भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1129

आठवाँ अध्याय 8/133-137 ] सच्चिदानन्द-तनु, व्रजेन्द्रनन्दन। सर्वैश्वर्य-सर्वशक्ति-सर्वरस-पूर्ण ॥ 135 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण ही परम ईश्वर और स्वयं भगवान् हैं। वे सभी अवतारोंके अंशी अर्थात् मूल हैं और सभी कारणोंके प्रधान कारण हैं। श्रीकृष्ण अनन्त वैकुण्ठ, अनन्त अवतार एवं अनन्त ब्रह्माण्डोंके भी आधार स्वरूप हैं। वे सत्-चित्-आनन्दमय विग्रह हैं, तो भी वे महाराज नन्दके पुत्र हैं। वे समस्त ऐश्वर्योंके, समस्त शक्तियोंके ईश हैं और वे समस्त रसोंसे परिपूर्णतम रसस्वरूप हैं ॥ 133-135 ॥ ब्रह्मसंहिता (5/1) :— ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः। अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम् ॥ 136 ॥ अनुवाद—सत्, चित् और आनन्दमय विग्रह श्रीकृष्ण ही सर्वेश्वरेश्वर हैं। वे स्वयंरूप, अनादि, किन्तु सबके आदि हैं। वे गोविन्द हैं तथा समस्त कारणोंके कारणभूत मूल कारण हैं ॥ 136 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 2/107 संख्या देखें ॥ 136 ॥ व्रजमें नित्यसेवित मदनमोहन-विग्रह :— वृन्दावने 'अप्राकृत नवीन मदन'। कामगायत्री, कामबीजे याँर उपासन ॥ 137 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण वृन्दावनमें अप्राकृत नवीन मदन हैं। कामगायत्री और कामबीजके द्वारा उनकी उपासना होती है ॥ 137 ॥ अनुभाष्य—'वृन्दावन'—ब्रह्मसंहितामें पाँचवें अध्यायका 56वाँ श्लोक— “श्रियः कान्ताः कान्तः परमपुरुषः कल्पतरवो द्रुमा भूमिश्चिन्तामणिगणमयी तोयममृतम्। कथा गानं नाट्यं गमनमपि वंशी प्रियसखी चिदानन्दं ज्योतिः परमपि तदास्वाद्यमपि च॥ स यत्र क्षीराब्धिः स्रवति सुरभीभ्यश्च सुमहान् निमेषाद्र्धाख्यो वा व्रजति न हि यत्रापि समयः। भजे श्वेतद्वीपं तमहमिह गोलोकमिति यं विदन्तस्ते सन्तः क्षितिविरलचाराः कतिपये ॥” “अप्राकृत वृन्दावनमें सब कुछ ही चिन्मय है; अप्राकृत लक्ष्मियाँ अथवा गोपियाँ—कान्ता हैं, परम पुरुष श्रीकृष्ण—सभीके कान्त हैं, वहाँके वृक्ष—कल्पवृक्ष हैं, भूमि—चिन्तामणियोंसे युक्त है, पानी—अमृत है, बोलना—गान है, चलना—नृत्य है, वंशी—प्रियसखी है, चन्द्र-सूर्यादिरूप ज्योतिर्मय पदार्थ—चिदानन्दमय हैं। वह अप्राकृत चिन्मय भाव ही आस्वाद्य अथवा अनुशीलनीय है। वहाँ चिन्मय गैयाओंके दूधसे क्षीरसमुद्र प्रवाहित हो रहा है, वहाँका पलक झपकनेके समयका आधा भाग भी नित्यकाल ही है अथवा वहाँ काल वृथा ही व्यतीत होकर दूसरे कालमें नहीं बदलता। इस प्रपञ्चमें उदित वृन्दावन-धाम जिसको कुछ दुर्लभ श्रीकृष्णतत्त्व जाननेवाले साधु 'गोलोक' नामसे जानते हैं—उस श्वेतद्वीपका मैं भजन करता हूँ।” जड़बुद्धि और जड़ेन्द्रियोंके द्वारा प्राप्त सांसारिक ज्ञानसे वृन्दावनका दर्शन नहीं होता, क्योंकि अप्राकृत वृन्दावन—अप्राकृत श्रीकृष्णलीलाका अप्राकृत स्थान है। श्रील नरोत्तम दास ठाकुरने अपने द्वारा रचित 'प्रार्थना' नामक ग्रन्थमें कहा है,— “आर कबॆ निताइचाँद करुणा करिबे। संसार-वासना मोर कबॆ तुच्छ हबे॥ विषय छाड़िया कबॆ शुद्ध हबे मन। कबॆ हाम हेरब श्रीवृन्दावन॥ रूप-रघुनाथ-पदे हइबे आकुति। कबॆ हाम बुझब श्रीयुगल-पिरीति॥” “कब श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कृपासे मेरे हृदयसे सांसारिक वासनाएँ दूर होंगी? विषयोंका परित्यागकर मेरा मन कब शुद्ध होगा, जिससे कि मैं श्रीवृन्दावनधामके चिन्मय स्वरूपका दर्शन करूँगा। कब श्रीरूप गोस्वामी और श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके चरणोंमें मेरी प्रीति होगी कि मैं उनकी कृपासे श्रीराधाकृष्णयुगलकी प्रीतिको जान पाऊँगा।” मध्यलीला 14/219-226 संख्या देखें। । 281