श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1076, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसातवाँ अध्याय 7/127–135 ] अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने कहा,—“ऐसी बात कभी नहीं कहना। घरमें रहकर ही निरन्तर श्रीकृष्णनाम करो। जिसे देखो, उसे ही श्रीकृष्णनाम करनेका उपदेश दो। मेरी आज्ञासे गुरु बनकर तुम इस देशका उद्धार करो। घरमें रहते हुए भी सांसारिक विषय कभी तुम्हारी भक्तिमें बाधा नहीं देंगे और यहीं तुम्हें पुनः मेरा सङ्ग प्राप्त होगा॥” 127–129 ॥ एइ मत याँर घरे करे प्रभु भिक्षा। सेइ ऐछे कहे, ताँरे कराय एइ शिक्षा॥ 130 ॥ अनुवाद—इस प्रकार जिसके घरमें महाप्रभु भिक्षा ग्रहण करते, वह भी इसी प्रकार कहता और महाप्रभु उसे भी यही शिक्षा देते॥ 130 ॥ अनुभाष्य—जिन्होंने अपना सर्वस्व त्यागकर एकान्तिक रूपसे श्रीमन्महाप्रभुका आश्रय लेकर सेवा करनेका सङ्कल्प किया है, भगवान् श्रीगौरसुन्दरने उनके भजनको स्वीकार करके यह शिक्षा दी है— “अपनेमें गृहत्यागियोंके जैसे ‘श्रेष्ठ भजनपरायण’ होनेका अभिमान त्यागकर गृहवासरूपी दीनताके साथ निरन्तर श्रीकृष्णनाम कीर्तन करते हुए शुद्धकृष्णनाम- भजनका प्रचार करो। ‘मैं सर्वोत्तम वैष्णव हूँ, शिष्य करनेसे मेरा भजन नष्ट हो जायेगा’—ऐसा बड़े भक्त होनेका अभिमान त्यागकर दीनतापूर्वक शुद्धनाम-ग्रहणका आचरण और शुद्धनाम-प्रचाररूपी गुरुका कार्य करनेसे जड़-प्रतिष्ठारूपी विषय-तरङ्ग प्रबल नहीं हो पाती। श्रीरूप, श्रीसनातन, श्रीजीव और श्रीरघुनाथदास आदि पार्षद-महात्माओंने ग्रन्थ लिखकर लोगोंको उपदेश दिया तथा श्रीमन् नरोत्तम, श्रीमध्व-रामानुज आदिने बहुतसे शिष्योंको ग्रहण किया। अनेक मूर्ख लोग उनके ऐसे कार्यको भक्तिके अङ्गोंका बाधक और विषय-तरङ्ग समझनेकी कल्पना करके वास्तविक अकिञ्चन भक्तोंके चरणोंमें अपराधी होते हैं। जगद्गुरु आचार्यके रूपमें श्रीगौराङ्गने यह शिक्षा इसलिये प्रदान की है कि वे गृहस्थ भक्त भलीभाँति विचार करके अपने मिथ्या दीन-अभिमानको परित्याग कर दें और हरि-विमुख व्यक्तियोंके प्रति प्रतिशोधकी भावना भी नहीं रखें, इस प्रकार महाप्रभुके आनुगत्यमें अपने भजनकी वृद्धि करें॥ 130 ॥ पुरीमें लौटने तक महाप्रभुके द्वारा सभीको आचार्यरूपमें भक्ति-प्रचार करनेका आदेश :– पथे याइते देवालये रहे येइ ग्रामे। याँर घरे भिक्षा करे, सेइ महाजने॥ 131 ॥ कूर्मे यैछे रीति, तैछे कैल सर्वठानि। नीलाचले पुनः यावत् ना आइला गोसाञि॥ 132 ॥ अतएव इँहा कहिलाङ करिया विस्तार। एइमत जानिबे प्रभुर सर्वत्र व्यवहार॥ 133 ॥ अनुवाद—मार्गमें जाते हुए महाप्रभु जिस गाँवके देवालयमें रहते वहाँ प्रेमावेशमें नृत्य-गान करते तथा जिसके घरमें भिक्षा ग्रहण करते, उस महाजनको, कूर्म ब्राह्मणकी भाँति ही उपदेश प्रदान करते। नीलाचल लौटकर आने तक उन्होंने सर्वत्र यही उपदेश दिया। इसलिये मैंने कूर्म ब्राह्मणकी कथाको विस्तारपूर्वक कहा है। ऐसा ही समझो कि महाप्रभुने भ्रमण करते समय सर्वत्र ऐसा ही किया था॥ 131–133 ॥ उस रात कूर्मगृहमें वास :– एइमत सेइ रात्रि ताँहाइ रहिला। प्रातःकाले प्रभु स्नान करिया चलिला॥ 134 ॥ प्रातःकाल फिरसे यात्रा :– प्रभुर अनुव्रजि’ कूर्म बहु दूर आइला। प्रभु ताँरे यत्न करि’ घरे पाठाइला॥ 135 ॥ अनुवाद—इस प्रकार उस रात महाप्रभु वहीं रहे और अगले दिन प्रातःकालमें स्नान करके वे वहाँसे चल दिये। कूर्म ब्राह्मण बहुत दूर तक महाप्रभुके पीछे-पीछे आये। अन्तमें महाप्रभुने उन्हें बहुत समझा-बुझाकर घर वापिस भेजा॥ 134–135 ॥ । 227