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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 8/140–143 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

नाना-भक्तेर रसामृत नानाविध हय। सेइ सब रसामृतेर 'विषय' 'आश्रय' ॥ 140 ॥

अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 140 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—पूर्वकथित पाँच प्रकारके रसामृत-उपासनामें भक्त ही उस रसके 'आश्रय' और उपास्य श्रीकृष्ण ही उस रसके 'विषय' हैं॥ 140 ॥

अनुभाष्य—'विषय'—श्रीकृष्ण। 'आश्रय'—रसाश्रित भक्त ॥ 140 ॥

श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 141 ॥

श्रीकृष्णके माधुर्यसे स्वयं श्रीकृष्ण ही मुग्ध :— शृङ्गार-रसराजमय-मूर्त्तिधर। अतएव आत्मपर्यन्त-सर्व-चित्त-हर ॥ 142 ॥

अनुवाद—समस्त रसोंमें शृङ्गाररस सर्वोपरि है, रसराज है और श्रीकृष्ण इसके मूर्त्तिमान विग्रह हैं। इसलिये उनका यह रूप सभीके चित्तको तो हरण करता ही है, उनके स्वयंके चित्तको भी हरण कर लेता है॥ 142 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—'शृङ्गार'—रसराज; 'तन्मय- मूर्त्तिधर'—श्रीकृष्ण; इस कारणसे श्रीकृष्णका श्रीरूप स्वयं श्रीकृष्ण तकके भी चित्तका हरण करता है ॥ 142 ॥

अनुभाष्य—आदिलीला 4/144 और 222 संख्या देखें ॥ 142 ॥

वार्षभानवी-दयितकी जय :— भक्तिरसामृतसिन्धु (1/1/1)— अखिलरसामृतमूर्त्तिः प्रसूमर- रुचिरुद्ध-तारका-पालिः। कलित-श्यामा-ललितो राधाप्रेयान् विधुर्जयति ॥ 141 ॥

अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 141 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—(भक्तिरसामृतसिन्धुमें) अखिलरसामृतमूर्त्ति, वर्धनशीलकान्तिके द्वारा तारका-पाली नामक दो सखियोंको अवरुद्ध करनेवाले, श्यामा और ललितासखीको वशमें करनेवाले, राधाजीके अत्यन्त प्रिय, ऐसे श्रीकृष्णचन्द्र जययुक्त हों। तात्पर्य यह है,—जो उनका जिस रसमें भी भजन करता है, श्रीकृष्ण उस रसामृतकी मूर्ति होनेपर भी श्रीराधिकाके रसके ही एकमात्र परम विषय हैं॥ 141 ॥

अनुभाष्य— अखिलरसामृतमूर्त्तिः (अखिलाः शान्ताद्याः पञ्च मुख्यरसाः हास्याद्याः सप्त गौणरसाश्च यस्मिन् तदेव अमृतं परमानन्द एव मूर्त्तिः यस्य सः) प्रसूमर-रुचिरुद्ध-तारका-पालिः (प्रसूमराभिः प्रसरणशीलाभिः रुचिभिः कान्तिभिः रुद्धे वशीकृते तारका-पाली येन सः) कलित-श्यामा-ललितः (कलिते आत्मसात्कृते श्यामा च ललिता च येन् सः) राधाप्रेयान् (राधायाः प्रेयान् प्रियतमः) विधुः (कृष्णचन्द्रः) जयति।

व्रजसुन्दरियोंके साथ नित्यविलासी श्रीकृष्ण :— श्रीगीतगोविन्द (1/11)— विश्वेषामनुरञ्जनेन जनयन्नानन्दमिन्दीवर- श्रेणीश्यामलकोमलैरुपिनयन्नङ्गैरनङ्गोत्सवम्। स्वच्छन्दं व्रजसुन्दरीभिरभितः प्रत्यङ्गमालिङ्गितः शृङ्गारः सखि मूर्त्तिमानिव मधौ मुग्धो हरिः क्रीड़ति॥ 143 ॥

अनुवाद—हे सखि ! इस वसन्तकालमें विलासरसमें उन्मत्त श्रीकृष्ण मूर्त्तिमान शृङ्गाररसस्वरूप होकर विहार कर रहे हैं। वे इन्दीवर कमलसे भी अतीव अभिराम कोमल श्यामल अङ्गोंसे कन्दर्प महोत्सवका सम्पादन कर रहे हैं। गोपियोंकी जितनी भी अभिलाषाएँ हैं, उससे भी कहीं अधिक उनकी उन्मत्त लालसाओंको अति अनुरागके साथ तृप्त कर रहे हैं, परन्तु व्रजसुन्दरियाँ विपरीत रतिरसमें आविष्ट हो विवश होकर उनके प्रत्येक अङ्ग-प्रत्यङ्गका सम्यक् एवं स्वतन्त्र रूपसे आलिङ्गन कर रही हैं॥ 143 ॥

284 ।

आठवाँ अध्याय 8/143-146 ] अनुभाष्य—आदिलीला 4/224 संख्या देखें ॥ 143 ॥ श्रीकृष्णका रूप-माधुर्य नारायण और लक्ष्मीको भी आकर्षित करता है :- लक्ष्मीकान्तादि अवतारेर हरे मन। लक्ष्मी-आदि नारीगणेर करे आकर्षण ॥ 144 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णका रूप-माधुर्य लक्ष्मीकान्तादि (श्रीनारायणादि) सभी भगवत्-अवतारों और भगवत्-स्वरूपोंकी कान्ताएँ लक्ष्मी आदि नारियों, सभीके मनको आकर्षित करनेवाला है ॥ 144 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 5/223 और मध्यलीला 9/111-156 संख्या देखें ॥ 144 ॥ श्रीमद्भागवत (10/89/58) :— द्विजात्मजा मे युवयोर्दिदृक्षुणा, मयोपनीता भुवि धर्मगुप्तये। कलावतीर्णाववनेर्भरासुरान्, हत्वेह भूयस्त्वरयेतमन्ति मे ॥ 145 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 145 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भूमा पुरुषने कहा, - हे कृष्ण- अर्जुन! आप लोगोंके दर्शनोंकी इच्छासे मैं ब्राह्मण- कुमारोंको यहाँ लाया हूँ। आप लोग जगत्में धर्मकी रक्षाके लिये कलाके साथ अवतीर्ण हुए हो और अब पृथ्वीके भार-स्वरूप असुरोंको मारकर पुनः शीघ्र आगमन करो।' तात्पर्य यह है, - भूमापुरुष श्रीलक्ष्मीकान्तने श्रीकृष्णके माधुर्यसे मुग्ध होकर उनके रूपके दर्शनकी इच्छा होनेपर ब्राह्मण-कुमारोंको अपहरण करनेके छलसे श्रीकृष्णके दर्शन प्राप्त किये ॥ 145 ॥ अनुभाष्य—द्वारकामें ब्राह्मणकुमारकी अकाल-मृत्युके हाथसे रक्षा करनेके लिये प्रतिज्ञाबद्ध अर्जुनकी चेष्टाको विफल होते देखकर श्रीकृष्ण अर्जुनको साथ लेकर ब्राह्मणकुमारको दिखानेके लिये ब्रह्माण्डके बाहर प्रकृतिके परिणामस्वरूप, भीषण अन्धकारको सुदर्शन-चक्रके प्रभावसे पार करके बहुत विशाल जलके बीचमें 'महाकालपुर'में पहुँचे। वहाँ सहस्र फणवाले अनन्तके ऊपर शयन करनेवाले शेषशायीके दर्शन करके जब उन्होंने अभिवादन किया, तब परमेष्ठीपति भगवान् शेषशायीने श्रीकृष्ण- अर्जुनको कहा— धर्मगुप्तये (धर्मसंरक्षणाय) कलावतीर्णौ (कलाभिः सर्वाभिः शक्तिभिः अवतीर्णौ प्रकटौ) युवयोः दिदृक्षुणा (दर्शनेच्छुना) मे (मम) भुवि (महाकालपुरे) द्विजात्मजाः (विप्रकुमाराः) मया उपनीताः (आनीताः); भूयः पुनरपि अवनेः (पृथिव्याः) भरासुरान् (भारभूतान् विष्णु-विरोधि-दैत्यान्) हत्वा इह (अत्र) मे अन्ति (समीपं) त्वरया (शीघ्रमेव) इतम् (आगच्छतम्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 145 ॥ श्रीमद्भागवत (10/16/36) :— कस्यानुभावोऽस्य न देव विद्महे तवाङ्घ्रिरेणुस्पर्शाधिकारः। यद्वाञ्छया श्रीर्ललनाचरत्तपो विहाय कामान् सुचिरं धृतव्रता ॥ 146 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 146 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे देव! जिनकी चरणरजको प्राप्त करनेकी वासनासे लक्ष्मीने बहुत समय तक समस्त प्रकारके विषय-भोगोंका परित्याग करके दृढ़व्रत धारण करके तपस्या की थी, उस चरणरजको इस कालिय-नागने किस सुकृतिके द्वारा लाभ करनेका अधिकार प्राप्त किया, उसे हम नहीं जानती ॥ 146 ॥ अनुभाष्य—कालिय-नाग जब श्रीकृष्णके चरणकमलोंके प्रहारसे मूर्च्छित हो गया और उसके फण टूट गये थे, तब श्रीकृष्णका स्तव करते हुए नागपत्नियोंने कहा— यद्वाञ्छया (यत् यस्य पादपद्मरेणुस्पर्शाधिकारस्य वाञ्छया इच्छया) श्रीः (ब्रह्मादिसेव्या लक्ष्मीः) ललना (उत्तमा स्त्री अस्मद्-गरीयसी) [अपि सर्वान्] कामान् विहाय धृतव्रता (व्रतनिष्ठा तपस्विनी सती) सुचिरं तपः अचरत्, अस्य (सर्पयोनि-लब्धजीवस्यापि कालियस्य) तव अङ्घ्रिरेणुस्पर्शाधिकारः । 285

[ 8/124-148 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (तादृशदुर्लभपदरजःस्पर्शने अधिकारः सामर्थ्यं) कस्य (सुकृतस्य) अनुभावः (फलं),—[वयम् एतत्] न विद्महे (जानीमः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 146॥ अपने माधुर्यके द्वारा श्रीकृष्ण स्वयं ही मुग्ध :- आपन-माधुर्ये हरे आपनार मन। आपना आपनि चाहे करिते आलिङ्गन ॥ 147॥ अनुवाद—श्रीकृष्णका ऐसा अनुपम माधुर्य है कि वह उनके स्वयंके मनका हरण कर लेता है और वे स्वयं ही स्वयंका आलिङ्गन करना चाहते हैं॥ 147॥ अनुभाष्य—आदिलीला 4/148-158 संख्या देखें॥ 147॥ श्रीराधिकाकी भाँति अपने माधुर्यको आस्वादन करनेकी स्वयंकी ही व्यग्रता :— श्रीललितमाधव (8/34)— अपरिकलितपूर्वः कश्चमत्कारकारी स्फुरति मम गरीयानेष माधुर्यपूरः। अयमहमपि हन्त प्रेक्ष्य यं लुब्धचेताः सरभसमुपभोक्तुं कामये राधिकेव ॥ 148॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण बोले—“अहो ! यह प्रगाढ़ माधुर्य-चमत्कारकारी अनिर्वचनीय चित्रित श्रेष्ठ पुरुष कौन है? इनपर दृष्टि पड़ते ही मैं क्षुब्धचित्तसे इन्हें देखता ही जा रहा हूँ और राधिकाकी भाँति इनका बलपूर्वक आलिङ्गन करनेकी इच्छा हो रही है॥”148॥ अनुभाष्य—आदिलीला 4/146 संख्या देखें ॥ 148॥ अमृताणुकणिका—“श्रीकृष्णका नित्य विग्रह सच्चिदानन्दमय है। सामान्य रूपमें भगवान्‌के छह प्रकारके ऐश्वर्य हैं। (विष्णुपुराण 6/5/47)—‘ऐश्वर्यस्य समग्रस्य...’—अपार ऐश्वर्य, असीम वीर्य (पराक्रम), अनन्त यश, अपूर्व श्री (शोभा), पूर्णज्ञान (सर्वज्ञता) तथा पूर्ण वैराग्य—ये भगवान्‌के स्वरूपगत गुण हैं। श्रीकृष्ण चिन्मय जगत्‌के सूर्य-स्वरूप प्रकाशमान तथा चन्द्रस्वरूप आनन्द-विस्तारक हैं। श्रीकृष्णका स्वरूप नित्य-सिद्ध है; उनका वह स्वरूप, उनका धाम, उपकरण, परिकरवृन्द और उनके लीला-विलास सभी चिन्मय, नित्य, परम उपादेय, निर्दोष और परम विशुद्ध हैं। माधुर्य प्रधान प्रकाश ब्रजधाममें श्रीकृष्ण नित्य ब्रजलीला विलासी हैं। ‘वृन्दावने अप्राकृत नवीन मदन’—श्रीकृष्ण वृन्दावनमें अप्राकृत नवीन मदन हैं। एक है—‘प्राकृत मदन’ अथवा कामवेग। यह मायाकी एक वृत्ति है, जो मनमें उदित होकर समस्त इन्द्रियोंको क्षुब्ध कर देता है। पूर्व जन्मके संस्कारों, मायिक वस्तुओंके सङ्गके कारण इसका प्रकाश होता है। यह विषयोंकी ओर ही दौड़ता है और अपने सुखके लिये होता है; यह नरककी ओर ले जाता है। दूसरा होता है—‘अप्राकृत मदन अथवा काम’, यह स्वरूपशक्तिकी ह्लादिनी-संवित् वृत्तिसे निर्मित है और इसका उद्गम श्रीकृष्णसे है, अतः यह श्रीकृष्ण तक पहुँचाता है। अप्राकृत कामका अर्थ है स्वसुखरहित श्रीकृष्णसेवाकी वासना। ब्रजमें गोपियोंका प्रेम ही ‘काम’ नामसे जाना जाता है, क्योंकि अप्राकृत कामके विषय सच्चिदानन्द स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण हैं। वहाँ काम और प्रेम एक ही तात्पर्यमय है। श्रीकृष्णका अनुपम अलौकिक मदन-मोहन रूप पुरुष, स्त्री, किम्वा स्थावर-जङ्गम, समस्त सृष्टिके मनको आकर्षित करनेवाला है। श्रीरूप गोस्वामीने श्रीभक्ति-रसामृतसिन्धु श्लोक (2/1/23-43) ‘अयं नेता सुरम्याङ्गः ...गोविन्दस्य चतुष्टयम्’ में श्रीकृष्णके असंख्य गुणोंमेंसे चौंसठ गुणोंका निरूपण किया है, जो केवल दिग्दर्शन मात्र है, जैसे—नायक शिरोमणि श्रीकृष्णके अङ्ग अत्यन्त सुरम्य हैं अर्थात् इनका अङ्गसन्निवेश अतिशय रमणीय है, वे सर्वसुलक्षणयुक्त हैं; रुचिर हैं अर्थात् इनका सौन्दर्य नेत्रोंको आनन्द देनेवाला है; तेजसान्वित अर्थात् वे अतिशय प्रभावयुक्त हैं; बलीयान् अर्थात् अतिशय बलवान हैं; ‘वयसान्वितः’ अर्थात् उनकी नानाविध विलासमय नवकिशोर अवस्था है। श्रीकृष्णमें किशोर अवस्थाका उदय आठ वर्षमें होने लगता है। इसके पूर्व उन्होंने आदि-कैशोरमें 286 ।

