श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1133, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय 8/143-146 ] अनुभाष्य—आदिलीला 4/224 संख्या देखें ॥ 143 ॥ श्रीकृष्णका रूप-माधुर्य नारायण और लक्ष्मीको भी आकर्षित करता है :- लक्ष्मीकान्तादि अवतारेर हरे मन। लक्ष्मी-आदि नारीगणेर करे आकर्षण ॥ 144 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णका रूप-माधुर्य लक्ष्मीकान्तादि (श्रीनारायणादि) सभी भगवत्-अवतारों और भगवत्-स्वरूपोंकी कान्ताएँ लक्ष्मी आदि नारियों, सभीके मनको आकर्षित करनेवाला है ॥ 144 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 5/223 और मध्यलीला 9/111-156 संख्या देखें ॥ 144 ॥ श्रीमद्भागवत (10/89/58) :— द्विजात्मजा मे युवयोर्दिदृक्षुणा, मयोपनीता भुवि धर्मगुप्तये। कलावतीर्णाववनेर्भरासुरान्, हत्वेह भूयस्त्वरयेतमन्ति मे ॥ 145 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 145 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भूमा पुरुषने कहा, - हे कृष्ण- अर्जुन! आप लोगोंके दर्शनोंकी इच्छासे मैं ब्राह्मण- कुमारोंको यहाँ लाया हूँ। आप लोग जगत्में धर्मकी रक्षाके लिये कलाके साथ अवतीर्ण हुए हो और अब पृथ्वीके भार-स्वरूप असुरोंको मारकर पुनः शीघ्र आगमन करो।' तात्पर्य यह है, - भूमापुरुष श्रीलक्ष्मीकान्तने श्रीकृष्णके माधुर्यसे मुग्ध होकर उनके रूपके दर्शनकी इच्छा होनेपर ब्राह्मण-कुमारोंको अपहरण करनेके छलसे श्रीकृष्णके दर्शन प्राप्त किये ॥ 145 ॥ अनुभाष्य—द्वारकामें ब्राह्मणकुमारकी अकाल-मृत्युके हाथसे रक्षा करनेके लिये प्रतिज्ञाबद्ध अर्जुनकी चेष्टाको विफल होते देखकर श्रीकृष्ण अर्जुनको साथ लेकर ब्राह्मणकुमारको दिखानेके लिये ब्रह्माण्डके बाहर प्रकृतिके परिणामस्वरूप, भीषण अन्धकारको सुदर्शन-चक्रके प्रभावसे पार करके बहुत विशाल जलके बीचमें 'महाकालपुर'में पहुँचे। वहाँ सहस्र फणवाले अनन्तके ऊपर शयन करनेवाले शेषशायीके दर्शन करके जब उन्होंने अभिवादन किया, तब परमेष्ठीपति भगवान् शेषशायीने श्रीकृष्ण- अर्जुनको कहा— धर्मगुप्तये (धर्मसंरक्षणाय) कलावतीर्णौ (कलाभिः सर्वाभिः शक्तिभिः अवतीर्णौ प्रकटौ) युवयोः दिदृक्षुणा (दर्शनेच्छुना) मे (मम) भुवि (महाकालपुरे) द्विजात्मजाः (विप्रकुमाराः) मया उपनीताः (आनीताः); भूयः पुनरपि अवनेः (पृथिव्याः) भरासुरान् (भारभूतान् विष्णु-विरोधि-दैत्यान्) हत्वा इह (अत्र) मे अन्ति (समीपं) त्वरया (शीघ्रमेव) इतम् (आगच्छतम्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 145 ॥ श्रीमद्भागवत (10/16/36) :— कस्यानुभावोऽस्य न देव विद्महे तवाङ्घ्रिरेणुस्पर्शाधिकारः। यद्वाञ्छया श्रीर्ललनाचरत्तपो विहाय कामान् सुचिरं धृतव्रता ॥ 146 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 146 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे देव! जिनकी चरणरजको प्राप्त करनेकी वासनासे लक्ष्मीने बहुत समय तक समस्त प्रकारके विषय-भोगोंका परित्याग करके दृढ़व्रत धारण करके तपस्या की थी, उस चरणरजको इस कालिय-नागने किस सुकृतिके द्वारा लाभ करनेका अधिकार प्राप्त किया, उसे हम नहीं जानती ॥ 146 ॥ अनुभाष्य—कालिय-नाग जब श्रीकृष्णके चरणकमलोंके प्रहारसे मूर्च्छित हो गया और उसके फण टूट गये थे, तब श्रीकृष्णका स्तव करते हुए नागपत्नियोंने कहा— यद्वाञ्छया (यत् यस्य पादपद्मरेणुस्पर्शाधिकारस्य वाञ्छया इच्छया) श्रीः (ब्रह्मादिसेव्या लक्ष्मीः) ललना (उत्तमा स्त्री अस्मद्-गरीयसी) [अपि सर्वान्] कामान् विहाय धृतव्रता (व्रतनिष्ठा तपस्विनी सती) सुचिरं तपः अचरत्, अस्य (सर्पयोनि-लब्धजीवस्यापि कालियस्य) तव अङ्घ्रिरेणुस्पर्शाधिकारः । 285