भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1091

आठवाँ अध्याय 8/55-57 ] महाप्रभुका प्रतिदिन तीन बार स्नान और सन्ध्याके समय महाप्रभुका श्रीरायके साथ मिलन :- प्रभु स्नान-कृत्य करि' आछेन बसिया। एकभृत्य-सङ्गे राय मिलिला आसिया ॥ 55 ॥ अनुवाद-महाप्रभु जब स्नान और सन्ध्या करनेके बाद आसनपर बैठकर हरिनाम कर रहे थे और श्रीरामानन्द रायकी प्रतिक्षा कर रहे थे, तभी साधारण वेशमें श्रीरामानन्द राय एक सेवकके साथ उनसे मिलनेके लिये पधारे॥ 55॥ अमृतप्रवाह भाष्य-संन्यासी तीनों सन्ध्याओंमें स्नान करते हैं। उसी विधिके अनुसार महाप्रभु सन्ध्याके समय स्नान करके बैठे थे॥ 55॥ श्रीरायका प्रणाम और महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :- नमस्कार कैल राय, प्रभु कैल आलिङ्गने। दुइ जने कृष्ण-कथा कय सेइस्थाने ॥ 56 ॥ अनुवाद-श्रीरामानन्द रायने आते ही महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया और महाप्रभुने उठकर बड़े प्रेमसे उनका आलिङ्गन किया। इसके बाद दोनों एक निर्जन स्थानपर बैठकर परस्पर श्रीकृष्णकथा कहने-सुनने लगे॥ 56॥ महाप्रभु-रामानन्द संवाद; महाप्रभुके द्वारा साध्य-साधन जिज्ञासा; श्रीरायके उत्तर-(क) साधन (अभिधेय) स्तर- (1) सर्वप्रथम दैववर्णाश्रमरूप स्वधर्मके पालनसे सेश्वर-नैतिक अथवा धर्मजीवन-आरम्भ :- प्रभु कहे, -"पड़ श्लोक साध्येर निर्णय।" राय कहे,-"स्वधर्माचरणे विष्णुभक्ति हय ॥" 57 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 57॥ अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुने कहा, - "हे रामानन्दराय, साध्यतत्त्व-निर्णय करनेवाले शास्त्रके श्लोकोंका पाठ करो।" श्रीरायने कहा, - "मनुष्योंके द्वारा स्वधर्मका आचरण करनेसे विष्णुभक्ति होती है॥" 57॥ अनुभाष्य-श्रीरामानुजपादने 'वेदार्थ संग्रह'में कहा है- "एवंविध-परभक्तिरूप-ज्ञानविशेषस्योत्पादकः पूर्वोक्ता हरहरुपचीयमानज्ञानपूर्वक-कर्मानुगृहीत-भक्तियोग एव; यथोक्तं भगवता पराशरेण-'वर्णाश्रम" इति। निखिलजगदुद्धारणाया-वनितलेऽवतीर्णः परब्रह्मभूतः पुरुषोत्तमः स्वयमेतदुक्तवान्- "स्वकर्म निरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु। यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥" (गी० 18/45-46) इति यथोदितक्रमपरिणत-भक्त्येकलभ्य एव, भगवद्बोधायन-टङ्क-द्रविड़-गुहदेव-कपर्दि-भारुचि-प्रभृत्य-विगीत-शिष्टपरिगृहीत-पुरातन-वेद-वेदान्त-व्याख्यान-सुव्यक्तार्थ-श्रुतिनिकर-निदर्शिताेऽयं पन्थाः॥" मानवमात्रके लिये भक्ति ही अतिशय प्रिय और एकमात्र प्रयोजनीय है। इसके अतिरिक्त सभी कुछ अनपेक्षित एवं वितृष्णामय है। भक्तियुक्त आत्माके द्वारा ही श्रीभगवान् वरणीय हैं और भक्तोंको प्राप्त होते हैं। निरन्तर समृद्धिशील ज्ञानपूर्वक-कर्मानुगृहीत भक्तियोग ही धीरे-धीरे परम-भक्तिरूप विशेषज्ञानको उत्पन्न करता है। भगवान् पराशरने “वर्णाश्रमाचारवता" श्लोकमें इसी प्रकार कहा है। समस्त जगत्का उद्धार करनेके उद्देश्यसे पृथ्वीपर अवतीर्ण होकर परब्रह्मभूत पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने स्वयं ही गीतामें कहा है, - "मनुष्य अपने-अपने कर्मानुष्ठानमें लगे रहनेसे जिस प्रकार सिद्धि प्राप्त करेंगे, उसे श्रवण करो - जिन भगवान्से प्राणी उत्पन्न हुए हैं, जिन भगवान्के द्वारा यह जगत् विस्तृत हुआ है, मानव अपने कर्मके द्वारा उनका ही विशेष रूपसे अर्चन करके सिद्धि प्राप्त करेंगे।" यह सिद्धिका पथ कर्मानुगृहीत है, यथोचित-क्रमसे इसीके द्वारा भक्तिकी प्राप्ति होती है। भगवान् बोधायन, टङ्क, द्रविड़, गुहदेव, कपर्दि, भारुचि आदि सज्जनोंने भी इस प्रशंसनीय पथका ही अनुमोदन किया है। पुरातन वेद-वेदान्त-व्याख्या एवं सुन्दर रूपसे प्रकाशित (सुस्पष्ट) अर्थके द्वारा श्रुतियों भी इसी पन्थाका निर्देश करती हैं। रामानुजीय साम्प्रदायिक आचार्यगण कहते हैं, - "ब्रह्मप्राप्त्युपायश्च शास्त्राधिगत-तत्त्वज्ञानपूर्वक-स्वकर्मानुगृहीत-भक्तिनिष्ठासाध्यानवधिकातिशयप्रिय-विशदतममप्रत्यक्ष-तापन्नानुध्यान-रूप-परभक्तिरेव। वर्णाश्रमाचारवतेत्युक्तरीत्या न । 243