भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1143

अपना तृतीय सन्ध्याका स्नान लावण्यरूपी अमृतकी धारामें करती हैं। वे अपनी लज्जारूप श्यामवर्णकी रेशमी साड़ी धारण करती हैं। श्रीकृष्णके प्रति अपने अनुरागरूप लाल रङ्गके उत्तरीय वस्त्रको धारण करती हैं। प्रणय और मान नामकी कञ्चुलिकाके द्वारा अपने श्रीवक्षःस्थलको आच्छादित करती हैं। उनके कायिक गुणोंका सौन्दर्य ही 'कुङ्कुम' है, सखियोंके प्रति उनका प्रणय ही 'चन्दन' है तथा उनकी मृदु मुस्कानकी कान्ति ही 'कर्पूर' है-इस प्रकार इन तीन वस्तुओं 'कुङ्कुम', 'चन्दन' और 'कर्पूर' से वे अपने श्रीअङ्गोंका लेपन करती हैं। श्रीकृष्णके शृङ्गाररसरूप मृगमदसे वे अपने समस्त चिन्मय अङ्गोंका शृङ्गार करती हैं। प्रच्छन्न-मान और वाम्यभावको श्रीराधाजी सुन्दर केशपाशके रूपमें ग्रथित करती हैं। धीराधीरात्मक गुणोंको अपने अङ्गोंमें वे वस्त्रके रूपमें धारण करती हैं। श्रीकृष्णके प्रति अनुरागरूपी ताम्बूलके लालवर्णसे श्रीराधाके अधर उज्ज्वल हैं। प्रेमकी कुटिलताको वे अपने नेत्रोंमें काजलके रूपमें धारण करती हैं। सुदीप्त सात्त्विकभाव तथा हर्षादि सञ्चारीभाव रूपी आभूषणोंसे वे अपने श्रीअङ्गोंको सुशोभित करती हैं। किलकिञ्चितादि बीस प्रकारके भावरूपी आभरणोंसे वे विभूषित हैं और माधुर्यादि गुणोंकी पुष्पमालाको उन्होंने समस्त अङ्गोंमें धारण कर रखा है। सौभाग्यरूपी मनोहर तिलक श्रीराधाके सुन्दर ललाटपर उज्ज्वलरूपमें दमक रहा है और प्रेम-वैचित्त्य आदि रत्न उनके हृदय-हारकी मध्य मणि बनकर स्निग्ध रूपसे शोभायमान हो रहे हैं। श्रीराधाकी मनोवृत्तियाँ ही उनकी निकट रहनेवाली सखियाँ हैं जो सदा श्रीकृष्ण-लीलामें ही आविष्ट रहती हैं। उन्होंने अपने करकमलको नित्य कैशार-अवस्थारूपी सखीके कन्धेपर अर्पण कर रखा है। अपने अङ्ग-सौरभरूप भवनमें गर्वरूपी पलङ्गपर आसीन होकर वे सदा श्रीकृष्ण-अङ्ग-सङ्गका चिन्तन करती हैं। श्रीकृष्णनाम, श्रीकृष्णगुण और श्रीकृष्णयश रूप अलङ्कार श्रीराधाके कर्णभूषण हैं और श्रीकृष्णका नाम-गुण-यश ही निरन्तर उनके मुखसे प्रवाहित होता रहता है। श्यामरस (शृङ्गार-रस) रूप मधुका श्रीकृष्णको पान कराकर वे निरन्तर श्रीकृष्णकी समस्त कामनाओंको पूर्णरूपसे सम्पन्न करती हैं॥ 166-179 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीराधिकाके गुणोंका वर्णन करनेके लिये कविराज गोस्वामीने श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके द्वारा रचित 'प्रेमाम्भोज-मकरन्द' नामक स्तवको आधार बनाया है- “महाभावोज्ज्वलच्चिन्तारत्नोद्भावितविग्रहाम्। सखीप्रणयसद्गन्धवरोद्वर्त्तन-सुप्रभाम्॥ 1 ॥ कारुण्यामृतवीचिभिस्तारुण्यामृतधारया। लावण्यामृतवन्याभिः स्नपितां ग्लपितेन्दिराम् ॥ 2 ॥ ह्रीपट्टवस्त्रगुप्ताङ्गीं सौन्दर्यघृसृणाश्रिताम्। श्याममोज्ज्वलकस्तूरीविचित्रितकलेवराम् ॥ 3 ॥ कम्पाश्रुपुलकस्तम्भस्वेदगद्गदरक्तता। उन्मादो जाड्यमित्येतै रत्नैनैर्वाभिरुत्तमैः॥ 4 ॥ क्लिप्तालङ्कृतिसंश्लिष्टां गुणालीपुष्पमालिनीम्। धीराधीरात्व-सद्वास-पटवासैः परिष्कृताम् ॥ 5 ॥ प्रच्छन्नमानधम्मिल्लां सौभाग्यतिलकोज्ज्वलाम्। कृष्णनामयशःश्रावावतंसोल्लासिकर्णिकाम् ॥ 6 ॥ रागताम्बूलरक्तोष्ठीं प्रेमकौटिल्य-कज्ज्वलाम्। नर्मभाषितनिःस्यन्दस्मित-कर्पूरवासिताम्॥ 7 ॥ सौरभान्तःपुरे गर्वपर्यङ्कोपरि लीलया। निविष्टां प्रेम-वैचित्त्य-विचलत्तरलाश्रिताम् ॥ 8 ॥ प्रणयक्रोधसच्छोलीबन्धुगुप्तीकृतस्तनाम्। सपत्नीवक्त्रहृच्छोषि-यशःश्री-कच्छपी-वराम्॥ 9 ॥ मध्यातात्मसखीस्कन्धलीलान्यस्तकराम्बुजाम्। श्यामां श्यामस्मरामोदमधूली-परिवेशिकाम्॥ 10 ॥ त्वां नत्वा याचते धृत्वा तृणं दन्तैरयं जनः। स्वदास्यामृतसेकेन जीवयामुं सुदुःखितम् ॥ 11 ॥ न मुञ्चेच्चरणायतातमापि दुष्टं दयामयः। अतो गान्धर्विके हा हा मुञ्चैनं नैव तादृशम् ॥ 12 ॥ प्रेमाम्भोजमकरन्दाख्यं स्तवराजमिमं जनः। श्रीराधिकाकृपाहेतुं पठंस्तद्दास्यमाप्नुयात् ॥ 13 ॥ (1) महाभावरूप उज्ज्वलचिन्तामणिके द्वारा भावित जिनका विग्रह है, श्रीकृष्णके प्रति सखीका जो प्रणय हैं, उसी सुगन्धित कुङ्कुम आदिके द्वारा जिनकी