श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय 8/40-46 ]
अमृतप्रवाह भाष्य—हे भगवन्! दयनीय गृहस्थ लोगोंका नित्यमङ्गल करनेके लिये महापुरुष उनके घरमें जाते हैं, वे अन्य किसी कारणसे नहीं जाते ॥ 40 ॥ अनुभाष्य—श्रीवसुदेवके द्वारा भेजे गये महर्षि गर्गके अपने घरमें आनेपर श्रीनन्द महाराजने उनसे कहा— हे भगवन् (मुने) महद्विचलनं (महतां निरहंस्तम्भानां सर्वमदैर्मुक्तानां निजाश्रमात् कुत्रापि विचलनं गमनं न स्यात्, यदि क्वचित् विचलनं भवति, तदा) दीनचेतसां (कृपणानां) गृहिणां (गृहतापक्लिष्टानां गृहव्रतानां, गृहं त्यक्तु नृणां निःश्रेयसाय (चरम-कल्याणार्थाय) एव, क्वचित् अन्यथा न कल्पते (निजस्वार्थाय न घटते)। श्लोक-भावानुवाद—हे मुने! [आप जैसे] सर्वाभिमानसे मुक्त महान् पुरुष अपने आश्रमसे कहीं नहीं जाते। यदि कभी जाते भी हैं, तो जो लोग गृहकार्योंमें ऐसे उलझे हैं कि साधुसङ्गके लिये उनके आश्रम तक जानेमें असमर्थ हैं, ऐसे दीनहीन गृहस्थ लोगोंके चरम-कल्याणके लिये ही वे उनके पास जाते हैं, अन्य किसी उद्देश्यसे नहीं ॥ 40 ॥ महाप्रभुके रूप दर्शन और आचरणके फलस्वरूप अपने साथियोंमें श्रीकृष्णप्रेमको देखकर श्रीरायका महाप्रभुके प्रति श्रीकृष्ण-ज्ञान :— आमार सङ्गे ब्राह्मणादि सहस्रेक जन। तोमार दर्शने सबार द्रवीभूत मन ॥ 41 ॥ 'कृष्ण' 'हरि' नाम शुनि सबार वदने। सबार अङ्ग-पुलकित, अश्रु-नयने ॥ 42 ॥ आकृत्ये-प्रकृत्ये तोमार ईश्वर-लक्षण। जीवे ना सम्भवे एइ अप्राकृत गुण ॥” 43 ॥ अनुवाद—[श्रीरायने कहा—] मेरे साथ ब्राह्मणादि हजारों लोग हैं और देखिये आपके दर्शन करते ही सभीका हृदय द्रवीभूत हो गया है। मैं सभीके मुखसे 'कृष्ण', 'हरि' नाम सुन रहा हूँ। सबके अङ्ग पुलकित हो रहे हैं और उनके नेत्रोंसे अश्रुधारा प्रवाहित हो रही है। आपकी आकृति और स्वभावमें ईश्वरके समस्त लक्षण दिखायी दे रहे हैं। जीवोंमें ये अप्राकृत गुण होना सम्भव नहीं है ॥” 41-43 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आकृति'ते—अर्थात् 'न्यग्रोधपरिमण्डल'*-आकारसे, 'प्रकृति'ते—अर्थात् परम दयालु स्वभावसे, आपमें 'ईश्वर'के लक्षण दिखायी दे रहे हैं ॥ 43 ॥ 'आदिलीला 3/43 का अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ अनुभाष्य—'अप्राकृत गुण'—श्रीकृष्णभजन विषयमें सभीमें ही चैतन्य-सम्पादन करना अर्थात् सभीको प्रेमभक्ति प्रदान करना ॥ 43 ॥ महाप्रभुका दैन्य और श्रीरायकी प्रशंसाके छलसे आत्मगोपनकी चेष्टा :— प्रभु कहे,—“तुमि महाभागवतोत्तम। तोमार दर्शने सबार द्रव हैल मन ॥ 44 ॥ अन्येर कि कथा, आमि—'मायावादी संन्यासी'। आमिह तोमार स्पर्शे कृष्ण-प्रेमे भासि ॥ 45 ॥ एइ जानि' कठिन मोर हृदय शोधिते। सार्वभौम कहिलेन तोमारे मिलिते ॥” 46 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने कहा,—“आप उत्तम महाभागवत हैं। मेरे नहीं, आपके दर्शनसे ही इन सबका हृदय द्रवीभूत हुआ है। दूसरोंकी तो बात ही क्या, एक मायावादी संन्यासी होनेपर भी मैं आपके स्पर्शसे श्रीकृष्ण-प्रेममें निमग्न हो रहा हूँ। मेरे कठोर (शुष्क, नीरस) हृदयको पवित्र करनेके लिये ही श्रीसार्वभौमने मुझे आपसे मिलनेके लिये कहा था ॥” 44-46 ॥ अनुभाष्य—महाभागवतके लक्षण—(अर्चनमार्गमें) जैसे, पद्मपुराणमें— “तापादिपञ्चसंस्कारी नवेज्या-कर्मकारकः। अर्थपञ्चकविद्विप्रः महाभागवतोत्तमः ॥” (भाव मार्गमें) यथा, श्रीमद्भागवतम् (11/2/45)में— “सर्वभूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः। भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः ॥”
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