भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1131

आठवाँ अध्याय 8/137-139 ] गोपालमन्त्रके जपके द्वारा परब्रह्म श्रीकृष्णके सन्तोषका विधान होता है। पाँच पद इस प्रकार हैं—क्लीं आरम्भमें रखकर कृष्णाय यह एक पद है, गोविन्दाय दूसरा पद है, गोपीजन तीसरा पद है, वल्लभाय चौथा पद है, स्वाहा पाँचवाँ पद है, यह पञ्चपदात्मक मन्त्र है। इसकी उपासनाका फल कह रहे हैं। पञ्चपदी जपशील पुरुष द्यावा, भूमि, अग्नि, सूर्य और चन्द्र, इन पञ्चाङ्गरूप नारायणात्मक परब्रह्मको पञ्चाङ्ग ब्रह्मस्वरूप होकर प्राप्त होते हैं।” श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरकी टीका— “जलं ककारः तद्वाचित्वात्, भूमिर्लकारः लकार-बीजत्वात्, तथा ई-दीर्घ ईकारः अग्निः कृतसन्धित्वात्, इन्दुरनुस्वारः तदाकारत्वात्। तेषां सम्पातो मिलनं तेन जातं यत् कामबीजं तदादिकं कृष्णायेत्येकपदमित्यर्थः।” अर्थात् ‘क्लीं’ यह बीज—जल (क-कार), भूमि (ल-कार), ई (दीर्घ ईकार वा अग्नि) एवं इन्दु (अनुस्वार) इनके सम्मिलनसे प्रकटित है। इस क्लीं-बीजको आदिमें (प्रारम्भमें) जोड़कर श्रीकृष्णमन्त्रसे श्रीकृष्ण-नामक परब्रह्मको रसन अर्थात् सन्तुष्ट करनेवाली उपासना हुई है। आदिलीला 5/212-214, 219, 221-222 संख्या देखें॥ 137॥ श्रीकृष्ण-माधुर्यकी आकर्षण-शक्ति :— पुरुष, योषित्, किंवा स्थावर-जङ्गम। सर्व-चित्ताकर्षक, साक्षात् मन्मथ-मदन ॥ 138 ॥ अनुवाद—पुरुष हो या फिर स्त्री, स्थावर (वृक्षादि स्थिर) हो या फिर जङ्गम (चलनेवाले प्राणी), श्रीकृष्ण सबके चित्तको आकर्षित करनेवाले हैं। वे मन्मथ (सबके मनको मथ डालनेवाले कामदेव) के मनको मथनेवाले साक्षात् मन्मथ-मदन हैं॥ 138 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—चिन्मयधामरूप वृन्दावनमें श्रीकृष्ण प्रकृतिसे अतीत अभिनव-मदनस्वरूपमें विराजमान हैं। ‘मदन’-शब्दसे सामान्यतः सभी जड़ीय कवि जो अर्थ करते हैं, वह प्राकृत-जगत्में माँसपिण्डोंको परस्पर आकर्षित करनेवाला, अत्यन्त प्राकृत और हेय (तुच्छ) कामतत्त्व है। सभी जीव जड़बद्ध होकर देहमें आत्म-अभिमान करके उस कामकी अधीनताको स्वीकार करते हैं। श्रीकृष्ण-सम्बन्धतत्त्व जाननेपर जीवकी अप्राकृत चिन्मय अवस्थामें अवस्थिति होती है। वह अवस्था दो प्रकारकी है—‘स्वरूपगत’ और ‘वस्तुगत’। तत्त्वकी प्रतीति हो गयी है, किन्तु ‘वस्तुतः’ अभी भी जड़सम्बन्ध दूर नहीं हुआ, ऐसी अवस्थामें चिन्मय-तत्त्वका थोड़ा-बहुत उदय होनेपर ‘स्वरूपगतः’ वृन्दावनमें अवस्थिति होती है, किन्तु ‘वस्तुतः’ नहीं होती। श्रीकृष्णकी इच्छासे स्थूल और लिङ्गमय जड़तत्त्वके साथ सम्बन्धरहित होनेपर ही ‘वस्तुतः’ वृन्दावनमें अवस्थिति होती है। स्वरूप-अवस्थितिमें साधना है, उस समय चिन्मयी कामगायत्री और चिन्मय कामबीजसे श्रीकृष्णकी उपासना होती है। पुरुष अथवा स्त्री, स्थावर अथवा जङ्गम, सभीको ही वे सर्वचित्ताकर्षक मन्मथ-मन्मथस्वरूप श्रीकृष्ण आकर्षित करते हैं। ‘कामगायत्री’—साढ़े चौबीस अक्षरका एक विशेष वेदमन्त्र है। ‘कामबीज’—श्रीकृष्णकी उपासनामें जिस बीजका जप होता है, वही॥ 137-138॥ अनुभाष्य—आदिलीला 4/147-148 संख्या देखें॥ 138॥ श्रीमद्भागवत (10/32/2) :— तासामाविरभूच्छौरिः स्मयमानमुखाम्बुजः। पीताम्बरधरः स्रग्वी साक्षान्मन्मथ-मन्मथः ॥ 139 ॥ अनुवाद—उसी समय उन रोदनकारी व्रजदेवियोंके बीचमें शूरवंशके शिरोमणि श्रीकृष्ण प्रकट हो गये। उनका मुखकमल मन्द-मन्द मुस्कानसे खिला हुआ था, वे गलेमें वनमाला और शरीरपर पीताम्बर धारण किये हुए थे। उनका वह रूप-सौन्दर्य सबके मनको मथ डालनेवाले साक्षात् कामदेवके मनको भी मथनेवाला था॥ 139 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 5/214 संख्या देखें॥ 139 ॥ । 283