भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1136

[ 8/124-148 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 3) 'वेणु माधुर्य'— भागवत (10/35/15)—'सवनशस्तदुपधार्य सुरेशा:'— “श्रीकृष्णकी मधुर वंशीध्वनिको सुनकर इन्द्र, शिव, ब्रह्मादि स्वयं सुपण्डित होते हुए भी राग, ताल, स्वरादिके तत्त्व निर्णय करनेमें असमर्थ हो जाते हैं और मोहको प्राप्त होकर अपनी गर्दन झुकाकर तन्मय हो जाते हैं।” श्रीकृष्णकी सर्वाकर्षिणी वेणु-ध्वनि सुनकर गोपियाँ उन्मत्त होकर लोक-लज्जा, धैर्य, मर्यादा आदि सबको जलाञ्जली देकर अपने घरोंसे निकल पड़ती हैं। वेणुनादके द्वारा अपहृत चित्तके कारण वे गृहकार्योंको अथवा शृङ्गारादिको अधूरा छोड़कर, वस्त्रोंको उल्टा-सीधा धारणकर तथा उन्मादग्रस्त होकर श्रीकृष्ण जहाँ वेणु वादन कर रहे हैं, उधर द्रुत गतिसे चल पड़ती हैं। और भी, वाम्य-स्वभाववाली मानिनियोंके दुर्जय मानको वंशी ही भङ्ग करनेमें समर्थ है। इस प्रकार व्रजमें वंशी श्रीकृष्णके अनेक कार्य सिद्ध करनेके कारण सर्वकार्य-साधिका है। 4) 'रूप माधुर्य'— भागवत (3/2/12)में उद्धवजीके विदुरसे कहे वचन—'यन्मर्त्यलीलौपयिकं...' अर्थात् 'श्रीकृष्णकी यह दिव्य मूर्ति इतनी रमणीय है कि इसे देखकर श्रीकृष्ण स्वयं भी विस्मित हो जाते हैं। यह श्रीविग्रह सौन्दर्यकी पराकाष्ठा-स्वरूप तथा समस्त भूषणोंका भूषण-स्वरूप है अर्थात् समस्त लौकिक दृश्योंसे अलौकिक और अलौकिक दृश्योंसे परम लौकिक है।' श्रीकृष्णका विग्रह गोलोकका नित्यधन है। इस प्रपञ्चात्मक जगत्में उन्होंने अपनी उस मूर्तिको योगमायाके प्रभावके द्वारा प्रकट किया है। उनका यह दिव्य विग्रह मर्त्यजगत्के लिये उपयोगी है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्त्ती ठाकुरने अपनी टीकामें कहा है कि 'मर्त्यजगत्के लिये उपयोगी', ऐसा माननेसे श्रीविग्रहका अपकर्ष नहीं होता। वास्तवमें वैकुण्ठलीलाके स्वरूपोंसे भी इस जगत्में प्रकाशित श्रीविग्रहका अत्यधिक उत्कर्ष ही है। इसलिये कह रहे हैं-'स्वयोगमायाबलं' अर्थात् योगमायाने कुछ ऐश्वर्य या माधुर्यको गोपन करके इसे प्रकाशित नहीं किया, अपितु सबकुछ ही इस श्रीविग्रहमें संयोजित हुआ है। अधिक क्या वैकुण्ठमें भी इस प्रकारका सामर्थ्य योगमायाके द्वारा प्रदर्शित नहीं हुआ है। गोपियोंकी उक्ति भागवत (10/29/40) 'का स्त्र्यङ्ग ते कलपदायत' अर्थात् 'हे कृष्ण! तीनों लोकोंमें ऐसी कौन-सी रमणी है, जो मधुर-मधुर पद और आरोह-अवरोह क्रमसे विविध प्रकारकी मूर्च्छनाओंसे युक्त तुम्हारी वंशीकी तानको सुनकर तथा त्रिभुवनके सौभाग्यरूप तुम्हारे इस त्रिभङ्ग-ललित श्यामसुन्दर रूपको अपने नेत्रोंसे निहारकर सर्वथा मोहित होकर अपनी आर्य-मर्यादासे विचलित न हो जाय-नारीधर्म और लोक लज्जाको त्यागकर तुममें अनुरक्त न हो जाय? स्त्रियोंकी बात ही क्या है, तुम्हारा त्रिभुवन-मोहन रूप तथा मुरली सङ्गीत ऐसा मोहक है कि इसे देख-सुनकर गौएँ, पक्षी, वृक्ष और मृग आदि प्राणी भी परमानन्दसे पुलकित हो जाते हैं।' श्रीकृष्णमें विरुद्ध धर्माश्रयका गुण होनेके कारण श्रीकृष्णमें धीरोदात्त, धीरललित, धीरप्रशान्त और धीरोद्धत्त-चारों प्रकारका नायकत्व है। लीलाशक्ति श्रीकृष्णकी इच्छानुसार इन्हें प्रकट करती है। (भःरःसिः 1/1/1)— “अखिलरसामृतमूर्तिः प्रसृमररुचिरुद्धतारकापालिः। कलितश्यामा-ललितो राधाप्रेयान् विधुर्जयति॥ “श्रीकृष्णचन्द्र अखिल रसामृतमूर्ति हैं, समस्त द्वादश रसोंके विषय हैं, परम सुन्दर हैं, मन्मथके भी मनको मथनेवाले हैं तथा इनकी रुचि अर्थात् कान्ति, सौन्दर्य, गुणावली, रूपछटा, प्रभा व्याप्त होकर तारका और पाली नामक साधारणी गोपियोंको, (सुहृत्-पक्षा) श्यामा और (स्वपक्षा) ललिता आदि प्रमुख गोपियोंको भी वशीभूत कर लेती है। श्रीकृष्ण श्रीराधासे अत्यन्त प्रेम करते हैं, ऐसे श्रीराधाके प्रियतम श्रीकृष्ण जययुक्त हों।” 288 ।