भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1074

सातवाँ अध्याय 7/113-117 ] ही 'शिवलिङ्ग'- रूपमें कहते हैं। किन्तु इस स्थानपर मैं अपने 'शङ्ख-चक्र-गदाधर' रूपमें ही वास कर रहा हूँ। आर्य लक्ष्मण ! तुम शीघ्र ही मेरा दर्शन करो और इसी स्थानपर मेरी पूजा करते हुए कुछ दिन वास करो।" ऐसा सुनकर विस्मित और सन्तुष्ट हुए योगीराजने उठकर स्वप्नमें कहे गये उपायके अनुसार श्रीकृष्णनाथकी सभी प्रकारसे आराधना की और उनको निवेदित खाद्य-द्रव्यका भोजन किया। उन्होंने उस स्थानपर उनके चरणकमलोंके सान्निध्यमें सुखपूर्वक कुछ दिन वास किया। तबसे उक्त क्षेत्र यतीन्द्रके आगमनकी महिमाके प्रभावसे 'श्रीकूर्मक्षेत्र'-नामक विष्णुस्थल-रूपमें सर्वत्र विशेषरूपसे जाना जाता है।" बादमें यह मन्दिर श्रीमाध्व-मठकी देख-रेखमें विजयनगरके राजाके अधिकारमें था। उस मन्दिरमें एक पत्थरके पटलके ऊपर लिखित नौ श्लोक लिखे पाये गये हैं। ऐसा कहा जाता है कि श्रीमध्वसम्प्रदायकी गुरु-परम्परामें 1203 शकमें उस समयके गुरु श्रीनरहरि तीर्थके द्वारा वे लिखे गये हैं। उनका हिन्दी-अनुवाद इस प्रकार है- पहला श्लोक-पुण्यश्लोक श्रीपुरुषोत्तम यतिने अनेक विद्वानोंके उपदेष्टाके रूपमें जन्म ग्रहण किया। वे भगवान् विष्णुको बहुत प्रिय थे। दूसरा श्लोक-उनके उपदेशोंको समस्त जगत्में आदरपूर्वक ग्रहण किया गया था। सिंह जैसे हाथीको परास्त कर देता है, वैसे ही उन्होंने अपने सुसिद्धान्तपूर्ण युक्तियोंसे विवाद करनेवालोंके सभी तर्कोंको परास्त कर दिया था। तीसरा श्लोक-उन्होंने आनन्दतीर्थको दीक्षा प्रदान की। अपने द्वारा ग्रहण किये गये संन्यास-दण्डके द्वारा शासन करके व्यासके विपथगामी मूर्ख शिष्योंको वे सुपथपर लाये, अर्थात् उन्हें भी संन्यास प्रदान किया। चौथा श्लोक-उनकी कथाएँ विष्णुको विशेष प्रिय और वैकुण्ठसिद्धि-प्रदान करनेमें समर्थ थीं। पाँचवाँ श्लोक-उनकी भक्तिकी शिक्षाएँ मनुष्योंको भगवान् श्रीहरिके चरणकमलोंको प्रदान करनेमें समर्थ हैं। छठा श्लोक-नरहरितीर्थने उनसे ही दीक्षा ग्रहण की और नरहरितीर्थने कलिङ्ग प्रदेशपर राज्य किया। सातवाँ श्लोक-नरहरितीर्थने शबरोंके साथ युद्ध करके श्रीकूर्म-मन्दिरकी रक्षाकी। आठवाँ श्लोक-नरहरितीर्थ बहुत धार्मिक और शक्तिशाली राजा थे। नौवाँ श्लोक-श्रीमन्दिरके निर्माण और उसे समस्त कल्याणदाता योगानन्द नृसिंहदेवको समर्पित करनेके बाद शुभ 1203 शकके वैशाख मासकी शुक्लपक्षीय एकादशी तिथिपर बुधवारको उन्होंने कामतदेवके सम्मुख आनन्दपूर्वक देह-त्याग किया था। (अध्यापक किल्हूर्णके अनुसार वह दिन) शनिवार 29 मार्च, 1281 ईसवी था॥ 113 ॥ महाप्रभुके नृत्य-गीतके दर्शनसे लोगोंमें चमत्कार :- प्रेमावेशे हासि' कान्दि' नृत्य-गीत कैल। देखि' सर्व लोकेर चित्ते चमत्कार हैल ॥ 114 ॥ आश्चर्य शुनिया लोक आइल देखिবারে। प्रभुर रूप-प्रेम देखि' हैला चमत्कारे ॥ 115 ॥ अनुवाद-कूर्मदेवके दर्शनकर प्रेममें आविष्ट होकर महाप्रभुने कभी हँसते, तो कभी रोते हुए नृत्य-गान किया। जिसे देखकर सब लोगोंके हृदयमें चमत्कार हुआ। इस आश्चर्यको सुनकर बहुतसे लोग महाप्रभुके दर्शन करनेके लिये आये और महाप्रभुके मनमोहक रूप और अद्भुत श्रीकृष्णप्रेमको देखकर वे भी चमत्कृत हो गये॥ 114-115 ॥ महाप्रभुके दर्शनोंसे लोगोंको वैष्णवताकी प्राप्ति :- दर्शने 'वैष्णव' हैल, बले 'कृष्ण' 'हरि'। प्रेमावेशे नाचे लोक ऊर्ध्वबाहु करि' ॥ 116 ॥ उन्हीं लोगोंके द्वारा उस देशका उद्धार :- कृष्णनाम लोकमुखे शुनि' अविराम। सेइ लोक 'वैष्णव' कैल अन्य सब ग्राम ॥ 117 ॥ । 225