भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1090

[ 8/44-54 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

अर्थात् “तापादि-पञ्चसंस्कार-विशिष्ट नवेज्याकर्म (अर्चन, मन्त्रपाठ, योग, याग, वन्दन, नाम-सङ्कीर्तन, सेवा, चिह्नके द्वारा अर्चन और वैष्णवाराधन) करनेवाले एवं अर्थपञ्चकको जाननेवाले ब्राह्मण ही महाभागवत हैं।” जो समस्त वस्तुओंको सभी जीवोंके हृदयमें नियन्ताके रूपमें स्थित परमात्मा श्रीहरिके विभूतिके रूपमें दर्शन करते हैं, वे उत्तम भागवत हैं॥44॥

अमृतानुकणिका— 'पञ्चसंस्कार'—ताप, पुण्ड्र मन्त्र और याग—इन पाँचोंको 'पञ्चसंस्कार' कहते हैं। इन 'पञ्चसंस्कार' अर्चनमार्गीय पाञ्चरात्रिक विधिमें विश्वास होना—यह मध्यम वैष्णवोंके लक्षण हैं। 'अर्थ-पञ्चक'—अर्थात् जानने योग्य पाँच विषय। पहला—प्राप्य अर्थात् जिसे प्राप्त करना है, वे भगवान्, दूसरा—प्राप्त करनेवाला स्वयं जीवात्मा, तीसरा—प्राप्त करनेका उपाय, चौथा—प्राप्तिके मार्गमें आनेवाली बाधाएँ और पाँचवाँ—प्राप्तिका फल॥44॥

महाप्रभु और भक्तके द्वारा परस्परकी स्तुति :— एइमत दुँहे स्तुति करे दुँहार गुणे। दुँहे दुँहार दरशने आनन्दित मने॥47॥

अनुवाद— इस प्रकार दोनों ही एक-दूसरेके गुणोंकी स्तुति करने लगे और एक-दूसरेके दर्शनसे दोनोंका मन बहुत आनन्दित हुआ॥47॥

वैष्णव-ब्राह्मणके घरमें महाप्रभुके द्वारा भिक्षा; महाप्रभुके निमन्त्रणमें अवैष्णव-ब्राह्मणब्रुवका अनाधिकार :— हेनकाले वैदिक एक वैष्णव ब्राह्मण। दण्डवत् करि’ कैल प्रभुरे निमन्त्रण॥48॥ निमन्त्रण मानिल ताँरे वैष्णव जानिया। रामानन्दे कहे प्रभु ईषत् हासिया॥49॥ श्रीरायके साथ महाप्रभुकी पुनः साक्षात्कारकी इच्छा :— “तोमार मुखे कृष्णकथा शुनिते हय मन। पुनरपि पाइ येन तोमार दरशन॥”50॥


अनुवाद— उसी समय एक वैदिक वैष्णव ब्राह्मण वहाँ आया और उसने महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम करके अपने घरमें भिक्षाके लिये निमन्त्रण दिया। महाप्रभुने उस ब्राह्मणको वैष्णव जानकर उसका निमन्त्रण स्वीकार किया। तब थोड़ा मुस्कुराते हुए श्रीरामानन्दसे कहने लगे,—“आपके श्रीमुखसे श्रीकृष्णकथा श्रवण करनेकी अत्यन्त उत्कण्ठा हो रही है। मैं आपका पुनः दर्शन करना चाहता हूँ॥”48-50॥

श्रीरायका दैन्य और सम्भ्रमसे महाप्रभुसे उपदेशकाङ्क्षा :— राय कहे,—“आइला यदि पामर शोधिते। दर्शनमात्रे शुद्ध नहे मोर दुष्ट चित्ते॥51॥ दिन पाँच-सात रहि’ करह मार्जन। तबे शुद्ध हय मोर एइ दुष्ट मन॥”52॥

अनुवाद— यह सुनकर श्रीरामानन्द रायने कहा,—“यदि आप मेरे जैसे पतितके चित्तको पवित्र करनेके लिये आये हैं, तो मेरा यह कलुषित चित्त आपके दर्शनमात्रसे शुद्ध नहीं हो सकता। आप कृपा करके कम-से-कम पाँच-सात दिन यहाँ रहकर इसका मार्जन कीजिये, तभी मेरा दुष्ट मन शुद्ध हो सकेगा॥”51-52॥

विदायीके समय भक्त और भगवान्, दोनोंके लिये परस्परका विरह असहनीय :— यद्यपि विच्छेद दोँहार सहन ना याय। तथापि दण्डवत् करि’ चलिला रामराय॥53॥ प्रभु याइ’ सेइ विप्रघरे भिक्षा कैल। दुइ जनार उत्कण्ठाय आसि’ सन्ध्या हैल॥54॥

अनुवाद— यद्यपि दोनोंको एक-दूसरेका विरह असहनीय हो रहा था, तथापि श्रीरामानन्द राय महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम करके चल दिये। महाप्रभु भी उस ब्राह्मणके साथ उसके घरमें पधारे और वहाँ भिक्षा ग्रहण की अर्थात् प्रसाद सेवन किया। दोनों मिलनेके लिये उत्कण्ठित हो रहे थे, तभी सन्ध्याका समय उपस्थित हुआ॥53-54॥

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