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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1132

[ 8/140–143 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

नाना-भक्तेर रसामृत नानाविध हय। सेइ सब रसामृतेर 'विषय' 'आश्रय' ॥ 140 ॥

अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 140 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—पूर्वकथित पाँच प्रकारके रसामृत-उपासनामें भक्त ही उस रसके 'आश्रय' और उपास्य श्रीकृष्ण ही उस रसके 'विषय' हैं॥ 140 ॥

अनुभाष्य—'विषय'—श्रीकृष्ण। 'आश्रय'—रसाश्रित भक्त ॥ 140 ॥

श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 141 ॥

श्रीकृष्णके माधुर्यसे स्वयं श्रीकृष्ण ही मुग्ध :— शृङ्गार-रसराजमय-मूर्त्तिधर। अतएव आत्मपर्यन्त-सर्व-चित्त-हर ॥ 142 ॥

अनुवाद—समस्त रसोंमें शृङ्गाररस सर्वोपरि है, रसराज है और श्रीकृष्ण इसके मूर्त्तिमान विग्रह हैं। इसलिये उनका यह रूप सभीके चित्तको तो हरण करता ही है, उनके स्वयंके चित्तको भी हरण कर लेता है॥ 142 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—'शृङ्गार'—रसराज; 'तन्मय- मूर्त्तिधर'—श्रीकृष्ण; इस कारणसे श्रीकृष्णका श्रीरूप स्वयं श्रीकृष्ण तकके भी चित्तका हरण करता है ॥ 142 ॥

अनुभाष्य—आदिलीला 4/144 और 222 संख्या देखें ॥ 142 ॥

वार्षभानवी-दयितकी जय :— भक्तिरसामृतसिन्धु (1/1/1)— अखिलरसामृतमूर्त्तिः प्रसूमर- रुचिरुद्ध-तारका-पालिः। कलित-श्यामा-ललितो राधाप्रेयान् विधुर्जयति ॥ 141 ॥

अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 141 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—(भक्तिरसामृतसिन्धुमें) अखिलरसामृतमूर्त्ति, वर्धनशीलकान्तिके द्वारा तारका-पाली नामक दो सखियोंको अवरुद्ध करनेवाले, श्यामा और ललितासखीको वशमें करनेवाले, राधाजीके अत्यन्त प्रिय, ऐसे श्रीकृष्णचन्द्र जययुक्त हों। तात्पर्य यह है,—जो उनका जिस रसमें भी भजन करता है, श्रीकृष्ण उस रसामृतकी मूर्ति होनेपर भी श्रीराधिकाके रसके ही एकमात्र परम विषय हैं॥ 141 ॥

अनुभाष्य— अखिलरसामृतमूर्त्तिः (अखिलाः शान्ताद्याः पञ्च मुख्यरसाः हास्याद्याः सप्त गौणरसाश्च यस्मिन् तदेव अमृतं परमानन्द एव मूर्त्तिः यस्य सः) प्रसूमर-रुचिरुद्ध-तारका-पालिः (प्रसूमराभिः प्रसरणशीलाभिः रुचिभिः कान्तिभिः रुद्धे वशीकृते तारका-पाली येन सः) कलित-श्यामा-ललितः (कलिते आत्मसात्कृते श्यामा च ललिता च येन् सः) राधाप्रेयान् (राधायाः प्रेयान् प्रियतमः) विधुः (कृष्णचन्द्रः) जयति।

व्रजसुन्दरियोंके साथ नित्यविलासी श्रीकृष्ण :— श्रीगीतगोविन्द (1/11)— विश्वेषामनुरञ्जनेन जनयन्नानन्दमिन्दीवर- श्रेणीश्यामलकोमलैरुपिनयन्नङ्गैरनङ्गोत्सवम्। स्वच्छन्दं व्रजसुन्दरीभिरभितः प्रत्यङ्गमालिङ्गितः शृङ्गारः सखि मूर्त्तिमानिव मधौ मुग्धो हरिः क्रीड़ति॥ 143 ॥

अनुवाद—हे सखि ! इस वसन्तकालमें विलासरसमें उन्मत्त श्रीकृष्ण मूर्त्तिमान शृङ्गाररसस्वरूप होकर विहार कर रहे हैं। वे इन्दीवर कमलसे भी अतीव अभिराम कोमल श्यामल अङ्गोंसे कन्दर्प महोत्सवका सम्पादन कर रहे हैं। गोपियोंकी जितनी भी अभिलाषाएँ हैं, उससे भी कहीं अधिक उनकी उन्मत्त लालसाओंको अति अनुरागके साथ तृप्त कर रहे हैं, परन्तु व्रजसुन्दरियाँ विपरीत रतिरसमें आविष्ट हो विवश होकर उनके प्रत्येक अङ्ग-प्रत्यङ्गका सम्यक् एवं स्वतन्त्र रूपसे आलिङ्गन कर रही हैं॥ 143 ॥

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