भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1142

[ 8/158–179 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ]

प्रसिद्ध हैं। श्रीकृष्ण ब्रह्म-स्वरूप हैं, श्रीराधा आनन्दचिन्मय हैं तथा गोपियाँ उनकी अंश, कलादि हैं। शत कोटि गोपियोंके द्वारा भी श्रीकृष्णकी कान्ता-प्रेमास्वादनकी वासना पूर्ण नहीं होती—इसके द्वारा ही श्रीराधाकी प्रेम-महिमाका अनुमान लगाया जा सकता है। श्रीराधा केवल आनन्दरस-स्वरूपा हैं तथा अखण्ड रसवल्लभा रसकी मूर्ति हैं; उनका तत्त्व रसयुक्त है। श्रीराधाका स्वरूप महाभावसे गठित है। यही महाभाव चिन्तामणिके समान है। चिन्तामणिके समान श्रीराधा श्रीकृष्णकी समस्त इच्छाओं, अकाङ्क्षाओंकी पूर्त्ति करती हैं। यद्यपि श्रीकृष्णके स्वरूपमें जगत्की सृष्टिकी कामनाएँ नहीं होतीं, क्योंकि 'मद्भक्तविनोदाय' अर्थात् अपने भक्तोंका विनोद करना ही उनका एकमात्र कार्य है, तथापि उन्होंने ऐसी कामना की—'स अकामयत'। इसलिये उन्होंने इस कामनाको अपने अंशके कला कारणाब्धिशायी विष्णुसे सम्पादित कराया। तब जगत्की सृष्टि करनेके लिये श्रीकृष्णशक्ति श्रीराधा महामाया बन गईं।"—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 158–164 ॥

श्रीकृष्ण-प्रणयकी मूर्त्तविग्रह श्रीराधिकाका वर्णन :— राधा-प्रति कृष्ण-स्नेह-सुगन्धि उद्वर्त्तन। ता'ते सुगन्धि देह-उज्ज्वल-वरण ॥ 165 ॥

अनुवाद—श्रीराधाके प्रति श्रीकृष्णका स्नेह ही श्रीराधाका सुगन्धित उबटन है। इस उबटनसे ही श्रीराधाकी देह सुगन्धित और उज्ज्वलवर्ण हो जाती है ॥ 165 ॥ अनुभाष्य—'सुगन्धि उद्वर्त्तन'—सुगन्धित उबटन, जिसके द्वारा अङ्गोंका मैल दूर होता है; इसलिये इस श्रीकृष्णस्नेहरूपी उबटनको मलनेके कारण उनकी देह सुगन्धित और उज्ज्वल वर्णकी है ॥ 165 ॥

श्रीराधाका तीन प्रकारकी धारामें स्नान, श्रीराधाके विग्रहका वर्णन :— कारुण्यामृत-धाराय स्नान प्रथम। तारुण्यामृत-धाराय स्नान मध्यम ॥ 166 ॥


लावण्यामृत-धाराय तदुपरि स्नान। निज-लज्जा-श्याम-पट्टसाटि-परिधान ॥ 167 ॥ कृष्ण अनुराग-द्वितीय अरुण-वसन। प्रणय-मान-कञ्चुलिकाय वक्ष-आच्छादन ॥ 168 ॥ सौन्दर्य-कुङ्कुम, सखी-प्रणय-चन्दन। स्मितकान्ति-कर्पूर, तिने-अङ्गे विलेपन ॥ 169 ॥ कृष्णेर-उज्ज्वल रस-मृगमद-भर। सेइ मृगमदे विचित्र कलेवर ॥ 170 ॥ प्रच्छन्न-मान-वाम्य-धम्मिल्ल-विन्यास। 'धीराधीरात्मक' गुण-अङ्गे पट्टवास ॥ 171 ॥ राग-ताम्बूलरागे अधर उज्ज्वल। प्रेमकौटिल्य-नेत्रयुगले कज्ज्वल ॥ 172 ॥ 'सुदीप्त-सात्त्विक' भाव, हर्षादि 'सञ्चारी'। एइ सब भाव-भूषण सब अङ्गे भरि' ॥ 173 ॥ 'किलकिञ्चितादि'-भाव-विंशति-भूषित। गुणश्रेणी-पुष्पमाला सर्वाङ्गे पूरित ॥ 174 ॥ सौभाग्य-तिलक चारु-ललाटे उज्ज्वल। प्रेम-वैचित्त्य-रत्न, हृदय-तरल ॥ 175 ॥ मध्य-वयस, सखी-स्कन्धे कर-न्यास। कृष्णलीला-मनोवृत्ति-सखी आशपाश ॥ 176 ॥ निजाङ्ग-सौरभालये गर्व-पर्यङ्क। ता'ते बसिं' आछे, सदा चिन्ते कृष्णसङ्ग ॥ 177 ॥ कृष्ण-नाम-गुण-यश-अवतंस काणे। कृष्ण-नाम-गुण-यश-प्रवाह-वचने ॥ 178 ॥ कृष्णके कराय श्यामरस-मधु पान। निरन्तर पूर्ण करे कृष्णेर सर्वकाम ॥ 179 ॥

अनुवाद—श्रीराधा अपना प्रथम स्नान करुणाकी अमृतमयी धारामें करती हैं, मध्याह्नकालीन द्वितीय स्नान वे अभिनव तारुण्य-अमृत-तरङ्गिणीमें करती हैं और

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