भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1075

[ 7/116–129 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

इस प्रकार समस्त देशका उद्धार :- एइमत परम्पराय देश 'वैष्णव' हैल। कृष्णनामामृत-वन्याय देश भासाइल॥ 118 ॥ अनुवाद—महाप्रभुका दर्शनकर लोग वैष्णव बन गये। वे भी 'कृष्ण' 'हरि' नामका कीर्तन करते-करते प्रेमाविष्ट होकर अपनी भुजाओंको ऊपर उठाकर नृत्य करने लगे। इन लोगोंके मुखसे निरन्तर श्रीकृष्णनामको सुननेवाले व्यक्ति भी 'वैष्णव' बन गये। वे भी अपने गाँवमें जाकर कीर्तन करने लगे और उनके मुखसे नाम सुनकर अन्यान्य सब गाँवके लोगोंको भी वैष्णव बन गये। इस प्रकार परम्परासे सम्पूर्ण दक्षिण भारत 'वैष्णव' हो गया और श्रीकृष्णनामरूपी अमृतकी बाढ़में सारा दक्षिण भारत डूब गया॥ 116-118॥ विग्रहके सेवकोंके द्वारा महाप्रभुका सम्मान :- कतक्षणे प्रभु यदि बाह्य प्रकाशिला। कूर्मेर सेवक बहु सम्मान करिला॥ 119 ॥ अनुवाद—कुछ समयके बाद जब महाप्रभुने अपनी बाहरी चेतनाको प्रकाशित किया, तब श्रीकूर्मदेवके सेवकोंने उनका बहुत सम्मान किया॥ 119 ॥ सभी ग्रामोंमें जाकर महाप्रभुके द्वारा लोगोंका उद्धार :- येइ ग्रामे याय ताँहा एइ व्यवहार। एक ठाञि कहिल, ना कहिब आर बार॥ 120 ॥ अनुवाद—महाप्रभु जिस-जिस गाँवमें जाते, वहाँ भी ऐसा ही होता। (ग्रन्थकार कविराज गोस्वामी कह रहे हैं—) एकबार मैंने इसका वर्णन किया है, अब इसे बार-बार नहीं कहूँगा॥ 120 ॥ 'कूर्म' नामक ब्राह्मणके द्वारा महाप्रभुकी पूजा :- 'कूर्म'-नामे सेइ ग्रामे वैदिक ब्राह्मण। बहु श्रद्धा-भक्त्ये कैल प्रभुर निमन्त्रण॥ 121 ॥ घरे आनि' प्रभुर कैल पाद-प्रक्षालन। सेइ जल वंश-सहित करिल भक्षण॥ 122 ॥ अनेकप्रकार स्नेहे भिक्षा कराइल। गोसाञिर प्रसादान्न सवंशे खाइल॥ 123 ॥ “येइ पादपद्म तोमार ब्रह्मा ध्यान करे। सेइ पादपद्म साक्षात् आइल मोर घरे॥ 124 ॥ मोर भाग्येरे सीमा ना याय कहन। आजि मोर श्लाघ्य हैल जन्म-कुल-धन॥ 125 ॥ महाप्रभुके साथ जानेकी कूर्म ब्राह्मणकी प्रार्थना :- कृपा कर, प्रभु, मोरे, याङ तोमा-सङ्गे। सहिते नारिमु तोमार विरह-तरङ्गे॥" 126 ॥ अनुवाद—कूर्म-नामक एक वैदिक ब्राह्मण उस गाँवमें रहते थे, उन्होंने बहुत श्रद्धा और भक्तिसे महाप्रभुको अपने घरपर निमन्त्रित किया। महाप्रभुको अपने घरमें लाकर उन ब्राह्मणने उनके श्रीचरणोंको धोया और उस चरणामृतका उसने अपने परिवार सहित पान किया। उन ब्राह्मणने बहुत स्नेहसे महाप्रभुको अनेक प्रकारका भोजन कराया और बादमें महाप्रभुके उच्छिष्ट प्रसादको अपने परिवार सहित ग्रहण किया। महाप्रभुकी वन्दना करते हुए वे ब्राह्मण कहने लगे,— “आपके जिन श्रीचरणकमलोंका ब्रह्मा ध्यान करते हैं, वे श्रीचरणकमल आज साक्षात् मेरे घरमें आये हैं। मेरे भाग्यकी सीमा कही नहीं जा सकती। आज मेरा जन्म, कुल और धन, सब कुछ धन्य हो गया है। हे प्रभो! कृपा करके आप मुझे अपने साथ ले चलिये। मैं आपके विरहके तापको सहन नहीं कर पाऊँगा॥” 121-126 ॥ महाप्रभुके द्वारा सभीको ही आचार्यरूपसे कृष्णनाम-भक्ति प्रचार करनेका आदेश :- प्रभु कहे,—“ऐछे बात् कभु ना कहिबा। गृहे रहि' कृष्णनाम निरन्तर लैबा॥ 127 ॥ यारे देख, तारे कह 'कृष्ण'-उपदेश। आमार आज्ञाय गुरु हञा तार' एइ देश॥ 128 ॥ कभु ना बाधिबे तोमार विषय-तरङ्ग। पुनरपि एइ ठाञि पाबे मोर सङ्ग॥” 129 ॥

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