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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1088

[ 8/32-40 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

सार्वभौमे तोमार कृपा,—तार एइ चिह्न। अस्पृश्य स्पर्शिले हञा ताँर प्रेमाधीन ॥ 34 ॥ काँहा तुमि—साक्षात् ईश्वर नारायण। काँहा मुजि—राजसेवक विषयी शूद्राधम ॥ 35 ॥ मोर स्पर्शे ना करिले घृणा, वेदभय। मोर दर्शन तोमा वेदे निषेधय ॥ 36 ॥ तोमार कृपाय तोमाय कराय निन्द्यकर्म। साक्षात् ईश्वर तुमि, के जाने तोमार मर्म ॥ 37 ॥ आमा निस्तारिते तोमार इँहा आगमन। परम दयालु तुमि पतित-पावन ॥ 38 ॥ महन्त-स्वभाव एइ तारिते पामर। निज कार्य नाहि तबु यान तार घर ॥ 39 ॥

**अनुवाद—**श्रीरामानन्द रायने कहा,—“श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य प्रत्यक्ष रूपसे मुझे अपना एक दास मानते हैं और परोक्ष रूपसे अर्थात् पीछेसे मेरे हितके लिये सजग रहते हैं। उनकी कृपासे ही आज मैंने आपके चरणोंका दर्शन पाया है। आपका दर्शनकर आज मेरा मनुष्य-जन्म सार्थक हो गया। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यपर आपकी कितनी कृपा है, यह उसका ही प्रमाण है कि उनके प्रेमके अधीन होकर आपने मुझ जैसे अस्पृश्यको भी स्पर्श किया है। कहाँ तो आप साक्षात् ईश्वर नारायण हैं और कहाँ मैं राजसी वस्तुओंका उपभोगी, विषयोंका भोग करनेवाला अधम शूद्र। मुझ जैसे व्यक्तिका तो दर्शन भी आप जैसे संन्यासियोंके लिये निषिद्ध है, परन्तु आपको वेद-आज्ञा भङ्ग करनेका भय नहीं हुआ और मुझे स्पर्श करनेमें कोई घृणाका अनुभव भी नहीं किया। आपकी कृपा ही आपसे ऐसा निन्दित कार्य करवाती है। आप साक्षात् ईश्वर हैं, किन्तु भक्तिके वशमें हैं, आपके मर्मको भला कौन जान सकता है? आप परम-दयालु तथा पतित-पावन हैं, इसलिये मेरा उद्धार करनेके लिये ही आपका यहाँ आगमन हुआ है। आप अपने महान् स्वभावसे ही पतितोंका उद्धार करते रहते हैं। आपका अपना कोई कार्य अर्थात् स्वार्थ नहीं रहनेपर भी जीव-कल्याणके लिये आप घर-घर घूमते रहते हैं॥ 32-39 ॥

**अमृतप्रवाह भाष्य—**श्रीरामानन्द रायने कहा,— श्रीसार्वभौम मुझे अपना दास समझकर परोक्षमें भी अर्थात् मेरी अनुपस्थितिमें भी मेरे हितकी चेष्टा करते हैं॥ 32 ॥

अनुभाष्य—'सावधान'—उद्योगी (चेष्टा करनेवाले)। श्रील राय रामानन्दके द्वारा स्वाभाविक दीनतावशतः 'विषयी', 'शूद्राधम' आदि निकृष्ट विशेषणोंसे अपनेको सम्बोधित करनेपर भी एवं शौक्रविप्रकुलमें (ब्राह्मण परिवारमें) जन्म न लेनेपर भी, वे प्रकटलीलामें अकिञ्चन शुद्धभागवत-परमहंस थे। इसलिये उन्हें वैदिक-एकायन-शाखास्थित' (*आदिलीला भूमिकामें पृष्ठ संख्या xiv देखें) अप्राकृत दीक्षित-ब्राह्मण कहनेसे उनकी सामान्य महिमा ही व्यक्त होगी। महाकुलमें उत्पन्न, सब प्रकारके यज्ञोंमें दीक्षित, सहस्र-वैदिक शाखाध्यायी व्यक्ति भी यदि उन्हें अन्य शूद्रकुलमें जन्में व्यक्तियोंके समान शूद्र-जातिका मानेंगे, तो वे निश्चय ही नरकगामी होंगे, जैसा कि पद्मपुराणमें कहा गया है—“वीक्ष्यते जातिसामान्यात् स याति नरकं ध्रुवम्।” जो परमार्थके अभिलाषी हैं, उनका तो चिरकल्याण श्रीराय रामानन्दके दासानुदास होनेमें ही है। 'निन्द्यकर्म'—संन्यासीके लिये विषयीका दर्शन और शूद्रका सङ्ग अनुचित है, इसलिये निन्दनीय है; तथापि आपने अपनी असीम कृपाके कारण मेरे लिये उसे भी स्वीकार किया है॥ 32-37 ॥

अहैतुकी कृपा करना ही भगवान् और भक्तोंका धर्म :- श्रीमद्भागवत (10/8/4)— महद्विचलनं नृणां गृहिणां दीनचेतसाम्। निःश्रेयसाय भगवन्नान्यथा कल्पते क्वचित् ॥ 40 ॥

**अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 40 ॥

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