श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1071, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 7/96-103 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! पाहि माम्॥ राम! राघव! राम! राघव! राम! राघव! रक्ष माम्। कृष्ण! केशव! कृष्ण! केशव! कृष्ण! केशव! पाहि माम् ॥96॥
अनुवाद—महाप्रभु इस प्रकार कीर्तन कर रहे थे— कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! हे। कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! हे॥ कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! मेरी रक्षा करो। कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! मेरा पालन करो॥ राम! राघव! राम! राघव! राम! राघव! मेरी रक्षा करो। कृष्ण! केशव! कृष्ण! केशव! कृष्ण! केशव! मेरा पालन करो॥96॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'रक्ष मां'—मेरी रक्षा करो; 'पाहि मां'—मेरा पालन करो॥96॥
लोगोंको हरिनाम दान :- एइ श्लोक पथे पड़ि' चलिला गौरहरि। लोक देखि' पथे कहे,—बल 'हरि' 'हरि' ॥97॥
महाप्रभुके मुखसे नाम-श्रवण करनेसे लोगोंके द्वारा हरिनाम-ग्रहण :- सेइ लोक प्रेममत्त हञा बले 'हरि' 'कृष्ण'। प्रभुर पाछे सङ्गे याय दर्शन-सतृष्ण ॥98॥
महाप्रभुकी शक्तिके सञ्चारसे उस वैष्णवके द्वारा उसके ग्राममें सभीको वैष्णवताकी प्राप्ति :- कतक्षणे रहि' प्रभु तारे आलिङ्गिया। विदाय करिल तारे शक्ति सञ्चारिया ॥99॥
सेइजन निज-ग्रामे करिया गमन। 'कृष्ण' बलि' हासे, कान्दे, नाचे अनुक्षण॥100॥ यारे देखे, तारे कहे,—कह कृष्णनाम। एइमत 'वैष्णव' कैल सब निज-ग्राम ॥101॥
अनुवाद—इस श्लोकका उच्चारण करते-करते श्रीगौरहरि अपने मार्गपर चले जा रहे थे। मार्गमें जिस किसी व्यक्तिको देखते, उसे भी 'हरि' 'हरि' बोलनेके लिये कहते। महाप्रभुको 'हरि' 'हरि' बोलते सुनकर वह व्यक्ति भी प्रेममें उन्मत्त होकर 'हरि' 'कृष्ण' बोलने लगता। इस प्रकार महाप्रभुके दर्शनके लिये उत्कण्ठित होकर वह उनके पीछे-पीछे चलने लगता। कुछ समयके बाद महाप्रभु उसका आलिङ्गन करके उसमें अपनी शक्ति सञ्चार कर देते और उसे अपने घर जानेके लिये विदा कर देते। महाप्रभुसे शक्ति प्राप्तकर वह व्यक्ति अपने ग्राममें जाकर 'श्रीकृष्ण'-नामका कीर्तन करते हुए कभी हँसता, कभी रोता, तो कभी नृत्य करने लगता। वह जिसे भी देखता, उसे श्रीकृष्णनाम कहनेको कहता। इस प्रकार वह अपने सारे ग्रामवासियोंको वैष्णव बना देता॥97-101॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'शक्ति सञ्चारिया'—ह्लादिनी-शक्तिका सारभाग और संवित्-शक्तिका सारभाग—दोनों मिलनेपर 'भक्ति-शक्ति' होती है। श्रीकृष्ण या भक्त कृपा करके उस शक्तिका जिसमें सञ्चार करते हैं, वह 'परमभक्त' बन जाता है। महाप्रभु जिसपर कृपा करते थे, उसमें वैसी शक्ति सञ्चार करके वैष्णवधर्मके प्रचारका भार अर्पण करते थे॥99॥
अन्य ग्रामवासियोंकी भी उस वैष्णव-दर्शनके कृपारूपी फलसे वैष्णवताकी प्राप्ति :- ग्रामान्तर हैते देखिते आइल यत जन। ताँर दर्शन-कृपाय हय ताँर सम ॥102॥
इस प्रकार सभी दक्षिण-भारतवासियोंका उद्धार और उन्हें वैष्णवताकी प्राप्ति :- सेइ याइ' ग्रामेर लोक वैष्णव करय। अन्यग्रामी आसि' ताँरे देखि' वैष्णव हय ॥103॥
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