भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1073

[ 7/110-113 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

लीलाओंपर जिसे विश्वास नहीं होता, उसका इस लोक और परलोक—दोनोंका ही नाश हो जाता है। ऐसा ही जानो कि महाप्रभुने यात्राके प्रारम्भमें जैसे सर्वत्र कृपाका वितरण किया, वैसे ही उन्होंने सम्पूर्ण दक्षिण-भारतका भ्रमण करते हुए किया था॥110-112॥

अनुभाष्य— श्रीकृष्णचैतन्यकी अलौकिक लीला— छलरहित, निरस्तकुहक अर्थात् माया और मायाकी कपटतासे मुक्त, अप्राकृत चिदैश्वर्यमयी—जीवोंके नित्य चरम कल्याणको प्रदान करनेवाली है, इसलिये वह वास्तव वस्तु है। वह मायाबद्ध वञ्चक और वञ्चित जीवोंकी गुणमय-धारणासे उत्पन्न ईर्ष्यामूलक कपटता नहीं है। कपटता या ठगीके द्वारा, वञ्चक और वञ्चित दोनोंका ही श्रीकृष्णसेवासे दूर होनेके फलस्वरूप सर्वनाश होता है॥111॥

श्रीकूर्म स्थानमें जाना और विग्रह-दर्शनकर नृत्य-गीत :— एइमत याइते याइते गेला कूर्मस्थाने। कूर्म देखि' कैल ताँरे स्तवन-प्रणामे॥113॥

अनुवाद— इस प्रकार चलते-चलते महाप्रभु कूर्मस्थानमें पहुँचे। उन्होंने कूर्मदेवके दर्शन करके उन्हें प्रणाम करके उनकी स्तव-स्तुति की॥113॥

अमृतप्रवाह भाष्य— 'कूर्मस्थान'—यह एक तीर्थ है। वहाँ कूर्मदेवका मन्दिर है। 'प्रपन्नामृत'-ग्रन्थमें कहा गया है कि श्रीजगन्नाथदेवने श्रीरामानुज-स्वामीको रात्रिमें श्रीपुरुषोत्तमसे कूर्मतीर्थमें उठाकर फेंक दिया था॥113॥

अनुभाष्य— 'कूर्मस्थान'—गञ्जाम जिलेमें 'चिकाकोल रोड़' स्टेशनसे आठ मील पूर्वकी ओर 'कूर्माचल' अथवा 'श्रीकूर्मम्' हैं; यह तेलगु भाषी लोगोंका सबसे श्रेष्ठ तीर्थ है ('गञ्जाम म्यानुयेल')। वहाँ कूर्ममूर्ति विराजमान है। श्रीरामानुजाचार्य ग्यारहवीं शक-शताब्दीमें जब श्रीजगन्नाथदेवके द्वारा कूर्माचलमें फेंके गये, तब उस कूर्ममूर्तिको शिवमूर्त्ति समझकर उन्होंने उपवास किया, बादमें उसे विष्णु-मूर्ति जानकर उन्होंने कूर्मदेवकी सेवाका प्रकाश किया। जैसा, प्रपन्नामृतके छत्तीसवें अध्यायमें लिखा है—

“तद्रात्रावेव योगीन्द्रं प्रापयामास सत्वरम्। श्रीकूर्मे लक्ष्मणाचार्यं श्रीहरिर्योगमायया॥ प्रभातायां तु शर्वय्यां तस्यां लक्ष्मणदेशिकः। उत्थाय सहसा धीमान् हरिर्हरिरितीरयन्॥ दृष्ट्वा दशदिशः सम्यक् चिन्ता-व्याकुलमानसः। श्रीकूर्ममिति तत्क्षेत्रं ज्ञात्वा विस्मयमागतः। श्रीकूर्मनायकं मत्वा शिवलिङ्गमितीरितम्। उपवासेन तत्रैकं वासरं स्थितवान् गुरुः॥xx स्वप्ने प्रसन्नो भगवान् तस्य श्रीकूर्मनाथकः। व्याजहार शुभं वाक्यं कृपया यति-भूपतिम्॥ यतीन्द्राज्ञान-दोषेण शिवलिङ्गं जना इति। मां वदन्ति मृषा सर्वे मायान्धीकृतलोचनाः॥ वत्स्याम्यत्र स्वरूपेण शङ्खचक्रगदाधरः। लक्ष्मणार्याधुना शीघ्रं त्वं मां सम्यग् विलोकय॥xx अत्रैव पूजयन् मां त्वं दिनानि कतिचिद् वस॥ ततः स्वप्नात् समुत्थाय सन्तुष्टो विस्मयान्वितः। तथा विधाय योगीन्द्रस्तेनोक्तेनैव वर्त्मना॥ कूर्मनाथं समाराध्य तन्निवेदित-भोजनम्। विधाय तस्य पादाग्रे सुखं तत्रावसत्तदा॥ तदा प्रभृति सर्वत्र यतीन्द्रागम-वैभवात्। विष्णुस्थलमिति ख्यासीत् श्रीकूर्मं विदितं महत्॥”

अर्थात् “उसी रात्रिमें ही श्रीहरिने योगमायाके द्वारा योगीन्द्र श्रीलक्ष्मणाचार्य (श्रीरामानुजाचार्य) को श्रीकूर्मक्षेत्रमें स्थानान्तर करवाया। उस रात्रिके बाद प्रभात होनेपर श्रीमान् लक्ष्मणदेशिक (श्रीरामानुजाचार्य) 'हरि' 'हरि' बोलते-बोलते सहसा जाग्रत होकर दसों दिशाओंमें देखते हुए विशेष चिन्तित और व्याकुल हुए। उस स्थानको 'कूर्मक्षेत्र' जानकर वे विस्मित हुए। भगवान् श्रीकूर्मको (श्रीमूर्तिको) वहाँके लोगोंकी मान्यताके अनुसार 'शिवलिङ्ग' मानकर गुरु लक्ष्मणदेशिकने उस स्थानपर एक दिन उपवास किया। क्षेत्रनाथ भगवान् श्रीकूर्मने उनके प्रति प्रसन्न होकर कृपापूर्वक यतिराजको स्वप्नमें मधुर-वाक्य बोले,—“यतीन्द्र! स्थानीय लोग सभी आँखें होते हुए भी अन्धेके समान मायाके द्वारा मुझे मिथ्या

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