आठवाँ अध्याय 8/124-148 ] कलिय-दमन लीला की और मध्य कैशोरमें गोवर्धन-धारण लीला की। उनकी इन दोनों ही लीलाओंमें अपूर्व पराक्रमका प्रदर्शन है, जिसने व्रज-वल्लभीयोंके हृदयमें अपूर्व रसका सञ्चार करके उनके हृदयके प्रेमको पुष्ट और वर्धित किया। क्योंकि वीर-रस सदैव शृङ्गाररसका पोषक होकर रहता है। श्रीकृष्णमें पूर्ण कैशोरका उदय नवम वर्षमें होता है। इसी अवस्थाको सफल करते हुए वे रासलीलादि सम्पन्न करते हैं। श्रीकृष्णके चौंसठ गुणोंमेंसे पचास गुण भगवान्के अनुगृहीत पुरुषोंमें बिन्दु-बिन्दु रूपमें पाये जाते हैं। साधारण व्यक्तियोंमें भी इनके बिन्दुका आभास-मात्र जानना चाहिये। इनके अतिरिक्त पाँच गुण सदाशिव आदिमें आंशिक रूपमें तथा अन्य पाँच गुण श्रीनारायणमें भी प्रकाशित होते हैं। किन्तु श्रीकृष्णमें ये सभी गुण परिपूर्णतम मात्रामें नित्यकाल विराजमान रहते हैं। इनके अतिरिक्त चार असाधारण गुण-लीला- माधुरी, रूप-माधुरी, प्रेम-माधुरी और वेणु-माधुरी केवल ब्रजविलासी व्रजेन्द्रनन्दन-श्रीकृष्णमें ही पाये जाते हैं। श्रीकृष्णके ये चार असाधारण गुण अन्य किसी भगवत्-स्वरूपमें नहीं होते, यहाँ तक कि मधुरेश और द्वारकाधीश श्रीकृष्णमें भी ये नहीं होते। इसी कारण श्रीनारायण या अन्य भगवत्-स्वरूपोंमें अभेद होते हुए भी रसके उत्कर्षमें व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण सर्वोपरि हैं।

  1. 'लीला माधुर्य'—श्रीकृष्णकी प्रत्येक लीला अद्भुत दिव्यातिदिव्य रस-प्रवाही है। रसिकशेखर रसस्वरूप श्रीकृष्ण अपनी समस्त लीलाओंमें रासलीलाका ही सर्वाधिक रूपमें आस्वादन करते हैं। श्रीबृहद्वामन पुराणमें श्रीकृष्णके वचन- “सन्ति यद्यपि मे प्राज्या लीलास्तास्ता मनोहराः। न हि जाने स्मृते रासे मनो मे कीदृशं भवेत् ॥ ” अर्थात् “यद्यपि मेरी अनेक प्रकारकी मनोहारी प्रचुर लीलाएँ विद्यमान हैं, तो भी रासलीलाका स्मरण करते ही मेरा मन जिस प्रकार भावापन्न होता है, उसे मैं व्यक्त नहीं कर सकता।”
  2. 'प्रेम माधुर्य' - श्रीकृष्ण अपने सभी रसाश्रित प्रेमीजनोंको अपने प्रेमसे मण्डित करते हैं। इस विषयमें सखाओंके प्रेमका वर्णन भागवत (10/12/11) - 'इत्थं सतां...', आदि श्लोकोंमें देखा जाता है। व्रजके गोप-बालकोंका नित्यसिद्ध निर्मल सख्य-प्रेम जगत्में अतुलनीय है। श्रीकृष्ण भी इनके प्रेमके अधीन होकर अनेक प्रकारके क्रीड़ा-रसका आस्वादन करते हैं। खेलमें हार जानेपर श्रीकृष्ण सखाओंको कन्धेपर बैठाकर ले जाते हैं और कभी उनका जूठा खाते हैं, जिसे देखकर ब्रह्माजी भी मोहित हो जाते हैं। वात्सल्य रसके प्रेमीजनों यथा श्रीनन्द-यशोदा आदिके प्रेम और भाग्यकी महिमा भागवतके (10/14/32)-'अहो भाग्यमहो...', (10/9/20)- 'नेमं विरिञ्चो न भवो...' आदि श्लोकोंमें वर्णित है। श्रीनन्दादि व्रजवासियोंके धन्य भाग्य हैं, क्योंकि परमानन्दस्वरूप परंब्रह्म श्रीकृष्ण उनके सगे-सम्बन्धी और सुहृद् हैं। अपने प्रति चमत्कारमय असाधारण वात्सल्य प्रेमके कारण श्रीकृष्ण माता यशोदाकी डाँट-डपट सुनते हैं और उनके द्वारा रस्सीसे भी बँध जाते हैं। ऐसा सौभाग्य शिव, ब्रह्मा और यहाँ तक कि लक्ष्मीको भी नहीं प्राप्त हुआ है। श्रीकृष्णप्रेममें आविष्ट गोपियोंने गोपीगीतके श्लोक (10/31/15)में कहा है- “अटति यद्भवानह्नि.....” अर्थात् हे प्रियतम ! दिनके समय जब तुम वनमें विहारके लिये चले जाते हो, तब तुम्हारे अदर्शनसे हमें आधे क्षणका समय भी युगके समान प्रतीत होता है। संध्याके समय तुम्हारे लौटनेपर हम घुँघराले केशोंसे सुशोभित तुम्हारा परम सुन्दर मुख निहारने लगती हैं। उस समय पलकोंका गिरना भी हमारे लिये असहनीय हो जाता है और हमें ऐसा जान पड़ता है कि नेत्रोंपर पलकें बनानेवाला विधाता मूर्ख है। उद्धवजी भी गोपियोंके असाधारण प्रेमको देखकर आश्चर्यचकित होकर 'नायं श्रियोऽङ्ग' आदि श्लोकोंमें उनकी महिमाका गान कर रहे हैं। । 287

[ 8/124-148 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 3) 'वेणु माधुर्य'— भागवत (10/35/15)—'सवनशस्तदुपधार्य सुरेशा:'— “श्रीकृष्णकी मधुर वंशीध्वनिको सुनकर इन्द्र, शिव, ब्रह्मादि स्वयं सुपण्डित होते हुए भी राग, ताल, स्वरादिके तत्त्व निर्णय करनेमें असमर्थ हो जाते हैं और मोहको प्राप्त होकर अपनी गर्दन झुकाकर तन्मय हो जाते हैं।” श्रीकृष्णकी सर्वाकर्षिणी वेणु-ध्वनि सुनकर गोपियाँ उन्मत्त होकर लोक-लज्जा, धैर्य, मर्यादा आदि सबको जलाञ्जली देकर अपने घरोंसे निकल पड़ती हैं। वेणुनादके द्वारा अपहृत चित्तके कारण वे गृहकार्योंको अथवा शृङ्गारादिको अधूरा छोड़कर, वस्त्रोंको उल्टा-सीधा धारणकर तथा उन्मादग्रस्त होकर श्रीकृष्ण जहाँ वेणु वादन कर रहे हैं, उधर द्रुत गतिसे चल पड़ती हैं। और भी, वाम्य-स्वभाववाली मानिनियोंके दुर्जय मानको वंशी ही भङ्ग करनेमें समर्थ है। इस प्रकार व्रजमें वंशी श्रीकृष्णके अनेक कार्य सिद्ध करनेके कारण सर्वकार्य-साधिका है। 4) 'रूप माधुर्य'— भागवत (3/2/12)में उद्धवजीके विदुरसे कहे वचन—'यन्मर्त्यलीलौपयिकं...' अर्थात् 'श्रीकृष्णकी यह दिव्य मूर्ति इतनी रमणीय है कि इसे देखकर श्रीकृष्ण स्वयं भी विस्मित हो जाते हैं। यह श्रीविग्रह सौन्दर्यकी पराकाष्ठा-स्वरूप तथा समस्त भूषणोंका भूषण-स्वरूप है अर्थात् समस्त लौकिक दृश्योंसे अलौकिक और अलौकिक दृश्योंसे परम लौकिक है।' श्रीकृष्णका विग्रह गोलोकका नित्यधन है। इस प्रपञ्चात्मक जगत्में उन्होंने अपनी उस मूर्तिको योगमायाके प्रभावके द्वारा प्रकट किया है। उनका यह दिव्य विग्रह मर्त्यजगत्के लिये उपयोगी है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्त्ती ठाकुरने अपनी टीकामें कहा है कि 'मर्त्यजगत्के लिये उपयोगी', ऐसा माननेसे श्रीविग्रहका अपकर्ष नहीं होता। वास्तवमें वैकुण्ठलीलाके स्वरूपोंसे भी इस जगत्में प्रकाशित श्रीविग्रहका अत्यधिक उत्कर्ष ही है। इसलिये कह रहे हैं-'स्वयोगमायाबलं' अर्थात् योगमायाने कुछ ऐश्वर्य या माधुर्यको गोपन करके इसे प्रकाशित नहीं किया, अपितु सबकुछ ही इस श्रीविग्रहमें संयोजित हुआ है। अधिक क्या वैकुण्ठमें भी इस प्रकारका सामर्थ्य योगमायाके द्वारा प्रदर्शित नहीं हुआ है। गोपियोंकी उक्ति भागवत (10/29/40) 'का स्त्र्यङ्ग ते कलपदायत' अर्थात् 'हे कृष्ण! तीनों लोकोंमें ऐसी कौन-सी रमणी है, जो मधुर-मधुर पद और आरोह-अवरोह क्रमसे विविध प्रकारकी मूर्च्छनाओंसे युक्त तुम्हारी वंशीकी तानको सुनकर तथा त्रिभुवनके सौभाग्यरूप तुम्हारे इस त्रिभङ्ग-ललित श्यामसुन्दर रूपको अपने नेत्रोंसे निहारकर सर्वथा मोहित होकर अपनी आर्य-मर्यादासे विचलित न हो जाय-नारीधर्म और लोक लज्जाको त्यागकर तुममें अनुरक्त न हो जाय? स्त्रियोंकी बात ही क्या है, तुम्हारा त्रिभुवन-मोहन रूप तथा मुरली सङ्गीत ऐसा मोहक है कि इसे देख-सुनकर गौएँ, पक्षी, वृक्ष और मृग आदि प्राणी भी परमानन्दसे पुलकित हो जाते हैं।' श्रीकृष्णमें विरुद्ध धर्माश्रयका गुण होनेके कारण श्रीकृष्णमें धीरोदात्त, धीरललित, धीरप्रशान्त और धीरोद्धत्त-चारों प्रकारका नायकत्व है। लीलाशक्ति श्रीकृष्णकी इच्छानुसार इन्हें प्रकट करती है। (भःरःसिः 1/1/1)— “अखिलरसामृतमूर्तिः प्रसृमररुचिरुद्धतारकापालिः। कलितश्यामा-ललितो राधाप्रेयान् विधुर्जयति॥ “श्रीकृष्णचन्द्र अखिल रसामृतमूर्ति हैं, समस्त द्वादश रसोंके विषय हैं, परम सुन्दर हैं, मन्मथके भी मनको मथनेवाले हैं तथा इनकी रुचि अर्थात् कान्ति, सौन्दर्य, गुणावली, रूपछटा, प्रभा व्याप्त होकर तारका और पाली नामक साधारणी गोपियोंको, (सुहृत्-पक्षा) श्यामा और (स्वपक्षा) ललिता आदि प्रमुख गोपियोंको भी वशीभूत कर लेती है। श्रीकृष्ण श्रीराधासे अत्यन्त प्रेम करते हैं, ऐसे श्रीराधाके प्रियतम श्रीकृष्ण जययुक्त हों।” 288 ।

