भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1084

[ 8/3-5 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला करती हैं, जिनके वक्षस्थलपर लक्ष्मी वास करती हैं और हृदयमें चेतनाकी दैवीशक्ति निवास करती हैं, उन श्रीनृसिंहदेवकी मैं वन्दना करता हूँ॥"३-५॥ अमृताणुकणिका- "'पूर्व्वरीते' अर्थात् (महाप्रभुने) यथापूर्व सबको अपने नृत्य-गीत और विचारोंसे वैष्णव बनाया। "एमन दयालु प्रभु नहे त्रिभुवने। कृष्णप्रेम जन्माय याँर दूर दरशने॥" अर्थात् “महाप्रभुके समान दयालु तीनों जगत्में कोई नहीं है, उनके दूरसे ही दर्शन करनेसे श्रीकृष्णप्रेम हृदयमें उत्पन्न हो जाता है।" यहाँ तक कि उन्होंने झारखण्डके जङ्गलोंमें बाघ- सिंह-भालू आदि हिंसक पशुओंको भी प्रेम प्रदान किया। महाप्रभुका आदेश है (मध्यलीला 7/128)- "यारे देख, तारे कह 'कृष्ण'-उपदेश। आमार आज्ञाय गुरु हञा तार' एइ देश॥" अर्थात् "जिसे देखो, उसे ही श्रीकृष्णनाम करनेका उपदेश दो। मेरी आज्ञासे गुरु बनकर तुम इस देशका उद्धार करो।" (अन्त्यलीला 4/102) में कहा है- "आपने आचारे केह, ना करे प्रचार। प्रचार करेन केह, ना करे आचार॥" अर्थात् “कोई व्यक्ति स्वयं तो आचरण करते हैं, किन्तु प्रचार नहीं करते तथा अन्य कोई व्यक्ति प्रचार तो करते हैं, किन्तु आचरण नहीं करते।" पहले स्वयं आचरण करके उसके बाद प्रचार भी अवश्य करना चाहिये। आचार और प्रचार-दोनों ही आवश्यक हैं। केवल प्रचार करना कर्मकाण्ड है, इसलिये प्रचारके साथ आचरण भी आवश्यक है। प्रचार भी भक्ति है। महाप्रभुके अनुगत श्रीरूप गोस्वामी-सनातन गोस्वामीसे लेकर शिष्य-परम्परामें श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती प्रभुपाद, हमारे गुरुदेव श्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज, श्रीभक्तिवेदान्त स्वामी महाराज आदि सभी आचार्योंने स्वयं आचरण किया और उसीका प्रचार भी किया। ऐसे भक्तोंका ही जीवन उच्च कोटिका है। इन्हींका सङ्ग करना चाहिये। जो संसारमें अनासक्त, निर्मल चरित्रवान्, भगवद्-कथामें निपुण, समस्त संशयोंका छेदन करने वाले हों-ऐसे वैष्णवोंके सङ्गमें उनसे हरिकथा सुननेपर हृदयमें भक्ति प्रकाशित होती है। महाप्रभुने सर्वत्र प्रेमका प्रचार करते हुए विशेष- विशेष लोगोंको 'अनर्पितचरीं चिरात्' का भाव भी दिया और अपने दर्शनसे लोगोंको प्रेम-रसमें निमग्न किया। महाप्रभु चलते हुए 'जियड़ नृसिंह' क्षेत्रमें पहुँचे। यहाँ श्रीनृसिंहदेवका मन्दिर एक पर्वतपर अवस्थित है। ऐसा कहा जाता है कि श्रीनृसिंहदेवके इन श्रीविग्रहने जियड़ नामक एक भक्तपर विशेष कृपा की थी, इसलिये वे 'जियड़ नृसिंह'के नामसे प्रसिद्ध हैं। महाप्रभुने श्रीनृसिंह भगवान्के दर्शन किये और अनेक प्रकारसे नृत्य-गीत-स्तुति आदि की। पूर्वपक्ष यहाँ प्रश्न उठाते हैं कि राधाभावमें आविष्ट महाप्रभु श्रीकृष्णके ही नाम, रूप, गुण, लीला आदिका आस्वादन करना चाहते हैं, परन्तु यहाँ श्रीनृसिंहका जयगान करके स्तुति कर रहे हैं और असाधारण रूपसे प्रेमाविष्ट हो रहे हैं। इसका उत्तर यह है कि श्रीनृसिंहदेव या भगवान्के सभी अवतार श्रीकृष्णसे भिन्न नहीं हैं, श्रीकृष्ण ही हैं। सभी अवतारोंमें एक-एक रस वैचित्री है। श्रीरामचन्द्रमें वात्सल्य और ऐश्वर्य मिश्रित सख्य भी है। उनकी लीला करुण-रससे परिपूर्ण है। श्रीजयदेव गोस्वामीने श्रीगीतगोविन्दमें दशावतार स्तोत्रमें श्रीकृष्णके प्रत्येक रसके अधिष्ठानरूप एक-एक अवतारका जयगान किया है। राधाभावद्युति सुवलित श्रीगौरहरि श्रीकृष्ण ही हैं। वे अखिलरसामृतमूर्ति अपने अन्दर अनन्त रस-वैचित्री धारण किये हुए हैं। ऐसा कोई भी रस नहीं है जिसका महाप्रभु आस्वादन नहीं कर सकते। श्रीनृसिंह प्रह्लादके ईश हैं और अपनी वक्ष-विलासिनी लक्ष्मीदेवी पद्माके मुखकमलका भृङ्गके समान आस्वादन करते हैं। श्रीराधा ही आंशिक रूपमें 236 ।