श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें“भगवद्भक्तिपरायण व्यक्ति कभी भी शूद्र नहीं कहलाते, उनको 'भागवत' ही कहा जाता है। श्रीजनार्दनके प्रति भक्ति न होनेपर कोई भी जाति क्यों न हो, उनकी 'शूद्र' कहकर ही गणना होती है। यजन, याजन, अध्ययन, अध्यापन, दान और प्रतिग्रह—इन छह कर्मोंमें निपुण एवं मन्त्र-तन्त्र विशारद ब्राह्मण भी अवैष्णव होनेपर गुरु नहीं हो सकता, किन्तु चण्डाल कुलमें जन्म ग्रहण करनेपर भी यदि कोई विष्णुभक्ति परायण हो, तो वह गुरु होनेके योग्य है। सम्भ्रान्त कुलमें उत्पन्न, सब यज्ञोंमें दीक्षित और सहस्रशाखाध्यायी ब्राह्मण भी अवैष्णव होनेपर गुरु पदके योग्य नहीं है। शूद्रकुलमें उत्पन्न व्यक्ति अपनेसे उन्नत ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जातिके किसी योग्य व्यक्तिको गुरुके रूपमें ग्रहण कर सकते हैं—यही साधारण विधि है, किन्तु भगवद्-प्रिय अर्थात् वैष्णवगण शूद्रकुलमें उत्पन्न होनेपर भी उक्त तीनों वर्णों अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य-कुलमें उत्पन्न व्यक्तियोंके श्रीगुरुदेव हो सकते हैं॥” 127॥ अनुभाष्य—वर्णमें ब्राह्मण ही हो, अथवा क्षत्रिय- वैश्य-शूद्र ही हो, आश्रममें संन्यासी हो अथवा ब्रह्मचारी-वानप्रस्थ-गृहस्थ ही हो, जिस किसी वर्णमें अथवा जिस किसी आश्रममें अवस्थित हो, श्रीकृष्ण- तत्त्ववेत्ता ही गुरु अर्थात् वर्त्मप्रदर्शक, दीक्षागुरु अथवा शिक्षागुरु हो सकते हैं। गुरुकी योग्यता केवलमात्र श्रीकृष्णतत्त्वज्ञताके ऊपर ही निर्भर करती है,—वर्ण अथवा आश्रमके ऊपर निर्भर नहीं करती। श्रीमहाप्रभुका यह आदेश शास्त्रीय आदेशके विरुद्ध नहीं है। इस तात्पर्यके अनुसार श्रीविश्वम्भर-महाप्रभु श्रीईश्वरपुरी नामक संन्यासीसे, श्रीनित्यानन्द प्रभु माधवेन्द्रपुरी गोस्वामी (मतान्तरमें श्रीमद् लक्ष्मीपति तीर्थ) नामक संन्यासीसे, श्रीअद्वैताचार्य इन्हीं श्रीमाधवेन्द्रपुरी संन्यासीसे दीक्षित हुए थे। श्रीरसिकानन्दने ब्राह्मणसे इतर अन्य कुलमें आविर्भूत श्रीश्यामानन्द प्रभुसे, श्रीगङ्गानारायण चक्रवर्ती और श्रीरामकृष्ण भट्टाचार्यने भी ब्राह्मणकुलके अतिरिक्त अन्य किसी कुलमें आविर्भूत श्रील नरोत्तम-ठाकुरसे, काटोयाके श्रीयदुनन्दन चक्रवर्ती श्रीदासगदाधरसे पाञ्चरात्रिक दीक्षामें दीक्षित हुए थे। धर्म-नामक व्याध (शिकारी) आदि अनेकानेक व्यक्तियोंकी शिक्षा-गुरु होनेमें बाधा नहीं थी। महाभारतके स्पष्ट आदेशों और श्रीमद्भागवत (7/11/32) श्लोकमें— “यस्य यल्लक्षणं प्रोक्तं पुंसो वर्णाभिव्यञ्जकम्। यदन्यत्रापि दृश्येत तत्तेनैव विनिर्दिशेत्॥” “मनुष्योंमें वर्णको लक्षित करनेवाले जो समस्त लक्षण बताये गये हैं, वे यदि दूसरे वर्णवालोंमें भी मिलें, तो उन्हें भी उसी वर्णका समझना होगा। (केवल जन्मके द्वारा वर्ण निरूपित नहीं होगा)।” इस वाक्यमें 'समझना होगा'—इस विधिलिङ्के प्रयोगसे अर्थात् इस आदेशका पालन अनिवार्य है। इसलिये वैष्णव विचारानुसार श्रीकृष्णतत्त्ववेत्ताकी वृत्तिमें ब्राह्मणता स्वाभाविक ही है। इसलिये कलिमें जो प्रचलित विचार है कि जन्मके बिना ब्राह्मणता नहीं हो सकती, उसके स्थानपर यह स्वीकार करना होगा कि श्रीकृष्णतत्त्ववित् होनेपर जन्मसे शूद्र भी शास्त्रीय ब्राह्मणता प्राप्त करके गुरु हो सकते हैं—यही श्रीमहाप्रभुने सूक्ष्मरूपसे समझाया है। जो श्रीकृष्णतत्त्ववित् वैदिक-वाजसनेय शाखाके अन्तर्गत कात्यान-गृह्यसूत्रमें कहे सावित्र्य-संस्कारको (उपनयन संस्कारको) ग्रहण नहीं करते, वे—एकायनशाखी (आदिलीला भूमिका पृष्ठ संख्या xiv देखें) दीक्षित-ब्राह्मण ही हैं। किन्तु अज्ञानी लोग अधिकतर उन्हें 'अच्युत ब्राह्मण' (जो ब्राह्मणत्वसे कभी नहीं गिरते) न समझ पानेके कारण नरकगामी होते हैं। इसलिये (जन्मसे ब्राह्मण नहीं होनेपर भी) रसिकानन्द प्रभुके वंशमें, श्रीखण्डके श्रीमुकुन्ददासके वंशमें, नवनीहोड़के वंशमें सावित्र्य ब्राह्मण-संस्कार एवं जन्मसे ब्राह्मण लोगोंको शिष्य बनाकर उनके आचार्यका कार्य बहुत समयसे चलता हुआ आ रहा है। कई भजनानन्दी वैष्णव सावित्र्य-संस्कार