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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

आठवाँ अध्याय 8/158-164 ] करके मूर्च्छित हो जाते हैं। यह मोहन भाव श्रीराधाके यूथकी सखियोंमें उदित होनेपर भी अधिकतर श्रीराधामें ही उदित होता है। मोहनकी एक वृत्ति दिव्योन्माद कहलाती है जिसमें उद्घूर्णा, चित्रजल्पादि अवस्थाएँ उदित होती हैं। भागवत दशम स्कन्धके भ्रमरगीतमें इनका सरस वर्णन है। मोहन भावसे भी अति उत्कृष्ट चमत्कारपूर्ण ह्लादिनी नामक महाशक्तिका स्थिरांश केवल श्रीमती राधिकामें ही नित्यकाल विराजमान रहता है—इसीको 'मादन'-महाभाव कहते हैं; यह मादन-महाभाव ललिता आदिमें भी उदित नहीं होता। 'महाभाव स्वरूपा श्रीराधा ठाकुरानी' कहनेसे महाभावकी सर्वोच्‍चावस्था 'मादन'को ही समझना चाहिये। श्रीराधा महाभावकी समुद्र हैं। अन्य शक्तियों, महिषियों आदिमें भी महाभाव है, किन्तु उनमें वह आंशिक मात्रामें होता है। जैसे समुद्रके साथ ताल, कुँआ, सरोवर आदिकी तुलना नहीं है, वह अपनी उपमा स्वयं है, उसका जल अगाध अपार है; इसी प्रकार महाभाव-स्वरूपा श्रीराधा ठाकुरानी समस्त प्रकारके भावोंको क्रोड़ीभूत करती हुई महाभावके अपार अगाध भण्डार तथा वैशिष्ट्यके साथ विराजमान हैं। जितनी भी व्रजगोपियाँ हैं, उन सभीमें कला-कौशल, प्रेम-परिपाटी, सेवा-दक्षता आदि है तथा श्रीकृष्ण उनके साथ भी लीला-विलास करते हैं। किन्तु ये समस्त गुण श्रीराधामें चरम सीमामें हैं। इसलिये श्रील भक्तिविनोद ठाकुरने स्वकृत पदमें श्रीकृष्णके मनोभावको इस प्रकार व्यक्त किया है—'बले तुहुँ बिना काहार रास, तुहुँ लागि मोर बरज वास।' अर्थात् श्रीकृष्ण श्रीराधासे कह रहे हैं कि यह रसास्वादन तुम्हारे सङ्गके अतिरिक्त अन्यत्र कहीं नहीं है। रसास्वादनके लिये ही रासलीला है। 'रसानाम् समूह इति रासः।' श्रीकृष्ण कुञ्जोंमें, वन-उपवनमें अनेक प्रकारकी लीलाएँ करते हैं तथा उन विभिन्न रूपोंमें कुछ भावोंका आस्वादन करते हैं। किन्तु सामुदायिक रूपमें समस्त रसोंका आस्वादन केवलमात्र रासलीलामें ही है। रासलीलाकी नायिका-शिरोमणि श्रीराधा हैं, इसलिये श्रीकृष्णने श्रीराधाको आकर्षितकर उनके सङ्ग लीला-विनोद किया। उस रासलीलामें समस्त प्रकारके भाव श्रीराधामें समस्त रूपोंमें प्रकाशित हुए। श्रीकृष्णको वशीभूत करनेका मन्त्र महाभाव ही है। इसकी किञ्चित्मात्र गन्ध भी न रहनेसे श्रीकृष्ण वशीभूत नहीं होते और न ही अधीनता स्वीकार करते हैं। इसी कारण साधक महाभाव-स्वरूपा श्रीराधाका आश्रय ग्रहण करते हैं। उनका आश्रय ग्रहण किये बिना साधककी समस्त साधन-चेष्टा निष्फल रहती है, क्योंकि उसके द्वारा श्रीकृष्णको आकर्षित करनेका गुण नहीं प्राप्त होता। इसलिये गौड़ीय-वैष्णव श्रीराधाका प्राधान्य स्वीकार करते हैं। श्रीकृष्ण ऐसी लीलाएँ करते हैं जिनके द्वारा श्रीराधामें किलकिञ्चित आदि भावोंका प्रकाश होता है, जिन्हें देखकर श्रीकृष्ण चमत्कृत हो जाते हैं। अन्य सभी नायिकाओंके साथ श्रीकृष्णके लीला-विनोदसे उन नायिकाओंमें भी भाव प्रकाशित होते हैं, किन्तु वे सीमित होते हैं। श्रीराधामें समस्त भाव असीमित रूपमें प्रकाशित होते हैं। श्रीराधाके तीन स्वरूप हैं—श्रीकृष्णाङ्गमें 'शक्ति स्वरूप'में, 'आनन्दवर्धनकारी श्रीराधा' रूपमें और 'मन्त्र' रूपमें। इन तीन स्वरूपोंकी मूल 'आनन्दवर्धनकारी श्रीराधा' हैं। श्रीकृष्णकी अनन्त प्रेयसियाँ हैं, जिनमें तीन मुख्या हैं- वैकुण्ठकी लक्ष्मियाँ, द्वारकाकी महिषियाँ तथा व्रजगोपियाँ। इन तीनों प्रकारकी कान्ताओंका विस्तार श्रीराधासे होता है; वे ही सबकी मूल अंशिनी हैं। श्रीराधाका चित्त, इन्द्रियाँ और उनकी देह कृष्णप्रेमसे गठित हैं। ब्रह्मसंहिता (5/37)—'आनन्दचिन्मयरस- प्रतिभाविताभिः...' अर्थात् आनन्दचिन्मयरस ह्लादिनी तथा संवित्का सार है। इसी आनन्दचिन्मयरससे गठित व्रजगोपियाँ और उनमें भी आनन्द चिन्मयरसकी मूर्तिमान स्वरूप वृषभानुनन्दिनी श्रीराधा श्रीकृष्णकी कान्ता रूपमें । 293

