श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय 8/158-164 ] करके मूर्च्छित हो जाते हैं। यह मोहन भाव श्रीराधाके यूथकी सखियोंमें उदित होनेपर भी अधिकतर श्रीराधामें ही उदित होता है। मोहनकी एक वृत्ति दिव्योन्माद कहलाती है जिसमें उद्घूर्णा, चित्रजल्पादि अवस्थाएँ उदित होती हैं। भागवत दशम स्कन्धके भ्रमरगीतमें इनका सरस वर्णन है। मोहन भावसे भी अति उत्कृष्ट चमत्कारपूर्ण ह्लादिनी नामक महाशक्तिका स्थिरांश केवल श्रीमती राधिकामें ही नित्यकाल विराजमान रहता है—इसीको 'मादन'-महाभाव कहते हैं; यह मादन-महाभाव ललिता आदिमें भी उदित नहीं होता। 'महाभाव स्वरूपा श्रीराधा ठाकुरानी' कहनेसे महाभावकी सर्वोच्चावस्था 'मादन'को ही समझना चाहिये। श्रीराधा महाभावकी समुद्र हैं। अन्य शक्तियों, महिषियों आदिमें भी महाभाव है, किन्तु उनमें वह आंशिक मात्रामें होता है। जैसे समुद्रके साथ ताल, कुँआ, सरोवर आदिकी तुलना नहीं है, वह अपनी उपमा स्वयं है, उसका जल अगाध अपार है; इसी प्रकार महाभाव-स्वरूपा श्रीराधा ठाकुरानी समस्त प्रकारके भावोंको क्रोड़ीभूत करती हुई महाभावके अपार अगाध भण्डार तथा वैशिष्ट्यके साथ विराजमान हैं। जितनी भी व्रजगोपियाँ हैं, उन सभीमें कला-कौशल, प्रेम-परिपाटी, सेवा-दक्षता आदि है तथा श्रीकृष्ण उनके साथ भी लीला-विलास करते हैं। किन्तु ये समस्त गुण श्रीराधामें चरम सीमामें हैं। इसलिये श्रील भक्तिविनोद ठाकुरने स्वकृत पदमें श्रीकृष्णके मनोभावको इस प्रकार व्यक्त किया है—'बले तुहुँ बिना काहार रास, तुहुँ लागि मोर बरज वास।' अर्थात् श्रीकृष्ण श्रीराधासे कह रहे हैं कि यह रसास्वादन तुम्हारे सङ्गके अतिरिक्त अन्यत्र कहीं नहीं है। रसास्वादनके लिये ही रासलीला है। 'रसानाम् समूह इति रासः।' श्रीकृष्ण कुञ्जोंमें, वन-उपवनमें अनेक प्रकारकी लीलाएँ करते हैं तथा उन विभिन्न रूपोंमें कुछ भावोंका आस्वादन करते हैं। किन्तु सामुदायिक रूपमें समस्त रसोंका आस्वादन केवलमात्र रासलीलामें ही है। रासलीलाकी नायिका-शिरोमणि श्रीराधा हैं, इसलिये श्रीकृष्णने श्रीराधाको आकर्षितकर उनके सङ्ग लीला-विनोद किया। उस रासलीलामें समस्त प्रकारके भाव श्रीराधामें समस्त रूपोंमें प्रकाशित हुए। श्रीकृष्णको वशीभूत करनेका मन्त्र महाभाव ही है। इसकी किञ्चित्मात्र गन्ध भी न रहनेसे श्रीकृष्ण वशीभूत नहीं होते और न ही अधीनता स्वीकार करते हैं। इसी कारण साधक महाभाव-स्वरूपा श्रीराधाका आश्रय ग्रहण करते हैं। उनका आश्रय ग्रहण किये बिना साधककी समस्त साधन-चेष्टा निष्फल रहती है, क्योंकि उसके द्वारा श्रीकृष्णको आकर्षित करनेका गुण नहीं प्राप्त होता। इसलिये गौड़ीय-वैष्णव श्रीराधाका प्राधान्य स्वीकार करते हैं। श्रीकृष्ण ऐसी लीलाएँ करते हैं जिनके द्वारा श्रीराधामें किलकिञ्चित आदि भावोंका प्रकाश होता है, जिन्हें देखकर श्रीकृष्ण चमत्कृत हो जाते हैं। अन्य सभी नायिकाओंके साथ श्रीकृष्णके लीला-विनोदसे उन नायिकाओंमें भी भाव प्रकाशित होते हैं, किन्तु वे सीमित होते हैं। श्रीराधामें समस्त भाव असीमित रूपमें प्रकाशित होते हैं। श्रीराधाके तीन स्वरूप हैं—श्रीकृष्णाङ्गमें 'शक्ति स्वरूप'में, 'आनन्दवर्धनकारी श्रीराधा' रूपमें और 'मन्त्र' रूपमें। इन तीन स्वरूपोंकी मूल 'आनन्दवर्धनकारी श्रीराधा' हैं। श्रीकृष्णकी अनन्त प्रेयसियाँ हैं, जिनमें तीन मुख्या हैं- वैकुण्ठकी लक्ष्मियाँ, द्वारकाकी महिषियाँ तथा व्रजगोपियाँ। इन तीनों प्रकारकी कान्ताओंका विस्तार श्रीराधासे होता है; वे ही सबकी मूल अंशिनी हैं। श्रीराधाका चित्त, इन्द्रियाँ और उनकी देह कृष्णप्रेमसे गठित हैं। ब्रह्मसंहिता (5/37)—'आनन्दचिन्मयरस- प्रतिभाविताभिः...' अर्थात् आनन्दचिन्मयरस ह्लादिनी तथा संवित्का सार है। इसी आनन्दचिन्मयरससे गठित व्रजगोपियाँ और उनमें भी आनन्द चिन्मयरसकी मूर्तिमान स्वरूप वृषभानुनन्दिनी श्रीराधा श्रीकृष्णकी कान्ता रूपमें । 293