भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1130

[ 8/137 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 'अप्राकृत नवीनमदन'—जड़ अथवा प्राकृत और उसके विपरीत चिन्मय अथवा अप्राकृत, दोनों अवस्थाओंमें ही 'काम' विद्यमान है। जड़ काम कालके द्वारा क्षुब्ध होता है अर्थात् प्रकाशित होनेके समय ही इसकी अनुभूति होती है एवं थोड़ी ही देरमें यह मलिन होकर फिर रहता नहीं है। और अप्राकृत काम—नित्य नवनवायमान अर्थात् कालके द्वारा इसकी समाप्ति नहीं होती, यह सदैव उज्ज्वल रहता है। जड़ेन्द्रियोंके द्वारा ग्रहण किया जा सकने वाला काम—जड़-देह-मनोवृत्ति एवं इन्द्रिय-भोगमें लगे प्रत्येक श्रीकृष्ण विमुख जीवके भौतिक देहजनित स्वभावमें वर्तमान है, किन्तु वह केवल तात्कालिक मात्र है। और चिद्-इन्द्रियोंके सेव्य मदन—मन्मथमन्मथ श्रीकृष्णचन्द्र हैं, वे—नित्य नवीन और स्वयंसुरूप-विग्रह हैं। 'काम-गायत्री'—'गायन्तं त्रायते यस्मात् गायत्री त्वं ततः स्मृता।' 'जो वस्तु गान करनेवालेका त्राण (रक्षा या उद्धार) करती है अथवा गानके द्वारा त्राण कराती है।' मध्यलीला 21/125 संख्या— 'कामगायत्री मन्त्ररूप, हय कृष्णस्वरूप, सार्द्ध चब्बिश अक्षर तार हय। से अक्षर-चन्द्र हय, कृष्ण करि' उदय, त्रिजगत् कैल काममय।” “मन्तरूप कामगायत्री श्रीकृष्णका स्वरूप है। कामगायत्रीमें साढ़े चौबीस अक्षर होते हैं। ये अक्षर चन्द्ररूप हैं जो श्रीकृष्णमें उदित होकर त्रिभुवनको काममय कर देते हैं।” “क्लीं कामदेवाय विद्महे पुष्पबाणाय धीमहि तन्नोऽनङ्गः प्रचोदयात् ॥” कामदेव (187 संख्या देखें) अथवा मदनमोहन-कृष्ण ही सम्बन्ध-अधिदेवता, पुष्पबाण अथवा गोविन्द ही अभिधेय-अधिदेवता और अनङ्ग अथवा गोपीजनवल्लभ ही प्रयोजन-अधिदेवता हैं। कामगायत्री—अप्राकृत है। अप्राकृत-अनुभूतिसे अप्राकृत-वचनोंके द्वारा साधक श्रीकृष्णकी उपासना करते हैं। ब्रह्मसंहिता 5/27-28 श्लोक— “अथ वेणु-निनादस्य त्रयीमूर्तिमयी गतिः। स्फुरन्ती प्रविवेशाशु मुखाब्जानि स्वयम्भुवः। गायत्रीं गायतस्तस्मादधिगत्य सरोजजः॥ संस्कृतश्चादिगुरुणा द्विजतामगमत्ततः॥ त्रया प्रबुद्धोऽथ विधिर्विज्ञाततत्त्वसागरः। तुष्टाव वेदसारेण स्तोत्रेणानेन केशवम् ॥” “अनन्तर श्रीकृष्णकी वंशीध्वनिकी त्रयीमूर्तिमयी गति (वेदमाता त्रि-अष्टाक्षरी—त्रिविध अर्थात् सम्बन्धभिधेय- प्रयोजनात्मिका) प्रकाशित होकर स्वयंभू ब्रह्माके मुखकमलमें सहसा प्रविष्ट हुई। पद्मयोनि ब्रह्माने वेणुगीतसे निकली गायत्री-दीक्षा प्राप्त करके आदिगुरु श्रीकृष्णके द्वारा द्विज-संस्कार प्राप्त किया (श्रीजीव गोस्वामी प्रभुकी टीका देखें)। त्रयीमयी अर्थात् सम्बन्ध, अभिधेय और प्रयोजन-विशिष्टा गायत्रीके स्मरणके द्वारा जागरित होकर ब्रह्मा तत्त्वसमुद्रमें निष्णात (प्रवीण) हो गये अर्थात् उन्होंने अभिज्ञता प्राप्त की एवं उसी वेदसार-स्तोत्रके द्वारा केशवकी सेवा करके उनकी कृपा प्राप्त की। 'कामबीज'—अप्राकृत 'क्लीं'। ब्रह्मसंहिताका 5/3 श्लोक— “प्रेमानन्द-महानन्द-रसेनावास्थितं हि यत्। ज्योतिरूपेण मनुना काम-बीजेन सङ्गतम् ॥” “अप्राकृत कामबीजसे युक्त अप्राकृत काम-गायत्रीके द्वारा अप्राकृत नित्य नवीन मदनमोहन-विग्रहकी अप्राकृत उपासना होती है।” जैसे, गोपालतापनी उपनिषद्में कहा गया है-(पूर्व विभाग श्लोक-13 पृष्ठ 22) “तस्य पुनरासनं जलभूमीन्दु-सम्पातकामादि-कृष्णायेत्येकं पदं गोविन्दायेति द्वितीयं गोपीजनेति तृतीयं वल्लभायेति तुरीयं स्वाहेति पञ्चममिति पञ्चपदीं जपन् पञ्चाङ्गं द्यावाभूमी सूर्यचन्द्रमसौ साग्नी तद्रूपतया ब्रह्म सम्पद्यते ब्रह्म सम्पद्यते इति।” अर्थात् “ध्यानके अनन्तर उन श्रीकृष्ण नामक परब्रह्मका सन्तोष उत्पादन करेंगे। जल, भूमि, ई, इन्दु आदिके सम्मिलनसे उत्पन्न जो (क्लीं) कामबीज है, उसको आरम्भमें रखकर पाँच पदोंवाले अठारह अक्षरके 282 ।