[ 8/158–179 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ]

प्रसिद्ध हैं। श्रीकृष्ण ब्रह्म-स्वरूप हैं, श्रीराधा आनन्दचिन्मय हैं तथा गोपियाँ उनकी अंश, कलादि हैं। शत कोटि गोपियोंके द्वारा भी श्रीकृष्णकी कान्ता-प्रेमास्वादनकी वासना पूर्ण नहीं होती—इसके द्वारा ही श्रीराधाकी प्रेम-महिमाका अनुमान लगाया जा सकता है। श्रीराधा केवल आनन्दरस-स्वरूपा हैं तथा अखण्ड रसवल्लभा रसकी मूर्ति हैं; उनका तत्त्व रसयुक्त है। श्रीराधाका स्वरूप महाभावसे गठित है। यही महाभाव चिन्तामणिके समान है। चिन्तामणिके समान श्रीराधा श्रीकृष्णकी समस्त इच्छाओं, अकाङ्क्षाओंकी पूर्त्ति करती हैं। यद्यपि श्रीकृष्णके स्वरूपमें जगत्की सृष्टिकी कामनाएँ नहीं होतीं, क्योंकि 'मद्भक्तविनोदाय' अर्थात् अपने भक्तोंका विनोद करना ही उनका एकमात्र कार्य है, तथापि उन्होंने ऐसी कामना की—'स अकामयत'। इसलिये उन्होंने इस कामनाको अपने अंशके कला कारणाब्धिशायी विष्णुसे सम्पादित कराया। तब जगत्की सृष्टि करनेके लिये श्रीकृष्णशक्ति श्रीराधा महामाया बन गईं।"—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 158–164 ॥

श्रीकृष्ण-प्रणयकी मूर्त्तविग्रह श्रीराधिकाका वर्णन :— राधा-प्रति कृष्ण-स्नेह-सुगन्धि उद्वर्त्तन। ता'ते सुगन्धि देह-उज्ज्वल-वरण ॥ 165 ॥

