भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1077

[ 7/136-146 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला कुष्ठरोगी वासुदेव-ब्राह्मणका महाप्रभुके दर्शनोंके लिये कूर्म्मब्राह्मणके गृहमें आगमन :- 'वासुदेव'-नाम एक द्विज महाशय। सर्वाङ्गे गलित कुष्ठ, ताते कीड़ामय ॥ 136 ॥ अङ्ग हैते येइ कीड़ा खसिया पड़य। उठाञा सेइ कीड़ा राखे सेइ ठाञ ॥ 137 ॥ रात्रिते शुनिला तेंहो गोसाञिर आगमन। देखिबारे आइला प्रभाते कूर्मेर भवन ॥ 138 ॥ अनुवाद—कूर्म्म स्थानमें एक ब्राह्मण थे जिनका नाम वासुदेव था, वे बड़े महात्मा थे, परन्तु उनके शरीरमें कोढ़का रोग था। रोगसे उनके अङ्ग गल रहे थे और उनमें भी कीड़े पड़ गये थे। यदि उनके किसी अङ्गसे कोई कीड़ा नीचे गिर जाता, तो वे उसे उठाकर फिर अपने उसी अङ्गमें रख देते। रात्रिमें उन्होंने महाप्रभुके आगमनके बारेमें सुना, सुबह होते ही वे कूर्म्म ब्राह्मणके घर महाप्रभुके दर्शन करने आये॥ 136-138॥ महाप्रभुके कूर्म्मक्षेत्रसे चले जानेकी बातको सुनकर वासुदेवको दुःख और विलापके कारण महाप्रभुका वहाँ आविर्भाव :- प्रभुर गमन कूर्म्म-मुखेते शुनिञा। भूमिते पड़िला दुःखे मूर्च्छित हञा ॥ 139 ॥ अनेकप्रकार विलाप करिते लागिला। सेइक्षणे आसि' प्रभु ताँरे आलिङ्गिला ॥ 140 ॥ महाप्रभुका उनको आलिङ्गन-दान, उसके फलस्वरूप ब्राह्मणकी कुष्ठरोगसे मुक्ति और सौन्दर्य-प्राप्ति :- प्रभु-स्पर्शे दुःख-सङ्गे कुष्ठ दूरे गेल। आनन्द सहित अङ्ग सुन्दर हइल ॥ 141 ॥ अनुवाद—कूर्म्म ब्राह्मणके मुखसे महाप्रभुके चले जानेकी बात सुनकर वे दुःखसे मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़े। फिर चेतना लौटनेपर वे बहुत प्रकारसे विलाप करने लगे। तभी महाप्रभुने वहाँ आकर उनका आलिङ्गन किया। महाप्रभुका स्पर्श पाते ही उनके दुःखके साथ-साथ उनका कोढ़का रोग भी दूर हो गया। उनके सभी अङ्ग सुन्दर हो गये और उनके हृदयमें आनन्दका सञ्चार हुआ॥ 139-141॥ महाप्रभुकी दयाका दर्शनकर वासुदेवका स्तव :- प्रभुर कृपा देखि' ताँर विस्मय हैल मन। श्लोक पड़ि' पाये धरि', करये स्तवन ॥ 142 ॥ अनुवाद—महाप्रभुकी ऐसी कृपाको देखकर उनके मनमें बहुत आश्चर्य हुआ और वे उनके चरणकमलोंको पकड़कर एक श्लोकके द्वारा उनका स्तव करने लगे॥ 142॥ श्रीमद्भागवत (10/81/16) :- क्वाहं दरिद्रः पापीयान् क्व कृष्णः श्रीनिकेतनः। ब्रह्मबन्धुरिति स्माहं बाहुभ्यां परिरम्भितः ॥ 143 ॥ अनुवाद—(सुदामाजीके वचन—) कहाँ मैं अति पापी दरिद्र, कहाँ श्रीनिकेतन (लक्ष्मीके निवासस्थान) श्रीकृष्ण! उन्होंने मुझे अयोग्य ब्राह्मण-पुत्र जानकर मेरा आलिङ्गन किया,—यह अति आश्चर्यका विषय है॥ 143॥ अनुभाष्य—आदिलीला 17/78 संख्या देखें॥ 143॥ बहु स्तुति करि' कहे, —"शुन, दयामय। जीवे एइ गुण नाहि, तोमाते एइ हय ॥ 144 ॥ मोरे देखि' मोर गन्धे पलाय पामर। हेन-मोरे स्पर्श' तुमि,—स्वतन्त्र ईश्वर ॥ 145 ॥ किन्तु आछिलाङ भाल अधम हञा। एबे अहङ्कार मोर जन्मिबे आसिया ॥" 146 ॥ अनुवाद—वासुदेव ब्राह्मणने महाप्रभुकी बहुत स्तुति की और फिर कहने लगे,—"सुनो हे दयामय! जीवोंमें ऐसी कृपाका गुण नहीं हो सकता, जो आपमें है। मुझे देखकर, मेरे शरीरकी दुर्गन्धसे अत्यन्त पापी व्यक्ति भी मुझसे दूर भागते हैं और आपने मेरे जैसे व्यक्तिको स्पर्श किया—आप स्वतन्त्र ईश्वर हैं। किन्तु मैं उस 228 ।