आठवाँ अध्याय 8/124-148 ] इस श्लोकमें श्रीरूप गोस्वामीने श्रीराधाकी सखियों ललिता और श्यामाके नाम दिये हैं। श्रीराधाके साथ श्रीकृष्णके स्वच्छन्द विहारमें इनके द्वारा रसपुष्टिका योगदान होता है। ये दोनों ही यूथेश्वरियाँ हैं। श्रीकृष्ण वृन्दावनमें अप्राकृत नवीन मदन हैं और उनकी उपासना कामगायत्री और कामबीजके द्वारा होती है। 'कम' धातुसे काम शब्दकी निष्पत्ति होती है। कामका अर्थ है—जिसकी कामना की जाय, अभिलाषा की जाय। श्रीकृष्णकी ही कामना सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि वे अतिशय रूपवान हैं, अत्यन्त मधुर हैं, उनका यह सौन्दर्य और माधुर्य क्षण-क्षणमें नित्य नवीन अनुभव होता है। अतः वे अप्राकृत नवीन मदन हैं, उनका यह स्वरूप प्रकृतिसे अतीत है। यह अप्राकृत मदन स्वरूप उपासकोंके हृदयमें तीव्र कामना उत्पन्न करके उन्हें मत्त कर देता है। श्रीकृष्ण परम करुण और रसिकशेखर हैं। वे रस स्वरूप हैं। रस शब्दके दो अर्थ होते हैं—आस्वाद्य 'रस' और रस-आस्वादक 'रसिक'। वे रस-रूपमें आस्वाद्य हैं और रसिक-रूपमें वे आस्वादक हैं। उसी 'रसस्वरूप' रूपमें श्रीकृष्णको प्राप्त करनेके लिये कामबीज और कामगायत्रीके द्वारा उनकी उपासना की जाती है। कामगायत्री श्रीकृष्णका ही स्वरूप है। इस रसमय ब्रह्मकी उपासना कामबीजयुक्त कृष्णमन्त्र 'गोपालमन्त्र' और कामगायत्रीके द्वारा ही सिद्ध होती है। बीजयुक्त होनेपर ही मन्त्र सम्पूर्ण होता है। कामबीज, 'क्लीं'—यह आदि एकाक्षर बीज या कामबीज है। श्रीबृहद्गौतमीय तन्त्र तथा उपनिषदोंमें इसका अर्थ इस प्रकार है। श्रीभगवान्ने 'क्लीं'—इस कामबीजके द्वारा इस जगत्की सृष्टि की। इस बीजके अन्तर्गत 'क'-कारसे जल, 'ल'-कारसे भूमि, 'ई'-कारसे अग्नि तथा नाद अर्थात् चन्द्रसे वायु एवं बिन्दुसे आकाश उत्पन्न हुआ है। इसलिये कामबीजात्मक मन्त्र ही समस्त प्राणियोंका मूल कारण है। रागमार्गके अनुसार मन्त्रार्थ—'क'-कारसे सच्चिदानन्द- विग्रह परम पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण, 'ल'-कारसे श्रीराधाकृष्णके प्रेम-जनित परमानन्द सुख-समुद्र, 'ई'-कारसे नित्य वृन्दावनेश्वरी सर्वप्रेयसी शिरोमणि परमा प्रकृति श्रीराधा तथा चन्द्रबिन्दुसे श्रीराधाकृष्णका परस्पर चुम्बनानन्द माधुर्य। कृष्णमन्त्र या गोपाल-मन्त्र पाँच भागोंमें विभक्त है—

  1. 'कृष्णाय'—श्रीकृष्ण अपनी वेणु, रूप, लीला आदिके अतुलनीय माधुर्य प्रवाहसे त्रिजगत्के स्थावर-जङ्गमादि सबके चित्तको आकर्षित करते हैं। इस प्रकार श्रीकृष्णके भुवनमोहन स्वरूपके साथ साधकका सम्बन्ध होता है।
  2. 'गोविन्दाय'—श्रीकृष्ण नन्द-गोकुलमें मनोहर नवजलधरवर्ण श्यामसुन्दर रूपमें अपनी मधुर लीलाका विस्तार करते हैं। नयन, कर्ण आदि समस्त इन्द्रियों और हृदयको उल्लसित करनेवाले गोविन्दकी साधक अपनी समस्त इन्द्रियोंके द्वारा आराधना करता है, अर्थात् अभिधेय तत्त्वमें प्रतिष्ठित होता है।
  3. 'गोपीजन'—'गोपी' श्रीकृष्णकी एक विशेष ह्लादिनी शक्ति है। यह भक्तोंको प्रेम प्रदानकर उनका पालन-पोषण करती हैं। श्रीराधा ही ह्लादिनी शक्ति-स्वरूपिणी हैं। इसलिये 'गोपी' शब्दसे मूलप्रकृति श्रीराधा तथा 'जन' शब्दसे श्रीराधाकी कायव्यूहरूपा ललिता, विशाखा आदि सखियोंका बोध होता है।
  4. 'वल्लभाय'—जो सर्वश्रेष्ठ नायकके रूपमें गोपियोंके साथ परम मधुर लीला-विलास करते हैं, वे ही गोपीजनवल्लभ श्रीराधिका और उनकी सखियोंके प्राणप्रियतम हैं। गोपीजनवल्लभ ही इस मन्त्रके प्रयोजन-तत्त्व हैं।
  5. 'स्वाहा'—यह श्रीकृष्णकी स्वरूपभूता चिद् शक्ति योगमाया हैं, जो भक्तोंको श्रीकृष्णके पादपद्मोंमें समर्पण करती हैं। 'स्वाहा' पदके उच्चारणसे ही श्रीराधाकृष्ण युगलमें सम्पूर्ण रूपसे आत्मसमर्पण होता है। 'कामगायत्री'—यह ब्रह्म गायत्रीका ही सिद्ध स्वरूप परिपक्व फल है। यह श्रीकृष्णका ही स्वरूप है और रसमय ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाला है। इसे कृष्णगायत्री । 289

[ 8/124–152 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

न कहकर कामगायत्री इसलिये कहा गया, क्योंकि इसमें सम्मिलित 'काम' नाम केवल मधुर भावमें ही ग्रहण किया जाता है। श्रीकृष्णकी सर्वोत्कृष्ट अवस्थाका नाम 'काम' है। वही कामदेव अनङ्गके रूपमें हैं। कामगायत्रीमें साढ़े चौबीस अक्षर हैं, जो श्रीकृष्णके अङ्गोंमें साढ़े चौबीस चन्द्रोंको लक्ष्य करते हैं, यथा—एक मुखचन्द्र, दो गण्ड(कपोल), एक चन्दन बिन्दु, अर्धचन्द्र ललाट तथा बीस चन्द्र हस्त तथा पदके नख। उनका ललाट केशोंसे आधा ढका हुआ होता है, इसलिये उसे अष्टमीका अर्धचन्द्र कहा गया है। काम गायत्रीमें 'वि'के पूर्व जो 'य' है, वही अर्धाक्षर माना गया है और ललाटकी स्थिति भी मन्त्रमें इसी स्थानपर है। श्रीकृष्णके विषयमें अर्धचन्द्र भी पूर्ण ही है, क्योंकि श्रीकृष्ण अखण्ड हैं। श्रुतिके 'ॐ पूर्णमदं' श्लोकके अनुसार श्रीकृष्णका एक अंश और कला भी परिपूर्ण है। श्रीकृष्णके अङ्ग-स्थित ये चन्द्र उदित होकर त्रिजगत्‌को काममय करते हैं, सबके हृदयमें श्रीकृष्णसेवा सुख वासनाका उद्दीपन कराते हैं। कामगायत्री सभी गायत्रियोंमें सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि उसमें जो ध्यान और प्रार्थना है वह सम्पूर्ण रूपसे चिद्-विलासमय है, जो अन्य किसी गायत्रीमें नहीं है। इस गायत्रीमें श्रीगोपीजनवल्लभके परिपूर्ण ध्यानके पश्चात् उनकी लीलाकी स्फूर्ति और उस अप्राकृत अनङ्गको प्राप्त करनेकी प्रार्थना होती है। व्रजगोपियोंसे परिवेष्ठित श्रीमती राधिकाके सङ्ग लीलाविलासी नवीन मदन श्रीकृष्णको सुख देनेकी कामनामें तन्मय हो जाना ही कामबीज उपासनाका तात्पर्य है। गोपाल-मन्त्रके कृष्ण, गोविन्द और गोपीजनवल्लभ कामगायत्रीमें इस प्रकार अवस्थित हैं—'कृष्ण'—कामदेव, 'गोविन्द'—पुष्पबाण और 'गोपीजनवल्लभ'—अनङ्ग। कामबीजके अन्तर्गत पञ्चाक्षर ही श्रीकृष्णके पञ्चबाण हैं। श्रीकृष्णकी सेवाके लिये बलवती वासना ही पञ्चबाणकी क्रिया है। रूप, रस, शब्द, गन्ध, स्पर्शके द्वारा आस्वादन ही पुष्पबाण हैं। श्रीकृष्ण ही साक्षात् मन्मथ-मन्मथ अनङ्ग हैं। वे अपनी कन्दर्परूप लीलाको प्रकट करके त्रिभुवनको जय करते हैं। साधकगण कामगायत्री उपासनाके द्वारा व्रजमें विराजित श्रीराधाकृष्णका सेवासुख लाभ करते हैं।”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 124-148 ॥

(2) श्रीराधिकाके तत्त्वका वर्णन आरम्भ :— एइ त' संक्षेपे कहिल कृष्णेर स्वरूप। एबे संक्षेपे कहि राधा-तत्त्वरूप ॥ 149 ॥ श्रीकृष्णकी तीन शक्तियाँ :— कृष्णेर अनन्त-शक्ति, ताते तिन-प्रधान। 'चिच्छक्ति', 'मायाशक्ति', 'जीवशक्ति'—नाम ॥ 150 ॥ 'अन्तरङ्गा', 'बहिरङ्गा', 'तटस्था' कहि यारे। अन्तरङ्गा 'स्वरूप शक्ति'—सबार उपरे ॥ 151 ॥ अनुवाद—(श्रीरामानन्द रायने कहा—) इस प्रकार संक्षेपमें मैंने श्रीकृष्णके स्वरूपका वर्णन किया। अब श्रीराधा-तत्त्वका स्वरूप संक्षेपमें सुनिये। श्रीकृष्णकी अनन्त शक्तियाँ हैं, उनमेंसे तीन शक्तियाँ प्रधान हैं—'चित्-शक्ति', 'मायाशक्ति' और 'जीवशक्ति'। इन्हें क्रमशः 'अन्तरङ्गा', 'बहिरङ्गा' और 'तटस्था' भी कहते हैं। इन सभीमें अन्तरङ्गा अर्थात् 'स्वरूप शक्ति' प्रधान है॥ 149-151 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 2/101-103 संख्या, 5/42, 45, 57-58 संख्या देखें ॥ 151 ॥ विष्णुपुराण (6/7/61) :— विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथापरा। अविद्या कर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते ॥ 152 ॥ अनुवाद—विष्णुशक्ति—परा, क्षेत्रज्ञा और अविद्या नामक, तीन प्रकारकी है। विष्णुकी पराशक्ति ही 'चित्-शक्ति' है, क्षेत्रज्ञा-शक्ति ही जीवशक्ति है (जिसको मायारूपा 'अविद्या' से 'अपरा' अर्थात् भिन्ना कहा गया है) और कर्म नामक अविद्या-शक्तिका नाम 'माया' है॥ 152 ॥

