भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1128

[ 8/127-134 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ग्रहण नहीं करते, इसका तात्पर्य यह नहीं हैं कि गुरु होनेके लिये सावित्र्य-संस्कार ही एकमात्र विधि है। वैष्णवगण लक्षणोंके द्वारा वर्णका निर्णय करते हैं, किन्तु अज्ञानी व्यक्ति वैसे लक्षणोंके द्वारा वर्ण निर्णय करनेमें असमर्थ होते हैं, इसलिये श्रीमहाप्रभुने स्पष्टरूपसे ही शास्त्रके तात्पर्यको समझा दिया। हरिभक्तिविलासमें संगृहीत सिद्धान्त श्रीमहाप्रभुके अपने आदर्श-आचार और उपदेशोंके साथ एक होनेपर भी अज्ञानी व्यक्तियोंको वे भिन्न प्रतीत होते हैं। इस पयारमें कहे गये 'गुरु' शब्दसे उनके विचारानुसार श्रवण-गुरु अथवा भजन-शिक्षागुरुको ही लक्ष्य किया गया है, दीक्षा अथवा मन्त्रदाता गुरु नहीं। क्योंकि उनके मतानुसार वंश-परिचय अर्थात् रक्त अथवा शुक्र ही दिव्यज्ञान-दाताके अधिकारका निर्णय और परिचय प्रदान करता है। इसलिये शुद्ध-आत्मवृत्ति श्रीकृष्णभक्ति उनके मतानुसार निरपेक्ष या स्वतन्त्र नहीं है, अर्थात् वह जन्म-कुलके अधीन है। विशेषतः दीक्षागुरु अथवा मन्त्र-दाताका श्रेष्ठत्व और माहात्म्य उनकी मूर्खतानुसार 'श्रवण गुरु' अथवा 'भजन-शिक्षा-गुरु'की अपेक्षा अधिकतर है। इस सम्बन्धमें आदिलीला 1/47 संख्याका अनुभाष्य विशेष-रूपसे विचारणीय है। वास्तवमें ऐसी धारणा उनके प्राकृत ज्ञानसे उत्पन्न अपराधका फलमात्र है॥ 127 ॥ श्रीरायको राधाकृष्णके तत्त्वके वर्णनके लिये अनुरोध :— 'संन्यासी' बलिया मोरे ना करिह वञ्चन। कृष्ण-राधा-तत्त्व कहि' पूर्ण कर मन॥"128 ॥ अनुवाद—मुझे 'संन्यासी' समझकर मेरी वञ्चना मत कीजिये। श्रीकृष्ण और श्रीराधातत्त्वोंका वर्णन करके मेरे मनोरथको पूर्ण करो॥"128 ॥ महाप्रभुकी मायाके द्वारा महामहासूरिगण भी मुग्ध, किन्तु वास्तविक तत्त्वको जाननेवाले श्रीरामानन्द धीर-स्थिर :— यद्यपि राय—प्रेमी, महाभागवते। ताँर मन कृष्णमाया नारे आच्छादिते ॥ 129 ॥ महाप्रभुकी इच्छाशक्तिसे चालित सेवकका चलन— मायादास्य नहीं है, वह महाप्रभुकी इच्छाशक्तिका प्रभुत्व और श्रीरायके वश्यत्वका ज्ञापक :— तथापि प्रभुर इच्छा—परम प्रबल। जानिलेह रायेर मन हैल टलमल ॥ 130 ॥ राय कहे,—“आमि—नट, तुमि—सूत्रधार। येइ मत नाचाओ, सेइ मत चाहि नाचिबार ॥ 131 ॥ मोर जिह्वा—वीणायन्त्र, तुमि—वीणाधारी। तोमार मने येइ उठे, ताहाइ उच्चारि ॥ 132 ॥ अनुवाद—यद्यपि श्रीरामानन्द राय श्रीकृष्ण-प्रेमी महाभागवत हैं और श्रीकृष्णकी माया उनके मनको आच्छादित नहीं कर सकती, तथापि महाप्रभुकी इच्छा परम प्रबल है, इसलिये श्रीरामानन्द रायका मन महाप्रभुके स्वरूपको जानते हुए भी चञ्चल हो गया। श्रीरायने कहा,—“मैं तो एक नट हूँ और आप सूत्रधार हो। आप जैसे मुझे नचाएँगे, मैं वैसे ही नाचूँगा। मेरी जिह्वा तो वीणा-यन्त्र है और आप वीणा बजानेवाले हैं। आपके मनमें जो श्रवण करनेकी इच्छा होती है, मैं वही कहता हूँ॥ 129-132 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 3/85-89 संख्या देखें। 'सूत्रधार'—“वर्त्तनीयतया सूत्रं प्रथमं येन सूच्यते। रङ्गभूमिं समाक्रम्य सूत्रधारः स उच्यते॥” “नाटकमें प्रयोग होनेवाली सभी वस्तुओंको सर्वप्रथम जिसके द्वारा रङ्गभूमिमें आकर सूचित किया जाता है, उसे 'सूत्रधार' कहते हैं।” वह नाटककी प्रस्तावनाको प्रस्तुत करनेवाला प्रधान नट है॥ 131 ॥ (1) श्रीकृष्णतत्त्व-वर्णनारम्भ; श्रीकृष्णका स्वरूप-परिचय :— परम ईश्वर कृष्ण—स्वयं भगवान्। सर्व-अवतारी, सर्वकारण-प्रधान ॥ 133 ॥ अनन्त वैकुण्ठ, आर अनन्त अवतार। अनन्त ब्रह्माण्ड इँहा,—सबार आधार ॥ 134 ॥ 280