अनुवाद—श्रीराधाके प्रति श्रीकृष्णका स्नेह ही श्रीराधाका सुगन्धित उबटन है। इस उबटनसे ही श्रीराधाकी देह सुगन्धित और उज्ज्वलवर्ण हो जाती है ॥ 165 ॥ अनुभाष्य—'सुगन्धि उद्वर्त्तन'—सुगन्धित उबटन, जिसके द्वारा अङ्गोंका मैल दूर होता है; इसलिये इस श्रीकृष्णस्नेहरूपी उबटनको मलनेके कारण उनकी देह सुगन्धित और उज्ज्वल वर्णकी है ॥ 165 ॥

श्रीराधाका तीन प्रकारकी धारामें स्नान, श्रीराधाके विग्रहका वर्णन :— कारुण्यामृत-धाराय स्नान प्रथम। तारुण्यामृत-धाराय स्नान मध्यम ॥ 166 ॥


लावण्यामृत-धाराय तदुपरि स्नान। निज-लज्जा-श्याम-पट्टसाटि-परिधान ॥ 167 ॥ कृष्ण अनुराग-द्वितीय अरुण-वसन। प्रणय-मान-कञ्चुलिकाय वक्ष-आच्छादन ॥ 168 ॥ सौन्दर्य-कुङ्कुम, सखी-प्रणय-चन्दन। स्मितकान्ति-कर्पूर, तिने-अङ्गे विलेपन ॥ 169 ॥ कृष्णेर-उज्ज्वल रस-मृगमद-भर। सेइ मृगमदे विचित्र कलेवर ॥ 170 ॥ प्रच्छन्न-मान-वाम्य-धम्मिल्ल-विन्यास। 'धीराधीरात्मक' गुण-अङ्गे पट्टवास ॥ 171 ॥ राग-ताम्बूलरागे अधर उज्ज्वल। प्रेमकौटिल्य-नेत्रयुगले कज्ज्वल ॥ 172 ॥ 'सुदीप्त-सात्त्विक' भाव, हर्षादि 'सञ्चारी'। एइ सब भाव-भूषण सब अङ्गे भरि' ॥ 173 ॥ 'किलकिञ्चितादि'-भाव-विंशति-भूषित। गुणश्रेणी-पुष्पमाला सर्वाङ्गे पूरित ॥ 174 ॥ सौभाग्य-तिलक चारु-ललाटे उज्ज्वल। प्रेम-वैचित्त्य-रत्न, हृदय-तरल ॥ 175 ॥ मध्य-वयस, सखी-स्कन्धे कर-न्यास। कृष्णलीला-मनोवृत्ति-सखी आशपाश ॥ 176 ॥ निजाङ्ग-सौरभालये गर्व-पर्यङ्क। ता'ते बसिं' आछे, सदा चिन्ते कृष्णसङ्ग ॥ 177 ॥ कृष्ण-नाम-गुण-यश-अवतंस काणे। कृष्ण-नाम-गुण-यश-प्रवाह-वचने ॥ 178 ॥ कृष्णके कराय श्यामरस-मधु पान। निरन्तर पूर्ण करे कृष्णेर सर्वकाम ॥ 179 ॥

अनुवाद—श्रीराधा अपना प्रथम स्नान करुणाकी अमृतमयी धारामें करती हैं, मध्याह्नकालीन द्वितीय स्नान वे अभिनव तारुण्य-अमृत-तरङ्गिणीमें करती हैं और

