भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1135

आठवाँ अध्याय 8/124-148 ] कलिय-दमन लीला की और मध्य कैशोरमें गोवर्धन-धारण लीला की। उनकी इन दोनों ही लीलाओंमें अपूर्व पराक्रमका प्रदर्शन है, जिसने व्रज-वल्लभीयोंके हृदयमें अपूर्व रसका सञ्चार करके उनके हृदयके प्रेमको पुष्ट और वर्धित किया। क्योंकि वीर-रस सदैव शृङ्गाररसका पोषक होकर रहता है। श्रीकृष्णमें पूर्ण कैशोरका उदय नवम वर्षमें होता है। इसी अवस्थाको सफल करते हुए वे रासलीलादि सम्पन्न करते हैं। श्रीकृष्णके चौंसठ गुणोंमेंसे पचास गुण भगवान्के अनुगृहीत पुरुषोंमें बिन्दु-बिन्दु रूपमें पाये जाते हैं। साधारण व्यक्तियोंमें भी इनके बिन्दुका आभास-मात्र जानना चाहिये। इनके अतिरिक्त पाँच गुण सदाशिव आदिमें आंशिक रूपमें तथा अन्य पाँच गुण श्रीनारायणमें भी प्रकाशित होते हैं। किन्तु श्रीकृष्णमें ये सभी गुण परिपूर्णतम मात्रामें नित्यकाल विराजमान रहते हैं। इनके अतिरिक्त चार असाधारण गुण-लीला- माधुरी, रूप-माधुरी, प्रेम-माधुरी और वेणु-माधुरी केवल ब्रजविलासी व्रजेन्द्रनन्दन-श्रीकृष्णमें ही पाये जाते हैं। श्रीकृष्णके ये चार असाधारण गुण अन्य किसी भगवत्-स्वरूपमें नहीं होते, यहाँ तक कि मधुरेश और द्वारकाधीश श्रीकृष्णमें भी ये नहीं होते। इसी कारण श्रीनारायण या अन्य भगवत्-स्वरूपोंमें अभेद होते हुए भी रसके उत्कर्षमें व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण सर्वोपरि हैं।

  1. 'लीला माधुर्य'—श्रीकृष्णकी प्रत्येक लीला अद्भुत दिव्यातिदिव्य रस-प्रवाही है। रसिकशेखर रसस्वरूप श्रीकृष्ण अपनी समस्त लीलाओंमें रासलीलाका ही सर्वाधिक रूपमें आस्वादन करते हैं। श्रीबृहद्वामन पुराणमें श्रीकृष्णके वचन- “सन्ति यद्यपि मे प्राज्या लीलास्तास्ता मनोहराः। न हि जाने स्मृते रासे मनो मे कीदृशं भवेत् ॥ ” अर्थात् “यद्यपि मेरी अनेक प्रकारकी मनोहारी प्रचुर लीलाएँ विद्यमान हैं, तो भी रासलीलाका स्मरण करते ही मेरा मन जिस प्रकार भावापन्न होता है, उसे मैं व्यक्त नहीं कर सकता।”
  2. 'प्रेम माधुर्य' - श्रीकृष्ण अपने सभी रसाश्रित प्रेमीजनोंको अपने प्रेमसे मण्डित करते हैं। इस विषयमें सखाओंके प्रेमका वर्णन भागवत (10/12/11) - 'इत्थं सतां...', आदि श्लोकोंमें देखा जाता है। व्रजके गोप-बालकोंका नित्यसिद्ध निर्मल सख्य-प्रेम जगत्में अतुलनीय है। श्रीकृष्ण भी इनके प्रेमके अधीन होकर अनेक प्रकारके क्रीड़ा-रसका आस्वादन करते हैं। खेलमें हार जानेपर श्रीकृष्ण सखाओंको कन्धेपर बैठाकर ले जाते हैं और कभी उनका जूठा खाते हैं, जिसे देखकर ब्रह्माजी भी मोहित हो जाते हैं। वात्सल्य रसके प्रेमीजनों यथा श्रीनन्द-यशोदा आदिके प्रेम और भाग्यकी महिमा भागवतके (10/14/32)-'अहो भाग्यमहो...', (10/9/20)- 'नेमं विरिञ्चो न भवो...' आदि श्लोकोंमें वर्णित है। श्रीनन्दादि व्रजवासियोंके धन्य भाग्य हैं, क्योंकि परमानन्दस्वरूप परंब्रह्म श्रीकृष्ण उनके सगे-सम्बन्धी और सुहृद् हैं। अपने प्रति चमत्कारमय असाधारण वात्सल्य प्रेमके कारण श्रीकृष्ण माता यशोदाकी डाँट-डपट सुनते हैं और उनके द्वारा रस्सीसे भी बँध जाते हैं। ऐसा सौभाग्य शिव, ब्रह्मा और यहाँ तक कि लक्ष्मीको भी नहीं प्राप्त हुआ है। श्रीकृष्णप्रेममें आविष्ट गोपियोंने गोपीगीतके श्लोक (10/31/15)में कहा है- “अटति यद्भवानह्नि.....” अर्थात् हे प्रियतम ! दिनके समय जब तुम वनमें विहारके लिये चले जाते हो, तब तुम्हारे अदर्शनसे हमें आधे क्षणका समय भी युगके समान प्रतीत होता है। संध्याके समय तुम्हारे लौटनेपर हम घुँघराले केशोंसे सुशोभित तुम्हारा परम सुन्दर मुख निहारने लगती हैं। उस समय पलकोंका गिरना भी हमारे लिये असहनीय हो जाता है और हमें ऐसा जान पड़ता है कि नेत्रोंपर पलकें बनानेवाला विधाता मूर्ख है। उद्धवजी भी गोपियोंके असाधारण प्रेमको देखकर आश्चर्यचकित होकर 'नायं श्रियोऽङ्ग' आदि श्लोकोंमें उनकी महिमाका गान कर रहे हैं। । 287