290 ।

आठवाँ अध्याय 8/152-161 ] अनुभाष्य-आदिलीला 7/119 संख्या देखें ॥ 152 ॥ श्रीकृष्णके स्वरूपसे अभिन्न स्वरूपशक्ति :- सच्चिदानन्दमय कृष्णेर स्वरूप। अतएव स्वरूप-शक्ति हय तिन रूप ॥ 153 ॥ स्वरूपशक्तिके तीन रूप :- आनन्दांशे 'ह्लादिनी', सदंशे 'सन्धिनी'। चिदंशे 'सम्वित्', यारे ज्ञान करि' मानि ॥ 154 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णका स्वरूप सच्चिदानन्दमय (सत्, चित् और आनन्दमय) है, इसलिये उनकी स्वरूपशक्तिके भी तीन रूप हैं। वह स्वरूप-शक्ति आनन्द-अंशसे 'ह्लादिनी', सत्-अंशसे 'सन्धिनी' और चित्-अंशसे 'सम्वित्', जिसको ज्ञान भी कहा जाता है, -इन तीन रूपोंको धारण करती है ॥ 153-154 ॥ विष्णुपुराण (1/12/69) :- ह्लादिनी सन्धिनी सम्वित् त्वय्येका सर्वसंश्रये। ह्लादतापकरी मिश्रा त्वयि नो गुणवर्जिते ॥ 155 ॥ अनुवाद-हे भगवन्! आप सभीके आश्रय और निर्गुण हैं। आपमें स्थित त्रिविधरूप शक्ति 'ह्लादिनी', 'सन्धिनी' और 'सम्वित्', तीनों चिन्मय हैं। मायाके वशमें होने योग्य चित्-कण जीव जब मायामें आविष्ट होकर मायाके तीन गुणोंका आश्रय करते हुए जिस अवस्थाको प्राप्त करते हैं, उस अवस्थामें वह शक्ति 'ह्लादकारी', 'तापकरी' और 'मिश्रा'-इन तीन प्रकारके भावोंको प्राप्त करती है। किन्तु सभी गुणोंसे अतीत आपमें यह शक्ति निर्मल और निर्गुणस्वरूपमें एकाकार होकर रहती है ॥ 155 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 4/61-63 संख्या देखें ॥ 153-155 ॥ ह्लादिनी-संज्ञाका कारण और कार्य :- कृष्णेके आह्लादे, ता'ते नाम- 'आह्लादिनी'। सेइ शक्ति-द्वारे सुख आस्वादे आपनि ॥ 156 ॥ सुखरूप कृष्ण करे सुख आस्वादन। भक्तगणे सुख दिते 'ह्लादिनी'-कारण ॥ 157 ॥ अनुवाद-जो शक्ति श्रीकृष्णको आनन्द प्रदान करती है, उसका नाम 'आह्लादिनी' है। उस शक्तिके द्वारा श्रीकृष्ण स्वयं सुखका आस्वादन करते हैं। स्वयं सुखरूप होनेपर भी श्रीकृष्ण ह्लादिनी-शक्तिके द्वारा सभी प्रकारके सुखोंका आस्वादन करते हैं और वे भक्तोंको भी ह्लादिनी-शक्तिके द्वारा सुख प्रदान करते हैं ॥ 156-157 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 4/59-60 संख्या देखें ॥ 156-157 ॥ ह्लादिनी और श्रीराधिका :- ह्लादिनीर सार अंश, तार 'प्रेम' नाम। आनन्दचिन्मयरूप रसेर आख्यान ॥ 158 ॥ प्रेमेर परम-सार 'महाभाव' जानि। सेइ महाभावरूपा राधा-ठाकुराणी ॥ 159 ॥ अनुवाद-ह्लादिनीके सार अंशका नाम 'प्रेम' है। प्रेमकी व्याख्या करनेपर इसे आनन्दचिन्मयरस भी कहा जाता है। प्रेमका परम सार 'महाभाव' है, वही महाभावरूपा श्रीराधा-ठाकुरानी हैं ॥ 158-159 ॥ उज्ज्वलनीलमणिमें राधा-चन्द्रावलीके तारतम्य-वर्णनमें (4/3) - तयोरप्युभयोर्मध्ये राधिका सर्वथाधिका। महाभावस्वरूपेयं गुणैरतिवरीयसी ॥ 160 ॥ अनुवाद-श्रीराधा और श्रीचन्द्रावलीके मध्यमें भी श्रीराधा ही सभी प्रकारसे श्रेष्ठा हैं। वे महाभावस्वरूपिणी हैं अर्थात् उनका विग्रह महाभावमय हैं, क्योंकि वे ह्लादिनी शक्तिकी सारांश हैं और गुणोंमें भी अत्यन्त श्रेष्ठा हैं ॥ 160 ॥ श्रीराधाका 'स्वरूप' और 'देह' एक ही वस्तु, वह सम्पूर्ण श्रीकृष्णप्रेममय :- प्रेमेर 'स्वरूप'-'देह'-प्रेमेर भावित। 'कृष्णेर प्रेयसी-श्रेष्ठ' जगते विदित ॥ 161 ॥ । 291

[ 8/147-164 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-श्रीराधाजीकी देह प्रेम-स्वरूप है अर्थात् वह प्रेमसे ही गठित है। श्रीकृष्णकी समस्त प्रेयसियोंमें वे श्रेष्ठतमा हैं, यह बात सारा जगत् जानता है॥161॥ अमृतप्रवाह भाष्य-यहाँ आदिलीलाके चौथे अध्याय पर ठीकसे विचार करनेपर यह सब विषय अच्छेसे समझ आ जायेंगे॥ 147-161॥ ब्रह्मसंहिता (5/37) :- आनन्दचिन्मयरस-प्रतिभाविताभि- स्ताभिर्य एव निजरूपतया कलाभिः। गोलोक एव निवसत्यखिलात्मभूतो गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 162॥ अनुवाद-आनन्द चिन्मयरसके द्वारा प्रतिभाविता, अपने चित्-रूपके अनुरूपा, चिन्मयरसस्वरूपा, चौंसठ कलाओंसे युक्ता, ह्लादिनीशक्तिस्वरूपा श्रीराधा और उनकी कायव्यूहस्वरूपा सखियोंके साथ जो अखिलात्मभूत गोविन्द अपने गोलोकधाममें निवास करते हैं, ऐसे आदिपुरुष श्रीगोविन्दका मैं भजन करता हूँ॥162॥ अनुभाष्य-आदिलीला 4/68-72 संख्या देखें॥158-162॥ श्रीराधा श्रीकृष्णकी वाञ्छाको पूर्ण करनेवाली, अष्टसखियाँ-उनकी कायव्यूह :- सेइ महाभाव हय 'चिन्तामणि-सार'। कृष्ण-वाञ्छा पूर्ण करे एइ कार्य ताँर ॥ 163 ॥ 'महाभाव-चिन्तामणि' राधार स्वरूप। ललितादि सखी-ताँर कायव्यूहरूप ॥ 164 ॥ अनुवाद-यही महाभाव चिन्तामणिका सार है; श्रीकृष्णकी समस्त वाञ्छाओंको पूर्ण करना ही इसका कार्य है। 'महाभाव-चिन्तामणि' श्रीराधाजीका स्वरूप है और श्रीललिता आदि सखियाँ उनकी कायव्यूहरूपा हैं॥163-164॥ अनुभाष्य-आदिलीला 4/79, 87 और 94 संख्या तथा 5/213 और 215 संख्या देखें॥163-164॥ अमृताणुकणिका-“(उःनीः 14/156-157)- “मुकुन्दमहिषीवृन्दैरप्यसावतिदुर्लभः । व्रजदेव्येकसंवेद्यो महाभावाख्ययोच्यते ॥ 156 ॥ वरामृतस्वरूपश्रीः स्वं स्वरूपं मनो नयेत् ॥ 157 ॥” अर्थात् रुक्मिणी आदि महिषियोंमें भी महाभाव अत्यन्त सुदुर्लभ है, यह केवलमात्र श्रीराधा आदि व्रजदेवियोंके द्वारा अनुभूत है। शृङ्गाररसमें श्रीनन्दनन्दन विषय-तत्त्वकी और श्रीराधा आश्रय-तत्त्वकी चरम सीमा हैं। उनका अनुराग ही स्थायीभाव है। अनुराग ही चरमावस्थामें यावदाश्रयवृत्तिके रूपमें स्वसंवेद्य दशाको प्राप्त होनेपर 'महाभाव' कहलाता है। महाभाव श्रेष्ठ अमृतके समान स्वरूप-सम्पत्ति धारणकर चित्तको अपना स्वरूप प्राप्त कराता है। माधुर्य ही इसकी स्वरूपगत सम्पत्ति है। यह अतुलनीय माधुर्यमय है। महाभाव रूढ़ और अधिरूढ़के भेदसे दो प्रकारका होता है। रूढ़ महाभावमें संयोग और वियोगमें निमेषकालकी भी असहिष्णुता, निकटवर्ती जनसमूहका हृदय विलोडन, कल्प-क्षणत्व (मिलनमें एक कल्प भी एक क्षणके समान प्रतीत होना), श्रीकृष्णके सुखमें आर्त्तिकी आशङ्कासे खिन्नता, मोहादिके असद्भावमें भी आत्म-विस्मृति, क्षण-कल्पत्व (वियोगमें एक क्षण भी एक कल्पके समान लगना) आदि अनुभाव हैं। जिस समय उक्त अनुभावसमूह रूढ़भावमें कहे गये अनुभावोंसे भी उत्तरोत्तर किसी विशेष दशाको प्राप्त होते हैं, उसे अधिरूढ़ महाभाव कहते हैं। यह अधिरूढ़ महाभाव भी मोदन और मादन दो प्रकारका होता है। जिस अधिरूढ़ महाभावमें नायिका और नायकके स्तम्भादि सात्त्विक भावसमूह अतिशय उद्दीप्त रूपमें प्रकाशित होते हैं, उसे मोदन कहते हैं। मोदन ही विरह अवस्थामें मोहन कहलाता है। मोहन-भावयुक्त प्रेयसीके प्रभावसे ब्रह्माण्डके सभी लोग क्षुब्ध हो जाते हैं और पशु-पक्षी भी रोदन करने लगते हैं। यहाँ तक कि सत्यभामादि महिषियोंके द्वारा आलिङ्गित होनेपर भी द्वारकेश श्रीकृष्ण श्रीराधाकी मोहन अवस्थाका श्रवण 292 ।

आठवाँ अध्याय 8/158-164 ] करके मूर्च्छित हो जाते हैं। यह मोहन भाव श्रीराधाके यूथकी सखियोंमें उदित होनेपर भी अधिकतर श्रीराधामें ही उदित होता है। मोहनकी एक वृत्ति दिव्योन्माद कहलाती है जिसमें उद्घूर्णा, चित्रजल्पादि अवस्थाएँ उदित होती हैं। भागवत दशम स्कन्धके भ्रमरगीतमें इनका सरस वर्णन है। मोहन भावसे भी अति उत्कृष्ट चमत्कारपूर्ण ह्लादिनी नामक महाशक्तिका स्थिरांश केवल श्रीमती राधिकामें ही नित्यकाल विराजमान रहता है—इसीको 'मादन'-महाभाव कहते हैं; यह मादन-महाभाव ललिता आदिमें भी उदित नहीं होता। 'महाभाव स्वरूपा श्रीराधा ठाकुरानी' कहनेसे महाभावकी सर्वोच्‍चावस्था 'मादन'को ही समझना चाहिये। श्रीराधा महाभावकी समुद्र हैं। अन्य शक्तियों, महिषियों आदिमें भी महाभाव है, किन्तु उनमें वह आंशिक मात्रामें होता है। जैसे समुद्रके साथ ताल, कुँआ, सरोवर आदिकी तुलना नहीं है, वह अपनी उपमा स्वयं है, उसका जल अगाध अपार है; इसी प्रकार महाभाव-स्वरूपा श्रीराधा ठाकुरानी समस्त प्रकारके भावोंको क्रोड़ीभूत करती हुई महाभावके अपार अगाध भण्डार तथा वैशिष्ट्यके साथ विराजमान हैं। जितनी भी व्रजगोपियाँ हैं, उन सभीमें कला-कौशल, प्रेम-परिपाटी, सेवा-दक्षता आदि है तथा श्रीकृष्ण उनके साथ भी लीला-विलास करते हैं। किन्तु ये समस्त गुण श्रीराधामें चरम सीमामें हैं। इसलिये श्रील भक्तिविनोद ठाकुरने स्वकृत पदमें श्रीकृष्णके मनोभावको इस प्रकार व्यक्त किया है—'बले तुहुँ बिना काहार रास, तुहुँ लागि मोर बरज वास।' अर्थात् श्रीकृष्ण श्रीराधासे कह रहे हैं कि यह रसास्वादन तुम्हारे सङ्गके अतिरिक्त अन्यत्र कहीं नहीं है। रसास्वादनके लिये ही रासलीला है। 'रसानाम् समूह इति रासः।' श्रीकृष्ण कुञ्जोंमें, वन-उपवनमें अनेक प्रकारकी लीलाएँ करते हैं तथा उन विभिन्न रूपोंमें कुछ भावोंका आस्वादन करते हैं। किन्तु सामुदायिक रूपमें समस्त रसोंका आस्वादन केवलमात्र रासलीलामें ही है। रासलीलाकी नायिका-शिरोमणि श्रीराधा हैं, इसलिये श्रीकृष्णने श्रीराधाको आकर्षितकर उनके सङ्ग लीला-विनोद किया। उस रासलीलामें समस्त प्रकारके भाव श्रीराधामें समस्त रूपोंमें प्रकाशित हुए। श्रीकृष्णको वशीभूत करनेका मन्त्र महाभाव ही है। इसकी किञ्चित्मात्र गन्ध भी न रहनेसे श्रीकृष्ण वशीभूत नहीं होते और न ही अधीनता स्वीकार करते हैं। इसी कारण साधक महाभाव-स्वरूपा श्रीराधाका आश्रय ग्रहण करते हैं। उनका आश्रय ग्रहण किये बिना साधककी समस्त साधन-चेष्टा निष्फल रहती है, क्योंकि उसके द्वारा श्रीकृष्णको आकर्षित करनेका गुण नहीं प्राप्त होता। इसलिये गौड़ीय-वैष्णव श्रीराधाका प्राधान्य स्वीकार करते हैं। श्रीकृष्ण ऐसी लीलाएँ करते हैं जिनके द्वारा श्रीराधामें किलकिञ्चित आदि भावोंका प्रकाश होता है, जिन्हें देखकर श्रीकृष्ण चमत्कृत हो जाते हैं। अन्य सभी नायिकाओंके साथ श्रीकृष्णके लीला-विनोदसे उन नायिकाओंमें भी भाव प्रकाशित होते हैं, किन्तु वे सीमित होते हैं। श्रीराधामें समस्त भाव असीमित रूपमें प्रकाशित होते हैं। श्रीराधाके तीन स्वरूप हैं—श्रीकृष्णाङ्गमें 'शक्ति स्वरूप'में, 'आनन्दवर्धनकारी श्रीराधा' रूपमें और 'मन्त्र' रूपमें। इन तीन स्वरूपोंकी मूल 'आनन्दवर्धनकारी श्रीराधा' हैं। श्रीकृष्णकी अनन्त प्रेयसियाँ हैं, जिनमें तीन मुख्या हैं- वैकुण्ठकी लक्ष्मियाँ, द्वारकाकी महिषियाँ तथा व्रजगोपियाँ। इन तीनों प्रकारकी कान्ताओंका विस्तार श्रीराधासे होता है; वे ही सबकी मूल अंशिनी हैं। श्रीराधाका चित्त, इन्द्रियाँ और उनकी देह कृष्णप्रेमसे गठित हैं। ब्रह्मसंहिता (5/37)—'आनन्दचिन्मयरस- प्रतिभाविताभिः...' अर्थात् आनन्दचिन्मयरस ह्लादिनी तथा संवित्का सार है। इसी आनन्दचिन्मयरससे गठित व्रजगोपियाँ और उनमें भी आनन्द चिन्मयरसकी मूर्तिमान स्वरूप वृषभानुनन्दिनी श्रीराधा श्रीकृष्णकी कान्ता रूपमें । 293