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अपना तृतीय सन्ध्याका स्नान लावण्यरूपी अमृतकी धारामें करती हैं। वे अपनी लज्जारूप श्यामवर्णकी रेशमी साड़ी धारण करती हैं। श्रीकृष्णके प्रति अपने अनुरागरूप लाल रङ्गके उत्तरीय वस्त्रको धारण करती हैं। प्रणय और मान नामकी कञ्चुलिकाके द्वारा अपने श्रीवक्षःस्थलको आच्छादित करती हैं। उनके कायिक गुणोंका सौन्दर्य ही 'कुङ्कुम' है, सखियोंके प्रति उनका प्रणय ही 'चन्दन' है तथा उनकी मृदु मुस्कानकी कान्ति ही 'कर्पूर' है-इस प्रकार इन तीन वस्तुओं 'कुङ्कुम', 'चन्दन' और 'कर्पूर' से वे अपने श्रीअङ्गोंका लेपन करती हैं। श्रीकृष्णके शृङ्गाररसरूप मृगमदसे वे अपने समस्त चिन्मय अङ्गोंका शृङ्गार करती हैं। प्रच्छन्न-मान और वाम्यभावको श्रीराधाजी सुन्दर केशपाशके रूपमें ग्रथित करती हैं। धीराधीरात्मक गुणोंको अपने अङ्गोंमें वे वस्त्रके रूपमें धारण करती हैं। श्रीकृष्णके प्रति अनुरागरूपी ताम्बूलके लालवर्णसे श्रीराधाके अधर उज्ज्वल हैं। प्रेमकी कुटिलताको वे अपने नेत्रोंमें काजलके रूपमें धारण करती हैं। सुदीप्त सात्त्विकभाव तथा हर्षादि सञ्चारीभाव रूपी आभूषणोंसे वे अपने श्रीअङ्गोंको सुशोभित करती हैं। किलकिञ्चितादि बीस प्रकारके भावरूपी आभरणोंसे वे विभूषित हैं और माधुर्यादि गुणोंकी पुष्पमालाको उन्होंने समस्त अङ्गोंमें धारण कर रखा है। सौभाग्यरूपी मनोहर तिलक श्रीराधाके सुन्दर ललाटपर उज्ज्वलरूपमें दमक रहा है और प्रेम-वैचित्त्य आदि रत्न उनके हृदय-हारकी मध्य मणि बनकर स्निग्ध रूपसे शोभायमान हो रहे हैं। श्रीराधाकी मनोवृत्तियाँ ही उनकी निकट रहनेवाली सखियाँ हैं जो सदा श्रीकृष्ण-लीलामें ही आविष्ट रहती हैं। उन्होंने अपने करकमलको नित्य कैशार-अवस्थारूपी सखीके कन्धेपर अर्पण कर रखा है। अपने अङ्ग-सौरभरूप भवनमें गर्वरूपी पलङ्गपर आसीन होकर वे सदा श्रीकृष्ण-अङ्ग-सङ्गका चिन्तन करती हैं। श्रीकृष्णनाम, श्रीकृष्णगुण और श्रीकृष्णयश रूप अलङ्कार श्रीराधाके कर्णभूषण हैं और श्रीकृष्णका नाम-गुण-यश ही निरन्तर उनके मुखसे प्रवाहित होता रहता है। श्यामरस (शृङ्गार-रस) रूप मधुका श्रीकृष्णको पान कराकर वे निरन्तर श्रीकृष्णकी समस्त कामनाओंको पूर्णरूपसे सम्पन्न करती हैं॥ 166-179 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीराधिकाके गुणोंका वर्णन करनेके लिये कविराज गोस्वामीने श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके द्वारा रचित 'प्रेमाम्भोज-मकरन्द' नामक स्तवको आधार बनाया है- “महाभावोज्ज्वलच्चिन्तारत्नोद्भावितविग्रहाम्। सखीप्रणयसद्गन्धवरोद्वर्त्तन-सुप्रभाम्॥ 1 ॥ कारुण्यामृतवीचिभिस्तारुण्यामृतधारया। लावण्यामृतवन्याभिः स्नपितां ग्लपितेन्दिराम् ॥ 2 ॥ ह्रीपट्टवस्त्रगुप्ताङ्गीं सौन्दर्यघृसृणाश्रिताम्। श्याममोज्ज्वलकस्तूरीविचित्रितकलेवराम् ॥ 3 ॥ कम्पाश्रुपुलकस्तम्भस्वेदगद्गदरक्तता। उन्मादो जाड्यमित्येतै रत्नैनैर्वाभिरुत्तमैः॥ 4 ॥ क्लिप्तालङ्कृतिसंश्लिष्टां गुणालीपुष्पमालिनीम्। धीराधीरात्व-सद्वास-पटवासैः परिष्कृताम् ॥ 5 ॥ प्रच्छन्नमानधम्मिल्लां सौभाग्यतिलकोज्ज्वलाम्। कृष्णनामयशःश्रावावतंसोल्लासिकर्णिकाम् ॥ 6 ॥ रागताम्बूलरक्तोष्ठीं प्रेमकौटिल्य-कज्ज्वलाम्। नर्मभाषितनिःस्यन्दस्मित-कर्पूरवासिताम्॥ 7 ॥ सौरभान्तःपुरे गर्वपर्यङ्कोपरि लीलया। निविष्टां प्रेम-वैचित्त्य-विचलत्तरलाश्रिताम् ॥ 8 ॥ प्रणयक्रोधसच्छोलीबन्धुगुप्तीकृतस्तनाम्। सपत्नीवक्त्रहृच्छोषि-यशःश्री-कच्छपी-वराम्॥ 9 ॥ मध्यातात्मसखीस्कन्धलीलान्यस्तकराम्बुजाम्। श्यामां श्यामस्मरामोदमधूली-परिवेशिकाम्॥ 10 ॥ त्वां नत्वा याचते धृत्वा तृणं दन्तैरयं जनः। स्वदास्यामृतसेकेन जीवयामुं सुदुःखितम् ॥ 11 ॥ न मुञ्चेच्चरणायतातमापि दुष्टं दयामयः। अतो गान्धर्विके हा हा मुञ्चैनं नैव तादृशम् ॥ 12 ॥ प्रेमाम्भोजमकरन्दाख्यं स्तवराजमिमं जनः। श्रीराधिकाकृपाहेतुं पठंस्तद्दास्यमाप्नुयात् ॥ 13 ॥ (1) महाभावरूप उज्ज्वलचिन्तामणिके द्वारा भावित जिनका विग्रह है, श्रीकृष्णके प्रति सखीका जो प्रणय हैं, उसी सुगन्धित कुङ्कुम आदिके द्वारा जिनकी

