श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 8/57-58 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला संन्यासनीयता, नापि यत्किञ्चिदेकवर्ण-नियता, किन्तु ही तुम्हारे लिये प्रमाण हैं। इस कर्त्तव्य-विषयमें शास्त्रमें स्व-स्व-वर्णाश्रमनीयता। कर्माङ्गकं ज्ञानमेव, ज्ञानं न तु उपदिष्ट कर्मसे अवगत होकर उसे करनेके निमित्त नैष्कर्म्यं, नापि ज्ञानकर्मणोः सम-समुच्चयः।” योग्य होओ।” अर्थात् “शास्त्रोंका अध्ययनसे प्राप्त होनेवाले तत्त्वज्ञानके 'साध्य'का अर्थ है अभीष्ट वस्तु। इस अभीष्ट द्वारा वर्णाश्रम धर्मका पालन करते हुए भक्तिनिष्ठासे वस्तुको प्राप्त करनेकी चेष्टा साधन कहलाती है। साध्य होनेवाले असमोर्द्ध अतिशय प्रिय विभु-तत्त्वकी साध्य-तत्त्व अप्राकृत वस्तु है। यह तर्कादिसे परे है। प्रत्यक्ष निरन्तर ध्यानरूप पराभक्ति ही ब्रह्म-प्राप्तिका अप्राकृत विषयसे सम्बन्धित न होनेके कारण बद्धजीव उपाय है। 'वर्णाश्रमाचारवत्'-इस उक्ति के अनुसार भक्तिके इसका निर्णय नहीं कर सकता कि उसके लिये क्या लिये न तो संन्यासकी अनिवार्यता है और न ही भक्ति कल्याणकारी है। एकमात्र शास्त्रोंके द्वारा ही इसका किसी एक विशेष वर्णको ही प्राप्त होती है, अपितु निर्णय हो सकता है। (महाभारत, भीष्मपर्व 5/22)- अपने-अपने वर्णाश्रममें स्थित सभीके लिये प्राप्य है। “अचिन्त्या खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्। कर्मके अङ्ग ज्ञान अथवा ज्ञानके द्वारा प्राप्त नैष्कर्म्य प्रकृतिभ्यः परं यच्च तदचिन्त्यस्य लक्षणम्॥” अथवा कर्म-ज्ञानके एकत्रित होनेसे भी भक्ति प्राप्त नहीं अर्थात् “जो भाव अचिन्त्य है, उसमें तर्क करना होती, क्योंकि भक्ति परम स्वतन्त्र है।” उचित नहीं होता। अचिन्त्यका लक्षण यही है कि वह 'साध्य'-जिसकी साधनके द्वारा सिद्धि होती है। प्रकृतिसे अतीत है।” भाः 1/2/13 श्लोक देखें॥ 57 ॥ इसलिये महाप्रभुने श्रीरामानन्दको शास्त्रके आधारपर अमृतानुकणिका-महाप्रभुने श्रीराय रामानन्दसे ही साध्य-तत्त्व निरूपित करनेके लिये कहा।” कहा-‘शास्त्रानुसार साध्यका निर्णय करो।' केवल शास्त्रके -श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 57 ॥ द्वारा प्रमाणित साध्य ही मान्य है। शास्त्र भगवान्की दैववर्णाश्रमरूप स्वधर्मके पालनसे विष्णुकी सन्तुष्टि :- निज वाणी है। वेद, वेदान्त, उपनिषद्, पुराणादि अनेक विष्णुपुराण (3/8/9) में पराशरकी उक्ति- शास्त्र हैं और इनमें अमल-पुराण श्रीमद्भागवतम् ही वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान्। सर्वश्रेष्ठ है। इन शास्त्रोंका अनादर करके जो व्यक्ति विष्णुराराध्यते पन्था नान्यत्तत्तोषकारणम्॥ 58 ॥ हरिभक्तिका कोई नया पथ आविष्कार करते हैं, वे अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 58 ॥ जगत्के लिये उत्पात-स्वरूप हैं। नारद पञ्चरात्रमें कहा अमृतप्रवाह भाष्य-परमेश्वर विष्णु वर्णधर्म और गया है- आश्रमधर्मके आचरणसे युक्त पुरुषके द्वारा आराधित “श्रुति स्मृति पुराणादिपञ्चरात्रविधिं विना। होते हैं। वर्णाश्रमके आचरणके बिना उन्हें पूर्णरूपसे ऐकान्तिकी हरेर्भक्तिरुत्पातायैव कल्पते॥” सन्तुष्ट करनेका अन्य कोई कारण (उपाय) नहीं है। अर्थात् “श्रुति-स्मृति-पुराणादि और पञ्चरात्रकी विधिका तात्पर्य यह है कि भगवान्को परितुष्ट करना ही त्याग करके की गयी ऐकान्तिकी हरिभक्ति भी विघ्न साध्यतत्त्व है। मनुष्यके द्वारा अपने-अपने स्वभावके ही उत्पादन करती है।” अनुसार निर्णीत वर्ण-धर्म और अवस्थाके अनुसार श्रीकृष्णने गीता (16/24) में कहा है- निर्णीत आश्रमधर्मका पालन करनेसे भगवान् विष्णु “तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। सन्तुष्ट होते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-ये ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥” अर्थात् “कार्य-अकार्यकी व्यवस्थाके विषयमें शास्त्र 244 ।