[ 8/158–179 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ]

प्रसिद्ध हैं। श्रीकृष्ण ब्रह्म-स्वरूप हैं, श्रीराधा आनन्दचिन्मय हैं तथा गोपियाँ उनकी अंश, कलादि हैं। शत कोटि गोपियोंके द्वारा भी श्रीकृष्णकी कान्ता-प्रेमास्वादनकी वासना पूर्ण नहीं होती—इसके द्वारा ही श्रीराधाकी प्रेम-महिमाका अनुमान लगाया जा सकता है। श्रीराधा केवल आनन्दरस-स्वरूपा हैं तथा अखण्ड रसवल्लभा रसकी मूर्ति हैं; उनका तत्त्व रसयुक्त है। श्रीराधाका स्वरूप महाभावसे गठित है। यही महाभाव चिन्तामणिके समान है। चिन्तामणिके समान श्रीराधा श्रीकृष्णकी समस्त इच्छाओं, अकाङ्क्षाओंकी पूर्त्ति करती हैं। यद्यपि श्रीकृष्णके स्वरूपमें जगत्की सृष्टिकी कामनाएँ नहीं होतीं, क्योंकि 'मद्भक्तविनोदाय' अर्थात् अपने भक्तोंका विनोद करना ही उनका एकमात्र कार्य है, तथापि उन्होंने ऐसी कामना की—'स अकामयत'। इसलिये उन्होंने इस कामनाको अपने अंशके कला कारणाब्धिशायी विष्णुसे सम्पादित कराया। तब जगत्की सृष्टि करनेके लिये श्रीकृष्णशक्ति श्रीराधा महामाया बन गईं।"—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 158–164 ॥

श्रीकृष्ण-प्रणयकी मूर्त्तविग्रह श्रीराधिकाका वर्णन :— राधा-प्रति कृष्ण-स्नेह-सुगन्धि उद्वर्त्तन। ता'ते सुगन्धि देह-उज्ज्वल-वरण ॥ 165 ॥

अनुवाद—श्रीराधाके प्रति श्रीकृष्णका स्नेह ही श्रीराधाका सुगन्धित उबटन है। इस उबटनसे ही श्रीराधाकी देह सुगन्धित और उज्ज्वलवर्ण हो जाती है ॥ 165 ॥ अनुभाष्य—'सुगन्धि उद्वर्त्तन'—सुगन्धित उबटन, जिसके द्वारा अङ्गोंका मैल दूर होता है; इसलिये इस श्रीकृष्णस्नेहरूपी उबटनको मलनेके कारण उनकी देह सुगन्धित और उज्ज्वल वर्णकी है ॥ 165 ॥

श्रीराधाका तीन प्रकारकी धारामें स्नान, श्रीराधाके विग्रहका वर्णन :— कारुण्यामृत-धाराय स्नान प्रथम। तारुण्यामृत-धाराय स्नान मध्यम ॥ 166 ॥


लावण्यामृत-धाराय तदुपरि स्नान। निज-लज्जा-श्याम-पट्टसाटि-परिधान ॥ 167 ॥ कृष्ण अनुराग-द्वितीय अरुण-वसन। प्रणय-मान-कञ्चुलिकाय वक्ष-आच्छादन ॥ 168 ॥ सौन्दर्य-कुङ्कुम, सखी-प्रणय-चन्दन। स्मितकान्ति-कर्पूर, तिने-अङ्गे विलेपन ॥ 169 ॥ कृष्णेर-उज्ज्वल रस-मृगमद-भर। सेइ मृगमदे विचित्र कलेवर ॥ 170 ॥ प्रच्छन्न-मान-वाम्य-धम्मिल्ल-विन्यास। 'धीराधीरात्मक' गुण-अङ्गे पट्टवास ॥ 171 ॥ राग-ताम्बूलरागे अधर उज्ज्वल। प्रेमकौटिल्य-नेत्रयुगले कज्ज्वल ॥ 172 ॥ 'सुदीप्त-सात्त्विक' भाव, हर्षादि 'सञ्चारी'। एइ सब भाव-भूषण सब अङ्गे भरि' ॥ 173 ॥ 'किलकिञ्चितादि'-भाव-विंशति-भूषित। गुणश्रेणी-पुष्पमाला सर्वाङ्गे पूरित ॥ 174 ॥ सौभाग्य-तिलक चारु-ललाटे उज्ज्वल। प्रेम-वैचित्त्य-रत्न, हृदय-तरल ॥ 175 ॥ मध्य-वयस, सखी-स्कन्धे कर-न्यास। कृष्णलीला-मनोवृत्ति-सखी आशपाश ॥ 176 ॥ निजाङ्ग-सौरभालये गर्व-पर्यङ्क। ता'ते बसिं' आछे, सदा चिन्ते कृष्णसङ्ग ॥ 177 ॥ कृष्ण-नाम-गुण-यश-अवतंस काणे। कृष्ण-नाम-गुण-यश-प्रवाह-वचने ॥ 178 ॥ कृष्णके कराय श्यामरस-मधु पान। निरन्तर पूर्ण करे कृष्णेर सर्वकाम ॥ 179 ॥

अनुवाद—श्रीराधा अपना प्रथम स्नान करुणाकी अमृतमयी धारामें करती हैं, मध्याह्नकालीन द्वितीय स्नान वे अभिनव तारुण्य-अमृत-तरङ्गिणीमें करती हैं और

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अपना तृतीय सन्ध्याका स्नान लावण्यरूपी अमृतकी धारामें करती हैं। वे अपनी लज्जारूप श्यामवर्णकी रेशमी साड़ी धारण करती हैं। श्रीकृष्णके प्रति अपने अनुरागरूप लाल रङ्गके उत्तरीय वस्त्रको धारण करती हैं। प्रणय और मान नामकी कञ्चुलिकाके द्वारा अपने श्रीवक्षःस्थलको आच्छादित करती हैं। उनके कायिक गुणोंका सौन्दर्य ही 'कुङ्कुम' है, सखियोंके प्रति उनका प्रणय ही 'चन्दन' है तथा उनकी मृदु मुस्कानकी कान्ति ही 'कर्पूर' है-इस प्रकार इन तीन वस्तुओं 'कुङ्कुम', 'चन्दन' और 'कर्पूर' से वे अपने श्रीअङ्गोंका लेपन करती हैं। श्रीकृष्णके शृङ्गाररसरूप मृगमदसे वे अपने समस्त चिन्मय अङ्गोंका शृङ्गार करती हैं। प्रच्छन्न-मान और वाम्यभावको श्रीराधाजी सुन्दर केशपाशके रूपमें ग्रथित करती हैं। धीराधीरात्मक गुणोंको अपने अङ्गोंमें वे वस्त्रके रूपमें धारण करती हैं। श्रीकृष्णके प्रति अनुरागरूपी ताम्बूलके लालवर्णसे श्रीराधाके अधर उज्ज्वल हैं। प्रेमकी कुटिलताको वे अपने नेत्रोंमें काजलके रूपमें धारण करती हैं। सुदीप्त सात्त्विकभाव तथा हर्षादि सञ्चारीभाव रूपी आभूषणोंसे वे अपने श्रीअङ्गोंको सुशोभित करती हैं। किलकिञ्चितादि बीस प्रकारके भावरूपी आभरणोंसे वे विभूषित हैं और माधुर्यादि गुणोंकी पुष्पमालाको उन्होंने समस्त अङ्गोंमें धारण कर रखा है। सौभाग्यरूपी मनोहर तिलक श्रीराधाके सुन्दर ललाटपर उज्ज्वलरूपमें दमक रहा है और प्रेम-वैचित्त्य आदि रत्न उनके हृदय-हारकी मध्य मणि बनकर स्निग्ध रूपसे शोभायमान हो रहे हैं। श्रीराधाकी मनोवृत्तियाँ ही उनकी निकट रहनेवाली सखियाँ हैं जो सदा श्रीकृष्ण-लीलामें ही आविष्ट रहती हैं। उन्होंने अपने करकमलको नित्य कैशार-अवस्थारूपी सखीके कन्धेपर अर्पण कर रखा है। अपने अङ्ग-सौरभरूप भवनमें गर्वरूपी पलङ्गपर आसीन होकर वे सदा श्रीकृष्ण-अङ्ग-सङ्गका चिन्तन करती हैं। श्रीकृष्णनाम, श्रीकृष्णगुण और श्रीकृष्णयश रूप अलङ्कार श्रीराधाके कर्णभूषण हैं और श्रीकृष्णका नाम-गुण-यश ही निरन्तर उनके मुखसे प्रवाहित होता रहता है। श्यामरस (शृङ्गार-रस) रूप मधुका श्रीकृष्णको पान कराकर वे निरन्तर श्रीकृष्णकी समस्त कामनाओंको पूर्णरूपसे सम्पन्न करती हैं॥ 166-179 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीराधिकाके गुणोंका वर्णन करनेके लिये कविराज गोस्वामीने श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके द्वारा रचित 'प्रेमाम्भोज-मकरन्द' नामक स्तवको आधार बनाया है- “महाभावोज्ज्वलच्चिन्तारत्नोद्भावितविग्रहाम्। सखीप्रणयसद्गन्धवरोद्वर्त्तन-सुप्रभाम्॥ 1 ॥ कारुण्यामृतवीचिभिस्तारुण्यामृतधारया। लावण्यामृतवन्याभिः स्नपितां ग्लपितेन्दिराम् ॥ 2 ॥ ह्रीपट्टवस्त्रगुप्ताङ्गीं सौन्दर्यघृसृणाश्रिताम्। श्याममोज्ज्वलकस्तूरीविचित्रितकलेवराम् ॥ 3 ॥ कम्पाश्रुपुलकस्तम्भस्वेदगद्गदरक्तता। उन्मादो जाड्यमित्येतै रत्नैनैर्वाभिरुत्तमैः॥ 4 ॥ क्लिप्तालङ्कृतिसंश्लिष्टां गुणालीपुष्पमालिनीम्। धीराधीरात्व-सद्वास-पटवासैः परिष्कृताम् ॥ 5 ॥ प्रच्छन्नमानधम्मिल्लां सौभाग्यतिलकोज्ज्वलाम्। कृष्णनामयशःश्रावावतंसोल्लासिकर्णिकाम् ॥ 6 ॥ रागताम्बूलरक्तोष्ठीं प्रेमकौटिल्य-कज्ज्वलाम्। नर्मभाषितनिःस्यन्दस्मित-कर्पूरवासिताम्॥ 7 ॥ सौरभान्तःपुरे गर्वपर्यङ्कोपरि लीलया। निविष्टां प्रेम-वैचित्त्य-विचलत्तरलाश्रिताम् ॥ 8 ॥ प्रणयक्रोधसच्छोलीबन्धुगुप्तीकृतस्तनाम्। सपत्नीवक्त्रहृच्छोषि-यशःश्री-कच्छपी-वराम्॥ 9 ॥ मध्यातात्मसखीस्कन्धलीलान्यस्तकराम्बुजाम्। श्यामां श्यामस्मरामोदमधूली-परिवेशिकाम्॥ 10 ॥ त्वां नत्वा याचते धृत्वा तृणं दन्तैरयं जनः। स्वदास्यामृतसेकेन जीवयामुं सुदुःखितम् ॥ 11 ॥ न मुञ्चेच्चरणायतातमापि दुष्टं दयामयः। अतो गान्धर्विके हा हा मुञ्चैनं नैव तादृशम् ॥ 12 ॥ प्रेमाम्भोजमकरन्दाख्यं स्तवराजमिमं जनः। श्रीराधिकाकृपाहेतुं पठंस्तद्दास्यमाप्नुयात् ॥ 13 ॥ (1) महाभावरूप उज्ज्वलचिन्तामणिके द्वारा भावित जिनका विग्रह है, श्रीकृष्णके प्रति सखीका जो प्रणय हैं, उसी सुगन्धित कुङ्कुम आदिके द्वारा जिनकी

[ 8/165-179 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

अङ्गकान्ति उज्ज्वल हुई है। (2) पूर्वाह्नमें कारुण्यामृतमें, मध्याह्नमें तारुण्यामृतमें और संध्यामें लावण्यामृतमें स्नान किया गया जिनका विग्रह इन्दिरा तकको लज्जित करता है। (3) लज्जारूपी रेशमीवस्त्रका परिधान, सौन्दर्यरूपी कुङ्कुमसे शोभित और श्यामवर्ण उज्ज्वल या शृङ्गाररसरूप कस्तूरीके द्वारा जिनका चित्रित कलेवर है। (4) कम्प, अश्रु, पुलक, स्तम्भ, स्वेद, गद्गद स्वर, रक्तता, उन्माद और जड़तारूपी नौ उत्तम रत्नोंसे जो अलङ्कृत हैं। (5) सौन्दर्य-माधुर्यादि सभी गुण पुष्पमालारूपमें जिनके शरीरपर विराजमान हैं; धीर और अधीरा भावको उन्होंने पट्टवास अर्थात् कर्पूरादिके द्वारा निर्मल किया है। (6) प्रच्छन्नरूपसे मान ही जिनका धम्मिल अर्थात् जूड़ा है, सौभाग्यरूपी तिलकके द्वारा जिनका मस्तक उज्ज्वल है; श्रीकृष्णके नाम और यशका श्रवण ही जिनके कानोंके आभूषण हैं। (7) अनुरागरूपी ताम्बूलके द्वारा जिनके ओंठ लालीसे रञ्जित हैं; प्रेम-कौटिल्यको ही जिन्होंने नेत्रोंके काजलके रूपमें धारण किया है; नर्म अर्थात् उपहासके कारण मृदुहास्यरूपी-कर्पूरके द्वारा जो सुगन्धित हैं। (8) अपने अङ्गसौरभरूप-अन्तःपुरमें गर्वरूपी पलङ्गके ऊपर शयन करनेपर उनका विप्रलम्भरूपी हार प्रेमवैचित्यरूपी तरल (हारके बीचकी मणि)के रूपमें इधर-उधर झूलता है। (9) प्रणयक्रोधरूपी कञ्चुलीके द्वारा जिनके स्तनयुगल आवृत हैं; सपत्नियोंके (सौतनके) मुख और हृदयका शोषणकारी यशःश्री (यश और सौन्दर्य) ही जिनकी कच्छपी वीणा है। (10) जिन्होंने कैशोररूप-सखीके कन्धेपर लीलारूपी हस्तकमल रखा है; जो बहुत प्रकारके गुणोंसे युक्त होनेपर भी श्रीकृष्ण-कन्दर्पको आनन्दप्रदायक मधुका परिवेशन कर रही हैं।

