भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1145

आठवाँ अध्याय 8/165-179 ] प्रथम अथवा पूर्वाह्नमें किये जानेवाले स्नानका जल ही कारुण्यामृत है अर्थात् पौगण्डको पार करके प्रथम कैशोरमें करुणाविशिष्ट नवयौवन है; (2) मध्यम अथवा मध्याह्नमें किये जानेवाले स्नानका जल ही तारुण्यामृत अथवा व्यक्त-यौवन है; (3) उससे श्रेष्ठ स्नान अथवा अपराह्नमें किये जानेवाले स्नानका जल लावण्यामृत अथवा पूर्णयौवन है; अर्थात् कायिक गुणोंकी जो आयु, रूप और लावण्य है, वही तीन प्रकारका स्नान-जल है। वस्त्र दो प्रकारके है- (1) अधोवसन (कमरसे नीचे पहननेवाले वस्त्र) और (2) उत्तरीय (कमरसे ऊपर पहननेवाले वस्त्र)। (1) अधोवसन-लज्जारूपा, वह श्याम रेशमी धागेसे बनी नीली-साड़ी है; (2) उत्तरीय-दूसरा वस्त्र अरुणवर्ण (लाल रङ्गका) है-वही श्रीकृष्णानुराग है। श्रीकृष्णप्रणयमानरूपी चोलीके द्वारा श्रीराधिकाका वक्षःस्थल ढका हुआ है। श्रीराधाके कायिक गुणोंका सौन्दर्य ही कुङ्कुम है और रमणीयता ही सखी-प्रणयरूपी चन्दन है तथा माधुर्य ही स्मितकान्तिरूपी कर्पूर है; ये तीन वस्तुएँ अङ्गोंके लेपन हैं अर्थात् उनके अङ्ग-सौन्दर्य, रमणीयता और माधुर्यसे भूषित हैं। श्रीकृष्णका उज्ज्वल रस ही मृगमद-कस्तूरी है, ये ही कोमलतारूपी कायिक गुण हैं। ‘प्रच्छन्नमान'–हृदयमें वक्रता होनेपर भी बाहरसे दक्षिण-भावका प्रदर्शन। ‘वाम्य'–सरलताके अभावसे वक्रता, मध्यलीला 14/161 संख्याका अनुभाष्य देखें। ‘धम्मिल्ल'–जूड़ा। ‘धीराधीरात्मक गुण'–उज्ज्वलनीलमणिमें— “धीराधीरा तु वक्रोक्त्या सवाष्पं वदति प्रियम्। धीराधीरगुणोपेता धीराधीरेति कथ्यते॥” जो नायिका प्रियतमको धीराके धर्म अर्थात् वक्रोक्तिके द्वारा और अधीराके धर्म अर्थात् नेत्रोंमें अश्रु भरकर कुछ वचन कहती है, वह ‘धीराधीरा' है। मध्यलीला 14/143-153 संख्या देखें। ‘धीराधीरा-मध्या'के जो गुण हैं, ‘धीराधीरा-प्रगल्भा'के भी वही सब गुण होते हैं। ‘प्रगल्भा', ‘मध्या' और ‘मुग्धा',–इन तीनोंमें ‘प्रगल्भा' अत्यन्त क्रोधित होकर डाँटने-फटकारनेवाली है; ‘मध्या' कुछ कम क्रोधित होकर कठोर बात कहनेवाली है एवं ‘मुग्धा' थोड़ासा क्रोध करके रोने लगती है। खण्डित- अवस्थामें इन गुणोंका विशेष प्रकाश होता है। ‘पट्टवास'–पगड़ी; रेशमका उत्तरीय वस्त्र एकपाटा। पाठान्तरमें ‘पटवास'–वस्त्रसमूह, गन्धचूर्ण, पिसे हुए चावलसे बनी पेस्ट, साटिन (एक प्रकारका वस्त्र)। श्रीकृष्णराग ही ताम्बूलका वर्ण है, उसके द्वारा अधर उज्ज्वल होते हैं; प्रेम-कुटिलता ही दोनों नेत्रोंका काजल है। ‘सुद्दीप्त सात्त्विकभाव'–मध्यलीला 6/12 संख्या; ‘हर्षादि तैंतीस सञ्चारीभाव'–मध्यलीला 3/127 संख्या एवं मध्यलीला 14/167-168 संख्याका अमृतप्रवाह भाष्य देखें। ‘किलकिञ्चित् आदि भाव'–मध्यलीला 14/168 संख्या देखें। ‘गुणश्रेणी-पुष्पमाला'–मध्यलीला 23/82-86 संख्या देखें। उज्ज्वलनीलमणिमें लिखे श्रीराधाके पच्चीस गुण— “बहुना किं गुणास्तस्याः संख्यातीता हरेरिव। इत्यङ्गोक्तिमनस्थास्ते परसम्बन्धगास्तथा। गुणा वृन्दावनैश्वर्या इहा प्रोक्ताश्चतुर्विधाः॥” और अधिक क्या कहें, श्रीहरिके समान श्रीराधिकामें भी असंख्य गुणसमूह नित्य वर्तमान है। उनके गुण चार भागोंमें विभक्त हैं— (क) अङ्गस्थ (अङ्गोंमें स्थित गुण) (ख) उक्तिस्थ (वचनोंमें स्थित गुण) (ग) मनस्थ (मनमें स्थित गुण) और (घ) परसम्बन्धग (दूसरोंसे सम्बन्धित गुण)। (क) अङ्गस्थ गुण छह हैं— (1) मधुरा अथवा चारु, अर्थात् वे देखनेमें परम सुन्दरी हैं, । 297

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