[ 8/165-179 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

अङ्गकान्ति उज्ज्वल हुई है। (2) पूर्वाह्नमें कारुण्यामृतमें, मध्याह्नमें तारुण्यामृतमें और संध्यामें लावण्यामृतमें स्नान किया गया जिनका विग्रह इन्दिरा तकको लज्जित करता है। (3) लज्जारूपी रेशमीवस्त्रका परिधान, सौन्दर्यरूपी कुङ्कुमसे शोभित और श्यामवर्ण उज्ज्वल या शृङ्गाररसरूप कस्तूरीके द्वारा जिनका चित्रित कलेवर है। (4) कम्प, अश्रु, पुलक, स्तम्भ, स्वेद, गद्गद स्वर, रक्तता, उन्माद और जड़तारूपी नौ उत्तम रत्नोंसे जो अलङ्कृत हैं। (5) सौन्दर्य-माधुर्यादि सभी गुण पुष्पमालारूपमें जिनके शरीरपर विराजमान हैं; धीर और अधीरा भावको उन्होंने पट्टवास अर्थात् कर्पूरादिके द्वारा निर्मल किया है। (6) प्रच्छन्नरूपसे मान ही जिनका धम्मिल अर्थात् जूड़ा है, सौभाग्यरूपी तिलकके द्वारा जिनका मस्तक उज्ज्वल है; श्रीकृष्णके नाम और यशका श्रवण ही जिनके कानोंके आभूषण हैं। (7) अनुरागरूपी ताम्बूलके द्वारा जिनके ओंठ लालीसे रञ्जित हैं; प्रेम-कौटिल्यको ही जिन्होंने नेत्रोंके काजलके रूपमें धारण किया है; नर्म अर्थात् उपहासके कारण मृदुहास्यरूपी-कर्पूरके द्वारा जो सुगन्धित हैं। (8) अपने अङ्गसौरभरूप-अन्तःपुरमें गर्वरूपी पलङ्गके ऊपर शयन करनेपर उनका विप्रलम्भरूपी हार प्रेमवैचित्यरूपी तरल (हारके बीचकी मणि)के रूपमें इधर-उधर झूलता है। (9) प्रणयक्रोधरूपी कञ्चुलीके द्वारा जिनके स्तनयुगल आवृत हैं; सपत्नियोंके (सौतनके) मुख और हृदयका शोषणकारी यशःश्री (यश और सौन्दर्य) ही जिनकी कच्छपी वीणा है। (10) जिन्होंने कैशोररूप-सखीके कन्धेपर लीलारूपी हस्तकमल रखा है; जो बहुत प्रकारके गुणोंसे युक्त होनेपर भी श्रीकृष्ण-कन्दर्पको आनन्दप्रदायक मधुका परिवेशन कर रही हैं।