(11) ऐसी श्रीराधासे दाँतमें तृण धारण करके मैं प्रार्थना कर रहा हूँ,-अपने दास्यरूप अमृतका दान करके इस अति दुःखितजनके प्राणोंकी रक्षा कीजिये। (12) हे गान्धर्विके ! दयामय श्रीकृष्ण जिस प्रकार शरणागत दुष्टजनोंका भी परित्याग नहीं करते, उसी प्रकार आप भी अपने आश्रित इस (दुष्ट) जनका त्याग मत करना। (13) श्रीराधारानीकी कृपाके हेतुस्वरूप इस प्रेमाम्भोजमकरन्द नामक स्तवराजका जो पाठ करता है, वह उनका दास्य प्राप्त करके धन्य हो जाता है। 'किलकिञ्चितादि भाव'-बीस प्रकारके हैं। ये बीस भाव- (1) 'अङ्ग'ज'-भाव, हाव, हेला; (2) 'आत्मज'-शोभा, कान्ति, दीप्ति, माधुर्य, प्रगल्भता, औदार्य और धैर्य; (3) 'स्वभावज'-किलकिञ्चित, लीला, विलास, विच्छित्ति, विभ्रम, मोट्टायित, कुट्टमित, विव्वोक, ललित और विकृत। 'गुणश्रेणी-पुष्पमाला'-श्रीमतीके गुण तीन प्रकारके हैं-मानसिक, वाचिक और शारीरिक। (1) 'मानसिक'-कृतज्ञता, क्षमा और कारुण्यादि; (2) 'वाचिक'-कानोंको आनन्ददायक वाक्य-प्रयोगादि; (3) 'कायिक'-गुण, आयु, रूप, लावण्य और सौन्दर्यादि। 'कृष्णलीला-मनोवृत्ति-सखी'-श्रीकृष्णलीलानन्दरूपा श्रीमतीकी आठ मनोवृत्तियाँ आठ सखियाँ हैं और उनकी अनुवृत्तियाँ अन्यान्य मञ्जरियाँ हैं। 'श्यामरस'-मधुर रस ॥ 165-179 ॥ अनुभाष्य-श्रीमती राधिकाका स्वरूप-वे श्रीकृष्णकी अभिलाषाओंको पूर्ण करनेवाली महाभाव चिन्तामणि हैं। ललितादि सखियाँ-उनके कायव्यूहके समान अथवा प्रकाशविन्यास हैं। (1) श्रीकृष्णस्नेहरूपी उबटन मलकर

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आठवाँ अध्याय 8/165-179 ] प्रथम अथवा पूर्वाह्नमें किये जानेवाले स्नानका जल ही कारुण्यामृत है अर्थात् पौगण्डको पार करके प्रथम कैशोरमें करुणाविशिष्ट नवयौवन है; (2) मध्यम अथवा मध्याह्नमें किये जानेवाले स्नानका जल ही तारुण्यामृत अथवा व्यक्त-यौवन है; (3) उससे श्रेष्ठ स्नान अथवा अपराह्नमें किये जानेवाले स्नानका जल लावण्यामृत अथवा पूर्णयौवन है; अर्थात् कायिक गुणोंकी जो आयु, रूप और लावण्य है, वही तीन प्रकारका स्नान-जल है। वस्त्र दो प्रकारके है- (1) अधोवसन (कमरसे नीचे पहननेवाले वस्त्र) और (2) उत्तरीय (कमरसे ऊपर पहननेवाले वस्त्र)। (1) अधोवसन-लज्जारूपा, वह श्याम रेशमी धागेसे बनी नीली-साड़ी है; (2) उत्तरीय-दूसरा वस्त्र अरुणवर्ण (लाल रङ्गका) है-वही श्रीकृष्णानुराग है। श्रीकृष्णप्रणयमानरूपी चोलीके द्वारा श्रीराधिकाका वक्षःस्थल ढका हुआ है। श्रीराधाके कायिक गुणोंका सौन्दर्य ही कुङ्कुम है और रमणीयता ही सखी-प्रणयरूपी चन्दन है तथा माधुर्य ही स्मितकान्तिरूपी कर्पूर है; ये तीन वस्तुएँ अङ्गोंके लेपन हैं अर्थात् उनके अङ्ग-सौन्दर्य, रमणीयता और माधुर्यसे भूषित हैं। श्रीकृष्णका उज्ज्वल रस ही मृगमद-कस्तूरी है, ये ही कोमलतारूपी कायिक गुण हैं। ‘प्रच्छन्नमान'–हृदयमें वक्रता होनेपर भी बाहरसे दक्षिण-भावका प्रदर्शन। ‘वाम्य'–सरलताके अभावसे वक्रता, मध्यलीला 14/161 संख्याका अनुभाष्य देखें। ‘धम्मिल्ल'–जूड़ा। ‘धीराधीरात्मक गुण'–उज्ज्वलनीलमणिमें— “धीराधीरा तु वक्रोक्त्या सवाष्पं वदति प्रियम्। धीराधीरगुणोपेता धीराधीरेति कथ्यते॥” जो नायिका प्रियतमको धीराके धर्म अर्थात् वक्रोक्तिके द्वारा और अधीराके धर्म अर्थात् नेत्रोंमें अश्रु भरकर कुछ वचन कहती है, वह ‘धीराधीरा' है। मध्यलीला 14/143-153 संख्या देखें। ‘धीराधीरा-मध्या'के जो गुण हैं, ‘धीराधीरा-प्रगल्भा'के भी वही सब गुण होते हैं। ‘प्रगल्भा', ‘मध्या' और ‘मुग्धा',–इन तीनोंमें ‘प्रगल्भा' अत्यन्त क्रोधित होकर डाँटने-फटकारनेवाली है; ‘मध्या' कुछ कम क्रोधित होकर कठोर बात कहनेवाली है एवं ‘मुग्धा' थोड़ासा क्रोध करके रोने लगती है। खण्डित- अवस्थामें इन गुणोंका विशेष प्रकाश होता है। ‘पट्टवास'–पगड़ी; रेशमका उत्तरीय वस्त्र एकपाटा। पाठान्तरमें ‘पटवास'–वस्त्रसमूह, गन्धचूर्ण, पिसे हुए चावलसे बनी पेस्ट, साटिन (एक प्रकारका वस्त्र)। श्रीकृष्णराग ही ताम्बूलका वर्ण है, उसके द्वारा अधर उज्ज्वल होते हैं; प्रेम-कुटिलता ही दोनों नेत्रोंका काजल है। ‘सुद्दीप्त सात्त्विकभाव'–मध्यलीला 6/12 संख्या; ‘हर्षादि तैंतीस सञ्चारीभाव'–मध्यलीला 3/127 संख्या एवं मध्यलीला 14/167-168 संख्याका अमृतप्रवाह भाष्य देखें। ‘किलकिञ्चित् आदि भाव'–मध्यलीला 14/168 संख्या देखें। ‘गुणश्रेणी-पुष्पमाला'–मध्यलीला 23/82-86 संख्या देखें। उज्ज्वलनीलमणिमें लिखे श्रीराधाके पच्चीस गुण— “बहुना किं गुणास्तस्याः संख्यातीता हरेरिव। इत्यङ्गोक्तिमनस्थास्ते परसम्बन्धगास्तथा। गुणा वृन्दावनैश्वर्या इहा प्रोक्ताश्चतुर्विधाः॥” और अधिक क्या कहें, श्रीहरिके समान श्रीराधिकामें भी असंख्य गुणसमूह नित्य वर्तमान है। उनके गुण चार भागोंमें विभक्त हैं— (क) अङ्गस्थ (अङ्गोंमें स्थित गुण) (ख) उक्तिस्थ (वचनोंमें स्थित गुण) (ग) मनस्थ (मनमें स्थित गुण) और (घ) परसम्बन्धग (दूसरोंसे सम्बन्धित गुण)। (क) अङ्गस्थ गुण छह हैं— (1) मधुरा अथवा चारु, अर्थात् वे देखनेमें परम सुन्दरी हैं, । 297

[ 8/165-179 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (2) नववयसा अथवा किशोरी, (3) चपलाङ्गा, अर्थात् चञ्चल कटाक्षवाली हैं, (4) उज्ज्वलस्मिता, अर्थात् उज्ज्वल मृदुमधुर हास्यकारिणी हैं, (5) सुन्दर सौभाग्यको सूचित करनेवाली रेखाओंसे युक्त अथवा पादादि स्थित चन्द्ररेखा, और (6) गन्धोन्मादितमाधवा, अर्थात् अपनी अङ्गगन्धसे श्रीकृष्णको भी उन्मत्त करनेवाली हैं। (ख) उक्तिस्थ गुण तीन हैं— (1) सङ्गीतप्रसराभिज्ञा, अर्थात् सङ्गीतविद्यामें पारदर्शी, (2) रम्यवाक्, अर्थात् मृदुभाषा बोलनेवाली, और (3) नर्मपण्डिता, अर्थात् परिहास करनेमें पटु। (ग) मनस्थ गुण दस हैं— (1) विनिता, (2) करुणापूर्णा, अर्थात् दयालु, (3) विदग्धा, अर्थात् रसविषयमें अत्यन्त चतुर हैं, (4) पाटवान्विता, अर्थात् रसविषयमें अत्यन्त चतुरा हैं, (5) लज्जाशीला अथवा आभिजात्य और शीलता आदिका कारण, (6) मर्यादा अथवा साधुमार्गसे अविचलित रहनेवाली, (7) धैर्यशालिनी अथवा दुःख सहनेमें समर्थ, (8) गाम्भीर्यशालिनी, (9) सुविलासा, अर्थात् सुविलासप्रिया हैं, और (10) महाभाव-परमोत्कर्ष-तर्षिणी अर्थात् महाभावके परमोत्कर्षको प्रकट करनेमें परम व्यग्र रहती हैं। (घ) परसम्बन्ध गुण छह हैं— (1) गोकुलप्रेमवसति, अर्थात् उनको देखते ही गोकुलवासियोंके हृदयमें प्रेम उमड़ पड़ता है, (2) जगत्-श्रेणी लसद्यशा, अर्थात् अखिल ब्रह्माण्डमें उनकी कीर्ति व्याप्त है, (3) गुर्वर्पित-गुरुस्नेहा, अर्थात् गुरुजनोंके स्नेहकी पात्री हैं, (4) सखी-प्रणयितावशा, अर्थात् सखियोंके प्रणयके अधीन रहती हैं, (5) कृष्णप्रियावलीमुख्या, अर्थात् श्रीकृष्णकी समस्त सखियोंमें प्रधाना हैं, और (6) सन्तताश्रवकेशवा, अर्थात् केशव सदा उनकी आज्ञाके अधीन रहते हैं। प्रेमवैचित्त्य'— “प्रियस्य सन्निकर्षेऽपि प्रेमोत्कर्ष-स्वभावतः। या विश्लेषधियार्त्तिस्तत् प्रेमवैचित्त्यमुच्यते॥” अत्यधिक प्रेमके स्वभावके कारण प्रियके निकट होनेपर भी उनसे वियोग होनेके भयसे जिस क्लेशकी (आर्त्तिकी) उत्पत्ति होती है, वही 'प्रेमवैचित्त्य' है; वही रत्न है। 'तरल'–हारके बीच स्थित मणि, धुकधुकी। मध्यवयस किशोरीभाव ही सखीके कन्धेपर हाथ रखना है और निकटमें स्थित सखियाँ–श्रीकृष्णलीलाकी मनोवृत्तिरूपा हैं। 'निजाङ्ग-सौरभालये'–अपने अङ्गरूपी सौरभके भवनमें। 'गर्व-पर्यङ्क'–गर्वरूपी पलङ्ग अथवा खाटपर। 'अवतंस'–कानके विशेष अलङ्कार; श्रीकृष्ण नाम-गुण-यश ही उनके कानोंके अलङ्कार हैं। श्रीकृष्णनाम-गुण-यशकी वाक्यावलीका स्त्रोत (प्रवाह) ही श्यामरस-मधु-धारा है; श्रीमती राधिका वही श्रीकृष्णको पान कराती हैं। श्रीराधा ही श्रीकृष्णका प्रणय विकार अर्थात् श्रीकृष्णप्रेमकी मूर्त्तिविग्रह अर्थात् उनके मानसिक भाव, कायिक अङ्ग-प्रत्यङ्ग, वेषादि, समस्त ही श्रीकृष्णप्रेमकी एक-एक शोभा अथवा भूषण हैं–उसको विश्लेषण करके यहाँ दिखला रहे हैं॥165-179॥ अमृतानुकणिका–“'कारुण्यामृत-धाराय स्नान प्रथम'। बाल्यकालमें चपलता रहती है। धीरे-धीरे पौगण्ड भाव 298 ।

