल्यदासानां सम्बन्धे) अनुग्रः (शान्तः कोमलः वत्सलः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ ६॥ एइमत नाना श्लोक पड़ि' स्तुति कैल। नृसिंह-सेवक माला-प्रसाद आनि' दिल॥ ७॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने अनेक श्लोकोंके द्वारा श्रीनृसिंह भगवान्की स्तव-स्तुति की। श्रीनृसिंहदेवके सेवकने महाप्रभुके भाव देखकर उन्हें प्रसाद और माला लाकर दी॥ ७॥ सिंहचलमें रात्रिवास :— पूर्ववत् कोन विप्रे कैल निमन्त्रण। सेइ रात्रि ताँहा रहि' करिला गमन॥ ८॥ अनुवाद—पहलेकी भाँति किसी ब्राह्मणने आकर महाप्रभुको निमन्त्रण दिया। उस रात महाप्रभु वहीं रहे और अगले दिन वहाँसे गमन किया॥ ८॥ प्रातःकाल पुनः यात्रा :— प्रभाते उठिया चलिला प्रेमावेशे। दिग्विदिक् नाहि ज्ञान रात्रि-दिवसे॥ ९॥ अनुवाद—प्रभातमें उठकर महाप्रभु प्रेमावेशमें आगे चलने लगे। उन्हें न तो दिशा-विदिशाका और न ही रात-दिनका ज्ञान रहता था॥ ९॥ गोदावरीके तटपर आगमन और यमुनाकी उद्दीपन्ना :— पूर्ववत् 'वैष्णव' करि' सर्व लोकगणे। गोदावरी-तीरे प्रभु आइला कतदिने॥ १०॥ गोदावरी देखि' हइल 'यमुना'-स्मरण। तीरे वन देखि' स्मृति हैल वृन्दावन॥ ११॥ सेइ वने कतक्षण करि' नृत्य-गान। गोदावरी पार हञा ताँहा कैल स्नान॥ १२॥ घाट छाड़ि' कतदूरे जल-सन्निधाने। बसि' प्रभु करे कृष्णनाम-सङ्कीर्त्तने॥ १३॥ अनुवाद—पहलेकी भाँति सभी लोगोंको वैष्णव बनाते हुए महाप्रभु कुछ दिनों बाद गोदावरी नदीके तटपर पहुँचे। गोदावरीको देखकर उन्हें 'यमुना'का स्मरण हो आया और गोदावरीके तटपर स्थित वनको देखकर उन्हें श्रीवृन्दावनकी स्फूर्ति हो आयी। उन्होंने गोदावरीको यमुना और वहाँके वनको वृन्दावन समझा। उस वनमें कुछ समय तक नृत्य-गान करनेके बाद । २३७