भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1140

[ 8/147-164 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-श्रीराधाजीकी देह प्रेम-स्वरूप है अर्थात् वह प्रेमसे ही गठित है। श्रीकृष्णकी समस्त प्रेयसियोंमें वे श्रेष्ठतमा हैं, यह बात सारा जगत् जानता है॥161॥ अमृतप्रवाह भाष्य-यहाँ आदिलीलाके चौथे अध्याय पर ठीकसे विचार करनेपर यह सब विषय अच्छेसे समझ आ जायेंगे॥ 147-161॥ ब्रह्मसंहिता (5/37) :- आनन्दचिन्मयरस-प्रतिभाविताभि- स्ताभिर्य एव निजरूपतया कलाभिः। गोलोक एव निवसत्यखिलात्मभूतो गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 162॥ अनुवाद-आनन्द चिन्मयरसके द्वारा प्रतिभाविता, अपने चित्-रूपके अनुरूपा, चिन्मयरसस्वरूपा, चौंसठ कलाओंसे युक्ता, ह्लादिनीशक्तिस्वरूपा श्रीराधा और उनकी कायव्यूहस्वरूपा सखियोंके साथ जो अखिलात्मभूत गोविन्द अपने गोलोकधाममें निवास करते हैं, ऐसे आदिपुरुष श्रीगोविन्दका मैं भजन करता हूँ॥162॥ अनुभाष्य-आदिलीला 4/68-72 संख्या देखें॥158-162॥ श्रीराधा श्रीकृष्णकी वाञ्छाको पूर्ण करनेवाली, अष्टसखियाँ-उनकी कायव्यूह :- सेइ महाभाव हय 'चिन्तामणि-सार'। कृष्ण-वाञ्छा पूर्ण करे एइ कार्य ताँर ॥ 163 ॥ 'महाभाव-चिन्तामणि' राधार स्वरूप। ललितादि सखी-ताँर कायव्यूहरूप ॥ 164 ॥ अनुवाद-यही महाभाव चिन्तामणिका सार है; श्रीकृष्णकी समस्त वाञ्छाओंको पूर्ण करना ही इसका कार्य है। 'महाभाव-चिन्तामणि' श्रीराधाजीका स्वरूप है और श्रीललिता आदि सखियाँ उनकी कायव्यूहरूपा हैं॥163-164॥ अनुभाष्य-आदिलीला 4/79, 87 और 94 संख्या तथा 5/213 और 215 संख्या देखें॥163-164॥ अमृताणुकणिका-“(उःनीः 14/156-157)- “मुकुन्दमहिषीवृन्दैरप्यसावतिदुर्लभः । व्रजदेव्येकसंवेद्यो महाभावाख्ययोच्यते ॥ 156 ॥ वरामृतस्वरूपश्रीः स्वं स्वरूपं मनो नयेत् ॥ 157 ॥” अर्थात् रुक्मिणी आदि महिषियोंमें भी महाभाव अत्यन्त सुदुर्लभ है, यह केवलमात्र श्रीराधा आदि व्रजदेवियोंके द्वारा अनुभूत है। शृङ्गाररसमें श्रीनन्दनन्दन विषय-तत्त्वकी और श्रीराधा आश्रय-तत्त्वकी चरम सीमा हैं। उनका अनुराग ही स्थायीभाव है। अनुराग ही चरमावस्थामें यावदाश्रयवृत्तिके रूपमें स्वसंवेद्य दशाको प्राप्त होनेपर 'महाभाव' कहलाता है। महाभाव श्रेष्ठ अमृतके समान स्वरूप-सम्पत्ति धारणकर चित्तको अपना स्वरूप प्राप्त कराता है। माधुर्य ही इसकी स्वरूपगत सम्पत्ति है। यह अतुलनीय माधुर्यमय है। महाभाव रूढ़ और अधिरूढ़के भेदसे दो प्रकारका होता है। रूढ़ महाभावमें संयोग और वियोगमें निमेषकालकी भी असहिष्णुता, निकटवर्ती जनसमूहका हृदय विलोडन, कल्प-क्षणत्व (मिलनमें एक कल्प भी एक क्षणके समान प्रतीत होना), श्रीकृष्णके सुखमें आर्त्तिकी आशङ्कासे खिन्नता, मोहादिके असद्भावमें भी आत्म-विस्मृति, क्षण-कल्पत्व (वियोगमें एक क्षण भी एक कल्पके समान लगना) आदि अनुभाव हैं। जिस समय उक्त अनुभावसमूह रूढ़भावमें कहे गये अनुभावोंसे भी उत्तरोत्तर किसी विशेष दशाको प्राप्त होते हैं, उसे अधिरूढ़ महाभाव कहते हैं। यह अधिरूढ़ महाभाव भी मोदन और मादन दो प्रकारका होता है। जिस अधिरूढ़ महाभावमें नायिका और नायकके स्तम्भादि सात्त्विक भावसमूह अतिशय उद्दीप्त रूपमें प्रकाशित होते हैं, उसे मोदन कहते हैं। मोदन ही विरह अवस्थामें मोहन कहलाता है। मोहन-भावयुक्त प्रेयसीके प्रभावसे ब्रह्माण्डके सभी लोग क्षुब्ध हो जाते हैं और पशु-पक्षी भी रोदन करने लगते हैं। यहाँ तक कि सत्यभामादि महिषियोंके द्वारा आलिङ्गित होनेपर भी द्वारकेश श्रीकृष्ण श्रीराधाकी मोहन अवस्थाका श्रवण 292 ।

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