श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1067, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 7/61-69 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला उनसे अवश्य ही मिलना, शूद्र और विषयी जानकर आप उनकी उपेक्षा मत करना ॥ 61-63 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'अधिकारी'—राजाका प्रधान कर्मचारी। विद्यानगरको आजकल 'पोरबन्दर' कहते हैं ॥ 62 ॥ अनुभाष्य—'शूद्र'—उत्कल देश (उड़ीसा)के समाजमें करण-जातिको 'शौक्र-शूद्र' (जन्मके कारण शूद्र) कहा जाता है। श्रीराम force? श्रीरामानन्द करण-जातिमें जन्में थे; इसलिये लौकिक-दृष्टिसे वे शौक्रशूद्र होनेपर भी वास्तवमें ब्राह्मण अथवा ब्राह्मणोंके भी गुरु परमहंस-वैष्णव थे। 'विषयी'—स्त्री-पुत्रादिकी बातोंमें रत अथवा बाह्य-रूप-रस-गन्ध-शब्द-स्पर्श आदि विषयोंमें ज्ञानेन्द्रियोंको युक्त करके उनमें प्रमत्त रहनेवालेको 'विषयी' कहते हैं। श्रीरामानन्द बाहरी दृष्टिसे कौपीनधारी संन्यासी नहीं थे, इसलिये लौकिक दृष्टिसे वे राजाके सेवक होनेके कारण विषयी दिखते थे, किन्तु वास्तवमें वे परम विद्वान अथवा नरोत्तम-संन्यासी थे। सार्वभौम भट्टाचार्यने पहले स्वयं वैष्णव नहीं होनेपर भी श्रीरामानन्द रायको वैष्णव जाना था। और फिर, महाप्रभुकी कृपासे भक्त बननेके बाद श्रीरामानन्दकी बातोंपर विचार करके उनको 'अधिकारी रसिकभक्त'के रूपमें समझा था ॥ 63 ॥ राय-रामानन्दकी प्रशंसा :- तोमार सङ्गेर योग्य तेंहो एकजन। पृथिवीते रसिक भक्त नाहि ताँर सम ॥ 64 ॥ पाण्डित्य आर भक्तिरस, —दुँहेर तेंहो सीमा। सम्भाषिले जानिबे तुमि ताँहार महिमा ॥ 65 ॥ पहले वैष्णवोंको स्मार्त्त व्यक्तियोंकी अपेक्षा छोटा माननेके कारण भट्टाचार्यके द्वारा उनका उपहास :- अलौकिक वाक्य चेष्टा ताँर ना बुझिया। परिहास करियाछि ताँरे 'वैष्णव' जानिया ॥ 66 ॥ बादमें महाप्रभुकी कृपासे चिन्मय-वैष्णवकी महिमाकी उपलब्धि :- तोमार प्रसादे एबे जनिनु ताँर तत्त्व। सम्भाषिले जानिबे ताँर येमन महत्त्व ॥ 67 ॥ अनुवाद—रामानन्दराय ही एकमात्र आपके सङ्ग करने योग्य हैं, पृथ्वीपर उनके समान कोई भी रसिक भक्त नहीं है। वे पाण्डित्य और भक्तिरस—दोनोंकी चरम सीमा हैं। उनसे बातचीत करनेपर आप स्वयं ही उनकी महिमा जान जायेंगे। मैं उनके अलौकिक वचनों और क्रिया-कलापोंको समझ नहीं पाता था तथा मैं उन्हें 'वैष्णव' मानकर उनका उपहास करता था। अब आपकी कृपासे मैं राय रामानन्दकी महिमाको समझ सका हूँ। उनके साथ वार्त्तालाप करके आप भी उनकी महिमाको जान पायेंगे ॥ 64-67 ॥ अनुभाष्य—महाप्रभुसे विमुख प्रकृति-वादी ज्ञानी और कर्मी लोग श्रीचैतन्याश्रित वैष्णवोंका ऐसे ही उपहास किया करते हैं। महाप्रभुसे विमुख लोग—प्रत्यक्ष और अनुमानको ही सर्वस्व माननेवाले जड़ेन्द्रियोंसे प्राप्त ज्ञानमें ही मत्त तर्कपन्थी हैं। श्रीचैतन्याश्रित वैष्णव शब्दप्रमाणको आश्रय माननेवाले अधोक्षज भगवान्के सेवक और श्रौतपन्थी हैं ॥ 66 ॥ महाप्रभुके द्वारा उनके वाक्य-पालनकी सम्मति :- अङ्गीकार करि' प्रभु ताँहार वचन। ताँरे विदाय दिते ताँरे कैल आलिङ्गन ॥ 68 ॥ महाप्रभुके द्वारा गृहस्थ-वैष्णवको सम्मान :- “घरे कृष्ण भजि' मोरे करिह आशीर्वादे। नीलाचले आसिं येन तोमार प्रसादे ॥” 69 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी बातको मानकर उन्हें विदायी देनेके लिये उनका आलिङ्गन करके कहा, —“घरमें श्रीकृष्णका भजन करते समय आप मुझे आशीर्वाद प्रदान करते रहना, जिससे मैं आपकी कृपासे पुनः नीलाचल लौट आऊँ ॥” 68-69 ॥ 218 ।