श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 8/165-179 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अङ्गकान्ति उज्ज्वल हुई है। (2) पूर्वाह्नमें कारुण्यामृतमें, मध्याह्नमें तारुण्यामृतमें और संध्यामें लावण्यामृतमें स्नान किया गया जिनका विग्रह इन्दिरा तकको लज्जित करता है। (3) लज्जारूपी रेशमीवस्त्रका परिधान, सौन्दर्यरूपी कुङ्कुमसे शोभित और श्यामवर्ण उज्ज्वल या शृङ्गाररसरूप कस्तूरीके द्वारा जिनका चित्रित कलेवर है। (4) कम्प, अश्रु, पुलक, स्तम्भ, स्वेद, गद्गद स्वर, रक्तता, उन्माद और जड़तारूपी नौ उत्तम रत्नोंसे जो अलङ्कृत हैं। (5) सौन्दर्य-माधुर्यादि सभी गुण पुष्पमालारूपमें जिनके शरीरपर विराजमान हैं; धीर और अधीरा भावको उन्होंने पट्टवास अर्थात् कर्पूरादिके द्वारा निर्मल किया है। (6) प्रच्छन्नरूपसे मान ही जिनका धम्मिल अर्थात् जूड़ा है, सौभाग्यरूपी तिलकके द्वारा जिनका मस्तक उज्ज्वल है; श्रीकृष्णके नाम और यशका श्रवण ही जिनके कानोंके आभूषण हैं। (7) अनुरागरूपी ताम्बूलके द्वारा जिनके ओंठ लालीसे रञ्जित हैं; प्रेम-कौटिल्यको ही जिन्होंने नेत्रोंके काजलके रूपमें धारण किया है; नर्म अर्थात् उपहासके कारण मृदुहास्यरूपी-कर्पूरके द्वारा जो सुगन्धित हैं। (8) अपने अङ्गसौरभरूप-अन्तःपुरमें गर्वरूपी पलङ्गके ऊपर शयन करनेपर उनका विप्रलम्भरूपी हार प्रेमवैचित्यरूपी तरल (हारके बीचकी मणि)के रूपमें इधर-उधर झूलता है। (9) प्रणयक्रोधरूपी कञ्चुलीके द्वारा जिनके स्तनयुगल आवृत हैं; सपत्नियोंके (सौतनके) मुख और हृदयका शोषणकारी यशःश्री (यश और सौन्दर्य) ही जिनकी कच्छपी वीणा है। (10) जिन्होंने कैशोररूप-सखीके कन्धेपर लीलारूपी हस्तकमल रखा है; जो बहुत प्रकारके गुणोंसे युक्त होनेपर भी श्रीकृष्ण-कन्दर्पको आनन्दप्रदायक मधुका परिवेशन कर रही हैं।
(11) ऐसी श्रीराधासे दाँतमें तृण धारण करके मैं प्रार्थना कर रहा हूँ,-अपने दास्यरूप अमृतका दान करके इस अति दुःखितजनके प्राणोंकी रक्षा कीजिये। (12) हे गान्धर्विके ! दयामय श्रीकृष्ण जिस प्रकार शरणागत दुष्टजनोंका भी परित्याग नहीं करते, उसी प्रकार आप भी अपने आश्रित इस (दुष्ट) जनका त्याग मत करना। (13) श्रीराधारानीकी कृपाके हेतुस्वरूप इस प्रेमाम्भोजमकरन्द नामक स्तवराजका जो पाठ करता है, वह उनका दास्य प्राप्त करके धन्य हो जाता है। 'किलकिञ्चितादि भाव'-बीस प्रकारके हैं। ये बीस भाव- (1) 'अङ्ग'ज'-भाव, हाव, हेला; (2) 'आत्मज'-शोभा, कान्ति, दीप्ति, माधुर्य, प्रगल्भता, औदार्य और धैर्य; (3) 'स्वभावज'-किलकिञ्चित, लीला, विलास, विच्छित्ति, विभ्रम, मोट्टायित, कुट्टमित, विव्वोक, ललित और विकृत। 'गुणश्रेणी-पुष्पमाला'-श्रीमतीके गुण तीन प्रकारके हैं-मानसिक, वाचिक और शारीरिक। (1) 'मानसिक'-कृतज्ञता, क्षमा और कारुण्यादि; (2) 'वाचिक'-कानोंको आनन्ददायक वाक्य-प्रयोगादि; (3) 'कायिक'-गुण, आयु, रूप, लावण्य और सौन्दर्यादि। 'कृष्णलीला-मनोवृत्ति-सखी'-श्रीकृष्णलीलानन्दरूपा श्रीमतीकी आठ मनोवृत्तियाँ आठ सखियाँ हैं और उनकी अनुवृत्तियाँ अन्यान्य मञ्जरियाँ हैं। 'श्यामरस'-मधुर रस ॥ 165-179 ॥ अनुभाष्य-श्रीमती राधिकाका स्वरूप-वे श्रीकृष्णकी अभिलाषाओंको पूर्ण करनेवाली महाभाव चिन्तामणि हैं। ललितादि सखियाँ-उनके कायव्यूहके समान अथवा प्रकाशविन्यास हैं। (1) श्रीकृष्णस्नेहरूपी उबटन मलकर
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