श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसातवाँ अध्याय [7/102-112 ]
सेइ याइ' अन्य ग्रामे करे उपदेश। एइमत 'वैष्णव' हैल सब दक्षिण-देश॥ 104॥
**अनुवाद—**दूसरे गाँवोंसे भी जो लोग इन महाप्रभुसे शक्ति-प्राप्त वैष्णवके गाँवमें आते, वे भी इसके दर्शनरूपी कृपासे उसके समान वैष्णव बन जाते। जब ये वैष्णव अपने गाँवमें जाते, तो वे भी अपने गाँवके सभी लोगोंको वैष्णव बना देते। इसी प्रकार जब अन्य गाँवोंके लोग इनका दर्शन करने आते, तो वे भी वैष्णव बन जाते। इस प्रकार वैष्णव बन जानेके बाद वे दूसरे गाँवोंमें जाकर श्रीकृष्णनामका उपदेश करने लगते। इस प्रकार होते-होते समस्त दक्षिणवासी वैष्णव बन गये॥ 102-104॥
महाप्रभुके द्वारा बहुत भाग्यवान् जीवोंका उद्धार :- एइमत पथे याइते शत शत जन। 'वैष्णव' करेन ताँरे करि' आलिङ्गन॥ 105॥
**अनुवाद—**इस प्रकार मार्गपर चलते-चलते महाप्रभुने सैकड़ों लोगोंको आलिङ्गन करके वैष्णव बना दिया था॥ 105॥
महाप्रभुको भिक्षा देनेवाले दाताओंके दर्शन करनेवालोंको भी वैष्णवताकी प्राप्ति और बादमें उनके द्वारा आचार्यरूपमें बहुत लोगोंका उद्धार :- येइ ग्रामे रहि' भिक्षा करेन याँर घरे। सेइ ग्रामेर यत लोक आइसे देखिबारे॥ 106॥ प्रभुर कृपाय हय महाभागवत। सेइसब आचार्य हञा तारिल जगत्॥ 107॥
इस प्रकार समस्त दक्षिणदेशका उद्धार :- एइमत कैला यावत् गेला सेतुबन्धे। सर्वदेश 'वैष्णव' हैल प्रभुर सम्बन्धे॥ 108॥
**अनुवाद—**महाप्रभु जिस गाँवमें रहकर भिक्षा ग्रहण करते, उस गाँवके जितने लोग उनका दर्शन करने आते, महाप्रभुकी कृपासे वे सब महाभागवत बन जाते। बादमें उन सबने आचार्य बनकर जगत्का उद्धार किया। इस प्रकार सबपर कृपा करते हुए महाप्रभु सेतुबन्ध तक गये और उनके प्रभावसे सम्पूर्ण दक्षिण-देशवासी वैष्णव बन गये॥ 106-108॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'सेतुबन्ध'—सेतुबन्ध-रामेश्वर, समुद्रके तटपर, 'राम-नद' की दूसरी ओर भारतवर्षके दक्षिण प्रान्तमें है॥ 108॥
महाप्रभुकी कृपा-महिमा नवद्वीपकी अपेक्षा दक्षिणदेशमें अधिक प्रकाशित :- नवद्वीप येइ शक्ति ना कैला प्रकाशे। सेइ शक्ति प्रकाशि' निस्तारिल दक्षिणदेशे॥ 109॥
**अनुवाद—**नवद्वीपमें भी जिस शक्तिको प्रकाशित नहीं किया था, उस शक्तिको प्रकाशित करके महाप्रभुने दक्षिण भारतका उद्धार किया॥ 109॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'नवद्वीप' धाम होनेपर भी वहाँ उस समय न्याय और स्मृति-शास्त्रोंकी विशेष प्रबलता थी। उन-उन शास्त्रोंके अध्यापकोंमें अनेक तो बहिर्मुख लोग थे, परन्तु उनका उद्धार करनेके लिये महाप्रभुने किसी विशेष शक्तिका प्रकाश नहीं किया, इसलिये ग्रन्थकारने ऐसा कहा है॥ 109॥
श्रीचैतन्य-भक्तोंको ही भगवद्-कृपाशक्तिमें विश्वास :- प्रभुके ये भजे, तारे ताँर कृपा हय। सेइ से ए-सब लीला सत्य करि' लय॥ 110॥
अप्राकृत-लीलामें विश्वासके फलस्वरूप ही नित्यकल्याणकी प्राप्ति, अन्यथा अक्षज-ज्ञानके द्वारा सर्वनाश :- अलौकिक-लीलाय यार ना हय विश्वास। इहलोक, परलोक तार हय नाश॥ 111॥ प्रथमेइ कहिल प्रभुर येरूपे गमन। एइमत जानिह यावत् दक्षिण-भ्रमण॥ 112॥
**अनुवाद—**जो व्यक्ति महाप्रभुका भजन करता है, उसीपर उनकी कृपा होती है और वही उनकी इन सब लीलाओंपर विश्वास करता है। महाप्रभुकी इन अलौकिक
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