भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1139, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1139

आठवाँ अध्याय 8/152-161 ] अनुभाष्य-आदिलीला 7/119 संख्या देखें ॥ 152 ॥ श्रीकृष्णके स्वरूपसे अभिन्न स्वरूपशक्ति :- सच्चिदानन्दमय कृष्णेर स्वरूप। अतएव स्वरूप-शक्ति हय तिन रूप ॥ 153 ॥ स्वरूपशक्तिके तीन रूप :- आनन्दांशे 'ह्लादिनी', सदंशे 'सन्धिनी'। चिदंशे 'सम्वित्', यारे ज्ञान करि' मानि ॥ 154 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णका स्वरूप सच्चिदानन्दमय (सत्, चित् और आनन्दमय) है, इसलिये उनकी स्वरूपशक्तिके भी तीन रूप हैं। वह स्वरूप-शक्ति आनन्द-अंशसे 'ह्लादिनी', सत्-अंशसे 'सन्धिनी' और चित्-अंशसे 'सम्वित्', जिसको ज्ञान भी कहा जाता है, -इन तीन रूपोंको धारण करती है ॥ 153-154 ॥ विष्णुपुराण (1/12/69) :- ह्लादिनी सन्धिनी सम्वित् त्वय्येका सर्वसंश्रये। ह्लादतापकरी मिश्रा त्वयि नो गुणवर्जिते ॥ 155 ॥ अनुवाद-हे भगवन्! आप सभीके आश्रय और निर्गुण हैं। आपमें स्थित त्रिविधरूप शक्ति 'ह्लादिनी', 'सन्धिनी' और 'सम्वित्', तीनों चिन्मय हैं। मायाके वशमें होने योग्य चित्-कण जीव जब मायामें आविष्ट होकर मायाके तीन गुणोंका आश्रय करते हुए जिस अवस्थाको प्राप्त करते हैं, उस अवस्थामें वह शक्ति 'ह्लादकारी', 'तापकरी' और 'मिश्रा'-इन तीन प्रकारके भावोंको प्राप्त करती है। किन्तु सभी गुणोंसे अतीत आपमें यह शक्ति निर्मल और निर्गुणस्वरूपमें एकाकार होकर रहती है ॥ 155 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 4/61-63 संख्या देखें ॥ 153-155 ॥ ह्लादिनी-संज्ञाका कारण और कार्य :- कृष्णेके आह्लादे, ता'ते नाम- 'आह्लादिनी'। सेइ शक्ति-द्वारे सुख आस्वादे आपनि ॥ 156 ॥ सुखरूप कृष्ण करे सुख आस्वादन। भक्तगणे सुख दिते 'ह्लादिनी'-कारण ॥ 157 ॥ अनुवाद-जो शक्ति श्रीकृष्णको आनन्द प्रदान करती है, उसका नाम 'आह्लादिनी' है। उस शक्तिके द्वारा श्रीकृष्ण स्वयं सुखका आस्वादन करते हैं। स्वयं सुखरूप होनेपर भी श्रीकृष्ण ह्लादिनी-शक्तिके द्वारा सभी प्रकारके सुखोंका आस्वादन करते हैं और वे भक्तोंको भी ह्लादिनी-शक्तिके द्वारा सुख प्रदान करते हैं ॥ 156-157 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 4/59-60 संख्या देखें ॥ 156-157 ॥ ह्लादिनी और श्रीराधिका :- ह्लादिनीर सार अंश, तार 'प्रेम' नाम। आनन्दचिन्मयरूप रसेर आख्यान ॥ 158 ॥ प्रेमेर परम-सार 'महाभाव' जानि। सेइ महाभावरूपा राधा-ठाकुराणी ॥ 159 ॥ अनुवाद-ह्लादिनीके सार अंशका नाम 'प्रेम' है। प्रेमकी व्याख्या करनेपर इसे आनन्दचिन्मयरस भी कहा जाता है। प्रेमका परम सार 'महाभाव' है, वही महाभावरूपा श्रीराधा-ठाकुरानी हैं ॥ 158-159 ॥ उज्ज्वलनीलमणिमें राधा-चन्द्रावलीके तारतम्य-वर्णनमें (4/3) - तयोरप्युभयोर्मध्ये राधिका सर्वथाधिका। महाभावस्वरूपेयं गुणैरतिवरीयसी ॥ 160 ॥ अनुवाद-श्रीराधा और श्रीचन्द्रावलीके मध्यमें भी श्रीराधा ही सभी प्रकारसे श्रेष्ठा हैं। वे महाभावस्वरूपिणी हैं अर्थात् उनका विग्रह महाभावमय हैं, क्योंकि वे ह्लादिनी शक्तिकी सारांश हैं और गुणोंमें भी अत्यन्त श्रेष्ठा हैं ॥ 160 ॥ श्रीराधाका 'स्वरूप' और 'देह' एक ही वस्तु, वह सम्पूर्ण श्रीकृष्णप्रेममय :- प्रेमेर 'स्वरूप'-'देह'-प्रेमेर भावित। 'कृष्णेर प्रेयसी-श्रेष्ठ' जगते विदित ॥ 161 ॥ । 291