आठवाँ अध्याय 8/166-174 ] आनेपर श्रीराधाके अङ्ग थोड़े-से स्थूल होने लगे और सुन्दरता आदि वर्धित होने लगी। उसके बाद वय-सन्धि अर्थात् प्रथम कैशोरमें शरीरकी जो चञ्चलता थी, वह आँखों में आ गयी। वय-सन्धिमें पहले यह पूर्वराग होता है। भागवतमें मिलनेके पूर्व पूर्वरागका वर्णन है। पूर्व-रागमें श्रीकृष्णके दर्शनके लिये उनमें अत्यन्त व्याकुलता, आतुरता, उत्कण्ठा जाग्रत होती है जिसके द्वारा उनमें करुणा आ जाती है। इस करुणाके लिये ही कहा है कि वे करुणाकी धारामें पहली बार स्नान करती हैं। श्रीकृष्णके प्रति श्रीराधाका स्नेह, अनुराग, उत्कण्ठा, लालसा आदि जिसमें किञ्चित् रूपसे प्रेम प्रकाशित हो जाता है, यही उनका प्रथम स्नान है। 'तारुण्यामृत धाराय स्नान मध्यम', इसका प्रकाश मध्य कैशोर अवस्थामें होता है। इसमें अङ्गोंमें सुकुमारता, सौन्दर्य, माधुर्य आदिका विकास होता है। नवयौवन रूप तारुण्यधारामें युगल मिलन होता है। कुञ्जोंमें केलि-महोत्सव, रासलीला आदिका आरम्भ इसीमें होता है। 'लावण्यामृत धाराय तदुपरि स्नान'-मुक्ताओँके भीतरसे जिस प्रकार स्वाभाविक रूपसे निर्मल-कान्ति बाहरमें प्रकाशित होती है, उसी प्रकार अङ्ग-प्रत्यङ्गोंसे अतिस्वच्छतापूर्वक स्वाभाविक प्रतिक्षण उदीयमान कान्तिकदम्बको लावण्य कहते हैं। श्रीकृष्णके द्वारा प्राप्त लावण्यमें स्नान करनेसे श्रीराधाके समस्त अङ्ग अत्यन्त लावण्यमय हो जाते हैं। उस समय श्रीकृष्ण उन्हें देखकर अत्यन्त मुग्ध हो जाते हैं। यह शेष कैशोर और पूर्ण यौवनकी दशामें प्रकाशित होता है। इसी अवस्थामें श्रीकृष्ण श्रीराधाके प्रेमका आस्वादनकर आनन्दित होते हैं। एक समय कृष्ण मिलन हेतु उपस्थित हुए। वहाँ उन्होंने देखा कि सम्पूर्ण वन पीत-आभासे सुशोभित है; समस्त तरुलता सुवर्ण रङ्गके हैं। वे अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर सोचने लगे कि 'यह क्या है? किसकी आभासे ये सम्पूर्ण वन सुवर्ण आभाका हो गया! मैं विश्वको आनन्दित करता हूँ। किन्तु मुझे आनन्द प्रदान करनेवाली यह कौन है?' तब उन्होंने अत्यन्त आनन्दित होकर जाना कि यह सब श्रीराधाकी अङ्गकान्तिका प्रभाव है। श्रीराधाकी आयु, रूप और लावण्य ही उनका तीन प्रकारका स्नानजल है। प्रत्येक अवस्थामें वे परमसुन्दरी नवनवायमान सौन्दर्यको धारण करती हुई विराजमान होती हैं। स्नानके पश्चात् वस्त्र धारण किये जाते हैं। परिधान दो प्रकारके होते हैं—अधोवस्त्र और उत्तरीय। अधोवस्त्र लज्जा निवारण करनेवाली श्यामवर्णकी रेशमी साड़ी है तथा उत्तरीय वस्त्र श्रीकृष्ण-अनुरागरूपी लालवर्णका है। श्रीराधा प्रणय-मान कञ्चुलिकाके द्वारा अपने वक्षस्थलका आच्छादन करती हैं। 'प्रणय' अर्थात् प्रगाढ़ विश्वास। इस अवस्थामें प्रियतम प्रेयसीके वशीभूत हो जाता है, अर्थात् नायिका स्वाधीनभर्तृका होकर अपनी सेवाके लिये भी आदेश देती है, जैसे—मेरी वेणी गूँथ दो, पाँवमें अलता लगा दो आदि। 'मान'—यह अत्यन्त उत्कृष्ट रूपमें श्रीराधाकृष्ण युगलको नित्य नव-नव माधुर्यका अनुभव करवाता है। कभी मान किसी हेतुसे होता है और कभी अहैतुक। एक समय श्रीराधा श्रीकृष्णके साथ वनमें विहार कर रही थीं। उस समय श्रीकृष्णके सङ्गसे उनका चित्त अत्यन्त द्रवीभूत हो रहा था। इस कारण श्रीराधाकी आँखोंसे अश्रुओँकी धाराबहने लगी। उस स्थानसे कुछ दूर गायें चर रही थीं और उनके खुरोंसे धूलि उड़ रही थी। श्रीराधा अवहित्थाके द्वारा अपने भावोंको छिपाकर कहने लगीं कि गायोंके खुरोंसे उठी धूलिके मेरे नेत्रोंमें प्रवेश करनेसे अश्रुधारा निकल रही है। श्रीकृष्णने कहा-'मैं अभी फूँककर तुम्हारे नेत्रोंको शीतल कर देता हूँ।' ऐसा कहकर श्रीकृष्ण मुखसे उनके नेत्रोंमें फूँकने लगे। श्रीराधा कहने लगीं—'आप रहने दीजिये! आपके कपट प्रेमके द्वारा मुझे क्या लाभ होगा? व्यर्थ ही कपटतापूर्ण आदरकी कोई आवश्यकता नहीं है।' ऐसा कहकर उन्होंने भृकुटी तान ली। अर्थात् मानवती हो गईं। इसमें कोई कारण नहीं है, यह अहैतुकी मान है। कुछ समय बाद अपने । 299

[ 8/166-180 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला आप दूर हो जाता है। सहेतुक मान कारण दूर होनेपर ही दूर होता है। 'सौन्दर्य-कुङ्कुम, सखी-प्रणय-चन्दन'-श्रीराधाका अपना सौन्दर्य ही कुङ्कुम है, सखियोंका उनके प्रति प्रणय चन्दन है, स्मितकान्ति कर्पूर है-इन तीनोंका मिश्रण उनके अङ्गोंका लेप है। सखियोंके प्रणयका अर्थ श्रीराधाका श्रीकृष्णके प्रति अनुरागको वर्धन करना है। जिस प्रकार हवाकी तरङ्गें आकर समुद्रको उद्वेलित करती हैं, उसी प्रकार श्रीराधाके महाभाव-समुद्रको सखियाँ श्रीकृष्ण-विषयक प्रसङ्गोंके द्वारा उनके प्रेम, स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, भाव, महाभाव तकको तरङ्गायित करती हैं। 'कृष्णेर-उज्ज्वल-रस-मृगमद- भर'-श्रीराधाके हृदयमें श्रीकृष्णके प्रति उन्नत-उज्जवलरस मृगमद कस्तूरी है, जो श्रीकृष्णको मदान्ध कर देता है। यही श्रीराधाका विचित्र कलेवर है। 'प्रछन्न-मान-वाम्य- धम्मिल-विन्यास'-श्रीराधा अपने कुटिल कुन्तल, घुँघराले केशोंको जूड़ेके रूपमें ऐसे बाँध देती हैं मानो श्रीकृष्णके मतवाले हाथीरूपी मनको उसमें बाँध दिया हो। "धीराधीरात्मक' गुण-अङ्गे पट्टवास'-श्रीराधा अपने धीराधीरात्मक गुणको रेशमी उत्तरीयके समान धारण करती हैं। श्रीराधा अपने धीराधीरात्मक गुणके द्वारा श्रीकृष्णको वशीभूत कर लेती हैं। रासलीलामें जब श्रीकृष्ण मन्मथ-मन्मथ रूपमें पुनः प्रकट हो गये, तब विभिन्न प्रकारकी गोपियोंने विभिन्न प्रकारसे उनका स्वागत किया, परन्तु श्रीराधा निकट न आकर दूरसे ही कुटिल-वक्र दृष्टिसे श्रीकृष्णको देखने लगीं। यह वक्र-दृष्टि वाम्य भाव है तथा यह अधीरा-नायिकाका गुण है। वे साथ ही नयनोंके द्वारा श्रीकृष्णके नवनवायमान मुखकमलके अमृतका पान भी कर रही थीं। यह धीरा नायिकाका गुण है। वे अपने इन्हीं गुणोंके द्वारा श्रीकृष्णको वशीभूतकर रसपान करवाती हैं। 'राग-ताम्बूलरागे अधर उज्ज्वल'-श्रीकृष्णके प्रति श्रीराधाका राग उनका ताम्बूल है। प्रेमकी एक विशेष अवस्था, जब प्रणयकी उत्कर्षताके कारण अत्यन्त दुःख भी अत्यन्त सुखके रूपमें अनुभूत होता है, उसे राग कहते हैं। श्रीराधा मध्याह्नकालमें सूर्यकी प्रखर किरणोंसे तप्त नुकीली शिलाओंपर खड़ी हुई श्रीकृष्णदर्शनके आनन्द-सिन्धुमें मग्न होकर सुध-बुध सम्पूर्णतः भूल गयी थीं और उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वे सुकोमल कमलदल शय्या पर खड़ी हैं। प्रेम्रकौटिल्य-नेत्रयुगले कज्ज्वल'-श्रीकृष्णके प्रति कुटिल भाव ही श्रीराधाका काजल है। रासलीलामें अन्तर्धानके पश्चात् पुनः आविर्भूत श्रीकृष्णको देखकर श्रीराधा प्रणयकोपके आवेशसे विवश होकर भृकुटि चढ़ाकर कटाक्षपात करते हुए अपने अधर दंशन करने लगीं। यहाँ भृकुटि धारण, कटाक्ष निक्षेप और अधर-दंशन- इन तीनोंके द्वारा कौटिल्यकी अभिव्यक्ति हुई है। "सुदीप्त-सात्त्विक' भाव, हर्षादि 'सञ्चारी"-महाभाव स्वरूपा होनेके कारण श्रीराधामें सभी सात्त्विक भाव सुदीप्त रूपमें प्रकाशित होते हैं। श्रीकृष्ण दर्शन, स्पर्श, आलिङ्गनसे हर्षादि सञ्चारी भाव उदित होकर उनके अङ्गोंमें सुदीप्त रूपसे प्रकाशित होते हैं। किलकञ्चित आदि भाव ही उनके अङ्गोंके भूषण हैं। 'हर्षोत्पन्न गर्व, अभिलाष, रोदन, स्मित, असूया, भय और क्रोध-इन सबके एक ही समयमें उदित सम्मिश्रणको किलकञ्चित भाव कहते हैं।' श्रीराधामें इनका उदय दानघाटी-लीलामें देखा जाता है।"-श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी॥ 166-174 ॥ श्रीराधिका ही मूर्तिमान श्रीकृष्णप्रेम-सिन्धु :- कृष्णेर विशुद्धप्रेम-रत्नेर आकर। अनुपम-गुणगण-पूर्ण कलेवर ॥ 180 ॥ अनुवाद-श्रीराधा श्रीकृष्णके विशुद्धप्रेमरूप रत्नोंकी खान हैं। इन सब अनुपम गुणोंसे श्रीराधाजीका कलेवर (शरीर) सदैव सुसज्जित रहता है॥ 180 ॥ 300 ।

