भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1093

आठवाँ अध्याय 8/58-59 ] चार वर्ण हैं। प्रत्येक वर्णके लिये जो धर्मशास्त्रोंमें (2) भगवान्‌में कर्मार्पणरूपी कर्ममिश्रा निर्णीत है, वैसा ही आचरण करके मनुष्य जीवनयात्रा भक्ति शुद्धभक्ति नहीं :– निर्वाह करेंगे। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास,–ये प्रभु कहे,–“एहो बाह्य, आगे कह आर।” चार आश्रम हैं। मनुष्य अपने-अपने आश्रमके लिये राय कहे,–“कृष्ण-कर्मार्पण—सर्वसाध्य-सार॥”59॥ कहे गये धर्मका आचरण करके भगवान्‌को सन्तुष्ट करेंगे। इसमें व्यभिचार होने अर्थात् शास्त्रकी आज्ञाका अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने कहा,–“यह तो उल्लङ्घन करनेसे मनुष्यको प्रत्यवाय (दोष) लगता है बाहरकी बात है, इससे आगे कुछ और कहो।” तब तथा नरककी प्राप्ति होती है। परमार्थ-पथपर चलनेके श्रीरामानन्दने कहा,–“श्रीकृष्णको समस्त कर्मोंका अर्पण लिये सर्वप्रथम धर्ममय जीवनकी आवश्यकता है। ही साध्यसार है॥”59॥ जीवन निर्वाहकारी धर्म भिन्न-भिन्न स्वभाववाले व्यक्तियोंके लिये स्वाभाविक रूपसे भिन्न-भिन्न है। अनुभाष्य—साध्य अर्थात् साधनयोग्य अथवा साधनीय भक्तिका निर्णय करनेमें प्रवृत्त होकर श्रीरामानन्दने सबसे मनुष्यका जन्म, सङ्ग और शिक्षासे स्वभावका पहले ब्रह्माण्डमें अवस्थित साधकों जैसी बुद्धि धारण उदय होता है। स्वभावके अनुसार वर्ण स्वीकार न की। उन्होंने अन्याभिलाषिताका (शुद्धभक्तिके लक्षणका) करनेसे कोई भी जीवन-यात्रामें चतुर नहीं हो सकता। खण्डन करके नीतिवादियोंका पक्ष लेते हुए वर्णधर्म स्वभाव बहुत प्रकारके होनेपर भी मूल विभागसे चार और आश्रमधर्म पालनके द्वारा ही विष्णुकी प्रसन्नता प्रकारके हैं–(1) ईश्वर और विद्या ही जिनका होती है,—इसे 'साध्य' प्रमाण बतलाया। ऐसे 'साध्य' स्वाभाविक विषय है, वे 'ब्राह्मण' हैं; (2) शौर्य और निर्णयकारीको अस्मिताके (मैं यह शरीर हूँ और राज्यशासन ही जिनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है, वे 'क्षत्रिय' शरीरसे सम्बन्धित सब वस्तुएँ मेरी हैं, ऐसे अभिमानके) हैं; (3) कृषि, पशुपालन और वाणिज्य (व्यापार) क्रिया कारण जिस सम्बन्धकी उपलब्धि होती है, वह ब्रह्माण्डके ही जिनका स्वभावगत कर्म है, वे 'वैश्य' हैं; (4) तीनों अन्तर्गत है, इसलिये बाह्य (बाहरी) है। इसे बाहरी वर्णोंकी सेवामात्र ही जिनका स्वभाव है, वे 'शूद्र' हैं। कहनेका कारण यह है कि श्रीभगवान् गौरहरिने अपने अपने-अपने वर्णधर्म एवं अवस्था क्रमसे आराधना धाम वैकुण्ठ या गोलोकके बाहरी स्थानोंपर रहनेवाले करते-करते मानवकी स्वाभाविक उन्नति होती है; व्यक्तियोंकी बाहरी अनुभूतिको 'बाह्य साध्य' कहकर विपरीत आचरण करनेसे स्वाभाविक पतन होता है। उसका परित्याग करते हुए आगे कुछ और कहनेके इसलिये धर्मजीवन ही मानवके सभी उत्कर्षका मूल लिये कहा। श्रीरामानन्दने इस साध्यके विषयमें जो है॥ 58 ॥ श्लोक प्रमाण रूपमें कहा, उसमें विष्णुके 'सविशेष' या 'निर्विशेष' होनेका निर्देश नहीं किया। इसलिये इस अनुभाष्य— वर्णाश्रमाचारवता (ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्रवर्णाचारपालनर्तेन श्रेणीके साधक कर्ममार्गमें 'निर्विशेष' और 'सविशेष' ब्रह्मचारि-गृहस्थ-वानप्रस्थ-भिक्ष्वाश्रमाचारपालनपरेण च दोनों प्रकारकी विष्णु-आराधनाको लक्ष्य कर सकते हैं। स्व-स्व-वर्णाश्रमधर्माचारवता) पुरुषेण परः पुमान् (पुरुषोत्तमः (श्रीरामानन्द रायने इस बातको समझकर) कर्म-उद्देश्यका विष्णुः) आराध्यते। तत् (तस्य विष्णोः) अन्यः (वर्णाश्रमधर्मविनाशी तात्पर्य निर्विशेष-तत्त्वके विचारको त्यागकर सविशेष-तत्त्व कोऽपि) पन्थाः (मार्गः) तोषकारणं (प्रीत्यर्थं) न भवति। ही है, उसके अनुरूप अगले श्लोकमें प्रमाण दिया॥ 59 ॥ श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 58॥ अमृताणुकणिका—“श्रीरामानन्दने कहा कि श्रीकृष्णको अपने समस्त कर्मोंका अर्पण ही साध्यसार है। परन्तु । 245