श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 8/124-148 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (तादृशदुर्लभपदरजःस्पर्शने अधिकारः सामर्थ्यं) कस्य (सुकृतस्य) अनुभावः (फलं),—[वयम् एतत्] न विद्महे (जानीमः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 146॥ अपने माधुर्यके द्वारा श्रीकृष्ण स्वयं ही मुग्ध :- आपन-माधुर्ये हरे आपनार मन। आपना आपनि चाहे करिते आलिङ्गन ॥ 147॥ अनुवाद—श्रीकृष्णका ऐसा अनुपम माधुर्य है कि वह उनके स्वयंके मनका हरण कर लेता है और वे स्वयं ही स्वयंका आलिङ्गन करना चाहते हैं॥ 147॥ अनुभाष्य—आदिलीला 4/148-158 संख्या देखें॥ 147॥ श्रीराधिकाकी भाँति अपने माधुर्यको आस्वादन करनेकी स्वयंकी ही व्यग्रता :— श्रीललितमाधव (8/34)— अपरिकलितपूर्वः कश्चमत्कारकारी स्फुरति मम गरीयानेष माधुर्यपूरः। अयमहमपि हन्त प्रेक्ष्य यं लुब्धचेताः सरभसमुपभोक्तुं कामये राधिकेव ॥ 148॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण बोले—“अहो ! यह प्रगाढ़ माधुर्य-चमत्कारकारी अनिर्वचनीय चित्रित श्रेष्ठ पुरुष कौन है? इनपर दृष्टि पड़ते ही मैं क्षुब्धचित्तसे इन्हें देखता ही जा रहा हूँ और राधिकाकी भाँति इनका बलपूर्वक आलिङ्गन करनेकी इच्छा हो रही है॥”148॥ अनुभाष्य—आदिलीला 4/146 संख्या देखें ॥ 148॥ अमृताणुकणिका—“श्रीकृष्णका नित्य विग्रह सच्चिदानन्दमय है। सामान्य रूपमें भगवान्के छह प्रकारके ऐश्वर्य हैं। (विष्णुपुराण 6/5/47)—‘ऐश्वर्यस्य समग्रस्य...’—अपार ऐश्वर्य, असीम वीर्य (पराक्रम), अनन्त यश, अपूर्व श्री (शोभा), पूर्णज्ञान (सर्वज्ञता) तथा पूर्ण वैराग्य—ये भगवान्के स्वरूपगत गुण हैं। श्रीकृष्ण चिन्मय जगत्के सूर्य-स्वरूप प्रकाशमान तथा चन्द्रस्वरूप आनन्द-विस्तारक हैं। श्रीकृष्णका स्वरूप नित्य-सिद्ध है; उनका वह स्वरूप, उनका धाम, उपकरण, परिकरवृन्द और उनके लीला-विलास सभी चिन्मय, नित्य, परम उपादेय, निर्दोष और परम विशुद्ध हैं। माधुर्य प्रधान प्रकाश ब्रजधाममें श्रीकृष्ण नित्य ब्रजलीला विलासी हैं। ‘वृन्दावने अप्राकृत नवीन मदन’—श्रीकृष्ण वृन्दावनमें अप्राकृत नवीन मदन हैं। एक है—‘प्राकृत मदन’ अथवा कामवेग। यह मायाकी एक वृत्ति है, जो मनमें उदित होकर समस्त इन्द्रियोंको क्षुब्ध कर देता है। पूर्व जन्मके संस्कारों, मायिक वस्तुओंके सङ्गके कारण इसका प्रकाश होता है। यह विषयोंकी ओर ही दौड़ता है और अपने सुखके लिये होता है; यह नरककी ओर ले जाता है। दूसरा होता है—‘अप्राकृत मदन अथवा काम’, यह स्वरूपशक्तिकी ह्लादिनी-संवित् वृत्तिसे निर्मित है और इसका उद्गम श्रीकृष्णसे है, अतः यह श्रीकृष्ण तक पहुँचाता है। अप्राकृत कामका अर्थ है स्वसुखरहित श्रीकृष्णसेवाकी वासना। ब्रजमें गोपियोंका प्रेम ही ‘काम’ नामसे जाना जाता है, क्योंकि अप्राकृत कामके विषय सच्चिदानन्द स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण हैं। वहाँ काम और प्रेम एक ही तात्पर्यमय है। श्रीकृष्णका अनुपम अलौकिक मदन-मोहन रूप पुरुष, स्त्री, किम्वा स्थावर-जङ्गम, समस्त सृष्टिके मनको आकर्षित करनेवाला है। श्रीरूप गोस्वामीने श्रीभक्ति-रसामृतसिन्धु श्लोक (2/1/23-43) ‘अयं नेता सुरम्याङ्गः ...गोविन्दस्य चतुष्टयम्’ में श्रीकृष्णके असंख्य गुणोंमेंसे चौंसठ गुणोंका निरूपण किया है, जो केवल दिग्दर्शन मात्र है, जैसे—नायक शिरोमणि श्रीकृष्णके अङ्ग अत्यन्त सुरम्य हैं अर्थात् इनका अङ्गसन्निवेश अतिशय रमणीय है, वे सर्वसुलक्षणयुक्त हैं; रुचिर हैं अर्थात् इनका सौन्दर्य नेत्रोंको आनन्द देनेवाला है; तेजसान्वित अर्थात् वे अतिशय प्रभावयुक्त हैं; बलीयान् अर्थात् अतिशय बलवान हैं; ‘वयसान्वितः’ अर्थात् उनकी नानाविध विलासमय नवकिशोर अवस्था है। श्रीकृष्णमें किशोर अवस्थाका उदय आठ वर्षमें होने लगता है। इसके पूर्व उन्होंने आदि-कैशोरमें 286 ।