आठवाँ अध्याय 8/180-186 ] अनुभाष्य-श्रीमती राधिका ही श्रीकृष्णके निर्मल प्रेमरूपी रत्नोंकी खान अर्थात् श्रीकृष्णप्रेमसिन्धुकी मूर्तिविग्रह हैं एवं श्रीराधिकाकी देह-अतुलनीय गुणोंसे परिपूर्ण है। मध्यलीला 23/81-86 संख्या देखें॥180॥ याँर सौन्दर्यादि-गुण वाञ्छे लक्ष्मी-पार्वती। याँर पतिव्रता-धर्म वाञ्छे अरुन्धती॥183॥ याँर सद्गुण-गणने कृष्ण ना पाय पार। ताँर गुण गणिबे केमने जीव छार॥"184॥ श्रीराधिका ही श्रीकृष्णप्रेमकी मूल भण्डार :- श्रीगोविन्दलीलामृत (11/122)- का कृष्णस्य प्रणयजनिभूः श्रीमती राधिकैका कास्य प्रेयस्यनुपमगुणा राधिकैका न चान्या। जैह्मयं केशे दृशि तरलता निष्ठुरत्वं कुचेऽस्या वाञ्छापूर्त्त्यै प्रभवति हरे राधिकैका न चान्या॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥181॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णके प्रणयकी जन्मभूमि कौन हैं?-एकमात्र श्रीमती राधिका। श्रीकृष्णकी अनुपम गुणोंवाली प्रिया कौन हैं?-एकमात्र श्रीमती राधिका, अन्य कोई नहीं। केशोंमें कुटिलता (घुंघरालापन), नेत्रोंमें तरलता (चञ्चलता), दोनों कुचोंमें (स्तनोंमें) निष्ठुरता (कठोरता) आदि श्रीराधिकामें ही है। एकमात्र श्रीराधिका ही श्रीहरिकी वाञ्छा पूर्ण करनेमें समर्थ हैं, और कोई भी नहीं है॥181॥ अनुवाद-जिनके सौभाग्य-गुणोंकी सत्यभामा अभिलाषा करती हैं, जिनसे समस्त व्रजरमणियाँ कला-विलासकी शिक्षा लिया करती हैं, जिनके सौन्दर्य आदि गुणोंकी लक्ष्मीजी एवं पार्वतीजी वाञ्छा किया करती हैं, जिनके पातिव्रत्यधर्मकी सतीशिरोमणि अरुन्धतीजी भी कामना किया करती हैं, जिनके सद्गुणोंका गान करते-करते श्रीकृष्ण भी पार नहीं पाते, उन श्रीराधिकाके गुणोंकी गणना एक तुच्छ जीव किस प्रकार कर सकता है?"182-184॥ अनुभाष्य-आदिलीला 4/69, 75-79, 90-96, 122-124, 240-248, 255 संख्या देखें॥182-184॥ यहाँ तक श्रीराधाकृष्णतत्त्व; अब रस-प्रेम-तत्त्व वर्णनारम्भ :- प्रभु कहे,-"जानिलुँ कृष्ण-राधा-प्रेमतत्त्व। शुनिते चाहिये दुँहार विलास-महत्त्व॥"185॥ अनुभाष्य- (प्रश्नोत्तरक्रमेण श्रीराधिका-माहात्म्यं वर्णयति-) कृष्णस्य प्रणयजनिभूः (प्रणयस्य जन्मभूमिः) का?-एका राधिका। अस्य कृष्णस्य प्रेयसी (प्रेमपात्री) का?-अनुपमगुणा (अतुलनीयगुणसमन्विता) एका राधिका, न च अन्या। अस्याः (राधिकायाः एव) केशे जैह्मयं (कौटिल्यं), दृशि (नयने) तरलता (चञ्चलता), कुचे निष्ठुरत्वं (काठिन्यं) हरेः वाञ्छा-पूर्त्त्यै (वासनापूरणाय) प्रभवति (शक्नोति), न च अन्या (कापि तादृशी)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥181॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-"मैंने कृष्णतत्त्व, राधातत्त्व और उनके परस्परके प्रेमतत्त्वको तो जान लिया है, अब मैं राधा-कृष्णके विलासकी महिमाको श्रवण करना चाहता हूँ॥"185॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'विलास-महत्त्व'-दोनोंके प्रेमविलासकी महिमा॥185॥ व्रजके किशोर-किशोरीके चरित्रका वर्णन :- राय कहे,-"कृष्ण हय 'धीर-ललित'। निरन्तर कामक्रीड़ा-याँहार चरित॥186॥ श्रीराधिकाके श्रीकृष्णवशकारी विविध गुण :- याँर सौभाग्य-गुण वाञ्छे सत्यभामा। याँर ठाञि कलाविलास शिखे व्रजरामा॥182॥ अनुवाद-श्रीरामानन्द रायने कहा,-"श्रीकृष्ण 'धीरदलित' नायक हैं। निरन्तर काम-क्रीड़ा ही उनके चरित्रका वैशिष्ट्य है॥186॥ । 301

[ 8/187-192 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/230) :- विदग्धो नवतारुण्यः परिहास-विशारदः। निश्चिन्तो धीरललितः स्यात् प्रायः प्रेयसीवशः ॥ 187 ॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 187 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - जो पुरुष चतुर, नवतरुण, परिहास-पटु, निश्चिन्त और प्रेयसीके वशीभूत होता है, वह - 'धीर-ललित' है ॥ 187 ॥ अनुभाष्य- विदग्धः (रसिकः) नवतारुण्यः (नवयौवनयुक्तः) परिहास- विशारदः (रहस्यनिपुणः) निश्चिन्त (उद्वेगरहितः) धीरललितः (नायकः) प्रायः प्रेयसीवशः (प्रेयसीनां प्रेमतारतम्येन वशीभूतः) स्यात्। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 187 ॥ श्रीराधाके साथ नित्य विलासमें रत श्रीकृष्ण :- रात्रि-दिन कुञ्जे क्रीड़ा करे राधा-सङ्गे। कैशोर-वयस सफल कैल क्रीड़ा-रङ्गे ॥ 188 ॥ अनुवाद - श्रीकृष्ण रातमें और दिनमें भी श्रीराधाके साथ कुञ्जमें विभिन्न प्रकारकी क्रीड़ाएँ करते हैं और इस प्रकार उन्होंने क्रीड़ारङ्गमें अपनी कैशोरवस्थाको सफल किया है ॥ 188 ॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/231) :- वाचा सूचितशर्वरीरतिकला-प्रागल्भ्या राधिकां व्रीड़ाकुञ्चित-लोचनां विरचयन्नग्रे सखीनामसौ। तद्वक्षोरुहचित्रकेलिमकरीपाण्डित्यपारं गतः कैशोरं सफलीकरोति कलयन् कुञ्जे विहारं हरिः ॥ 189 ॥ अनुवाद - श्रीकृष्ण प्रगल्भ (वाक्चातुर्य) वाक्योंके साथ पूर्वरात्रिमें श्रीमती राधिकाके सङ्ग घटित रतिकलाका वृत्तान्त वर्णन करने लगे। उससे लज्जावशतः श्रीमती राधिकाके दोनों नेत्र नीचे हो गये। तब श्रीकृष्ण उनके स्तनयुगलपर चित्रकेलि-भ्रमरादि चित्रित करते हुए सखियोंके मध्य विशेष पाण्डित्यका प्रकाश करने लगे। इस प्रकारकी रसक्रीड़ाके द्वारा कुञ्जमें विहार करते हुए श्रीहरिने कैशोर-अवस्थाको सफल किया ॥ 189 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 4/117 संख्या देखें ॥ 189 ॥ नित्य चिन्मयसेवा-विलासकी सर्वोत्तम अवस्था ही 'प्रेमविलास-विवर्त्त', वह जड़ निर्विशेष केवलाद्वैत-सिद्धि नहीं :- प्रभु कहे,- "एहो हय, आगे कह आर।" राय कहे,-"इहा वइ बुद्धि-गति नाहि आर ॥ 190 ॥ येबा 'प्रेमाविलास-विवर्त्त' एक हय। ताहा शुनि' तोमार सुख हय, कि ना हय ॥" 191 ॥ एत बलि' आपन-कृत गीत एक गाहिल। प्रेमे प्रभु स्वहस्ते तौर मुख आच्छादिल ॥ 192 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 190-192 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे रामानन्द! तुमने जो 'साध्य' निर्णय किया है, राधा-कृष्णके (तत्त्वका) वर्णन किया है और दोनोंके विलासकी महिमाको कहा है, वही सत्य है। किन्तु इससे आगे और जो कुछ है, उसे बोलो। श्रीरायने कहा, - इसके आगे बुद्धि और आगे काम नहीं कर पा रही। तो भी 'प्रेमविलास-विवर्त्त' नामक एक भाव है, उसे सुना रहा हूँ, इसको सुनकर आपको सुख होगा या नहीं, मैं कह नहीं सकता। तात्पर्य यह है,- अब तक मैंने 'प्रेम-विलासके स्वरूप' का वर्णन किया था। प्रेमविलासतत्त्वमें दो प्रकारके भाव हैं अर्थात् सम्भोग (मिलन) और विप्रलम्भ (विरह)। विप्रलम्भके बिना सम्भोगकी स्फूर्ति नहीं होती। विच्छेद (वियोग) का नाम ही विप्रलम्भ है। वही प्रेमविलासका विवर्त्त है अर्थात् विरहके समयमें अधिरूढ़भाववशतः सम्भोगके अभावमें भी सम्भोगकी स्फूर्त्ति होती है। श्रीराय रामानन्दके द्वारा स्वरचित इस रसके एक सङ्गीतके गान करते ना करते महाप्रभुने अपने भावमें विह्वल होकर 302 ।

३. मध्य-लीला (उत्तरार्ध): रामानन्द राय संवाद, वृन्दावन यात्रा, रूप-सनातन शिक्षा

आठवाँ अध्याय 8/190–192 ]

उनके मुखको ढक दिया। गीत-विरहकालमें श्रीमतीजीकी उक्ति है, इसलिये विप्रलम्भदशामें सम्भोगकी स्फूर्ति हुई॥ 190–192 ॥

अनुभाष्य- “व्यतीत्य भावनावर्त्म यश्चमत्कार-भारभूः। हृदि सत्त्वोज्ज्वले बाढं स्वदते स रसो मतः॥”

विशुद्ध-सत्त्वसे उज्ज्वल चित्तमें ही 'रस'का आस्वादन होता है। वह बाह्य-जगत् या अन्तर्जगत्के स्थूल-सूक्ष्म-उपाधियुक्त देह और मनके आस्वादन योग्य कार्य नहीं है। गौण स्थूल-सूक्ष्म-जगत्में जो अस्मिताका आभास लक्षित होता है, उसे अनात्म 'बुद्धि' और 'मनः' कहा जाता है। रसमय विषय रससे परिपूर्ण इन्द्रियोंके द्वारा ही ग्रहण किया जा सकता है। रसपूर्ण-इन्द्रियाँ रसमय-दर्शन-स्पर्शनादिके द्वारा रसिकशेखर, रसस्रोत, विषयविग्रह श्रीनन्दनन्दनकी प्रेममय सेवा करती हैं। यह निर्विशेषवादियोंकी प्राकृत-जगत्से परे जड़रहित अवस्था मात्र नहीं है, इसलिये 'रस'की संज्ञामें भावनावथका विशेष रूपसे अतिक्रमण लिखा गया है। भौतिकवादी लोग जड़जगत्में इन्द्रियभोगसे जो अनुभूति प्राप्त करते हैं, वे केवल उसके विपरीत भावका चिन्तन कर सकते हैं, परन्तु इस प्रकारके विचारोंसे वे अप्राकृत रसको नहीं समझ सकते। देह और मनके धर्मोंसे जो चमत्कारिता उत्पन्न होती है, वह असम्पूर्ण, लघु और नश्वर है, इसलिये ही कहा गया है कि चिन्मय-रस चमत्कारके गुरुत्वको प्रकाशित करता है। प्रेमा-शुद्ध और चिन्मय वस्तु है। अचित् वस्तुओंमें प्रीति-नश्वर है। तुच्छ-धर्म काममें ही अवस्थित है। जड़जगत्में इन्द्रियसुखमें बाधा होनेसे जो दुःख आता है, वह जड़-प्रीतिका 'विवर्त्त' है। दूसरी ओर प्रेमविलास और विलास-विवर्त्त किसी भी प्रकारका अभाव, निकृष्टता और अमङ्गल उत्पन्न नहीं करते। अप्राकृत-रस-रसिक श्रीरायरामानन्दने स्व-रचित जिस गीतका कीर्तन किया है, वह श्रीगौरसुन्दरके द्वारा अनुमोदित है या नहीं, ऐसी लीलाका अभिनय करते हुए उन्होंने प्रेम-विलास-विवर्त्तका वर्णन किया।

भक्तदास बाउल-कृत 'विवर्त्तविलास' ग्रन्थ—श्रीजगदानन्दके 'प्रेमविवर्त्त' और श्रीरामानन्दके प्रेमविलास-विवर्त्तसे सम्पूर्ण विपरीत ग्रन्थ है। आजकलके शिक्षित-अभिमानी व्यक्ति प्रेमविलास-विवर्त्तके विपरीत बुद्धि रखते हुए जड़ीय 'विवर्त्तविलास'के विचारोंका अनुसरण करके 'प्राकृत विद्यामन्दिर' (सांसारिक शिक्षा संस्थानों) से प्राकृत विद्यासागरगणों (सांसारिक विद्वानों) से 'पी.एच.डी.' की उपाधि प्राप्त कर सकते हैं, किन्तु 'परविद्यामन्दिर' (अप्राकृत शिक्षा संस्थान) से 'पी.एच. डी.' की उपाधि प्राप्त करनेके लिये जड़ीय-अहङ्कारको छोड़कर अपने नित्य स्वरूपमें अवस्थित होना पड़ेगा। मनुष्योंके द्वारा रचित धर्मशास्त्र और अप्राकृत दर्शन-शास्त्रमें आकाश-पातालका भेद है। इस भेदको श्रीमन्मध्वाचार्यने परम आदरणीय विचारोंके द्वारा सुन्दर रूपसे दिखाया है। जड़-दार्शनिक लोग जड़ीय-धारणामें ही अवस्थित हैं, इसलिये वे प्रेम-विवर्त्तको अपनी मनघड़न्त अनुभूतिके द्वारा समझनेमें समर्थ नहीं होंगे। थालीके बीचमें जिस प्रकार हाथी नहीं बैठ सकता, उसी प्रकार आरोहवादी कितना भी प्रयास कर लें, उनमें सामर्थ्य नहीं होनेके कारण उनके लिये अप्राकृत अनुभूति असम्भव है।

श्रीरामानन्द रायकी उक्तिसे जिस 'प्रेम-वैचित्त्य'के अन्तर्गत 'मोहन-मादनादि अधिरूढ़ महाभावका विलास-वैचित्र्य और विलास-विवर्त्त कहा गया है, उसको समझनेमें प्राकृत-सहजिया असमर्थ हैं। प्राकृत सहजिया श्रीरामानन्दके गीतका निर्विशेषवादी अर्थ करनेमें लगे रहेंगे, किन्तु वह (निर्विशेषवाद) न तो श्रीरामानन्दके कहनेका और न ही श्रीगौरसुन्दरके श्रवणका विषय था। आजकलके जड़ीय दार्शनिक समाजमें भजनकी निगूढ़ चमत्कारिता और अपूर्वताका प्रचार अविधिपूर्वक है, ऐसा विचार करके ही श्रीगौरसुन्दरने अपने हाथसे श्रीरामानन्दके श्रीकृष्णगानमें रत मुखकमलको ढक दिया था। इसके द्वारा यह स्थापित हुआ है कि यह गीत

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