(11) ऐसी श्रीराधासे दाँतमें तृण धारण करके मैं प्रार्थना कर रहा हूँ,-अपने दास्यरूप अमृतका दान करके इस अति दुःखितजनके प्राणोंकी रक्षा कीजिये। (12) हे गान्धर्विके ! दयामय श्रीकृष्ण जिस प्रकार शरणागत दुष्टजनोंका भी परित्याग नहीं करते, उसी प्रकार आप भी अपने आश्रित इस (दुष्ट) जनका त्याग मत करना। (13) श्रीराधारानीकी कृपाके हेतुस्वरूप इस प्रेमाम्भोजमकरन्द नामक स्तवराजका जो पाठ करता है, वह उनका दास्य प्राप्त करके धन्य हो जाता है। 'किलकिञ्चितादि भाव'-बीस प्रकारके हैं। ये बीस भाव- (1) 'अङ्ग'ज'-भाव, हाव, हेला; (2) 'आत्मज'-शोभा, कान्ति, दीप्ति, माधुर्य, प्रगल्भता, औदार्य और धैर्य; (3) 'स्वभावज'-किलकिञ्चित, लीला, विलास, विच्छित्ति, विभ्रम, मोट्टायित, कुट्टमित, विव्वोक, ललित और विकृत। 'गुणश्रेणी-पुष्पमाला'-श्रीमतीके गुण तीन प्रकारके हैं-मानसिक, वाचिक और शारीरिक। (1) 'मानसिक'-कृतज्ञता, क्षमा और कारुण्यादि; (2) 'वाचिक'-कानोंको आनन्ददायक वाक्य-प्रयोगादि; (3) 'कायिक'-गुण, आयु, रूप, लावण्य और सौन्दर्यादि। 'कृष्णलीला-मनोवृत्ति-सखी'-श्रीकृष्णलीलानन्दरूपा श्रीमतीकी आठ मनोवृत्तियाँ आठ सखियाँ हैं और उनकी अनुवृत्तियाँ अन्यान्य मञ्जरियाँ हैं। 'श्यामरस'-मधुर रस ॥ 165-179 ॥ अनुभाष्य-श्रीमती राधिकाका स्वरूप-वे श्रीकृष्णकी अभिलाषाओंको पूर्ण करनेवाली महाभाव चिन्तामणि हैं। ललितादि सखियाँ-उनके कायव्यूहके समान अथवा प्रकाशविन्यास हैं। (1) श्रीकृष्णस्नेहरूपी उबटन मलकर

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आठवाँ अध्याय 8/165-179 ] प्रथम अथवा पूर्वाह्नमें किये जानेवाले स्नानका जल ही कारुण्यामृत है अर्थात् पौगण्डको पार करके प्रथम कैशोरमें करुणाविशिष्ट नवयौवन है; (2) मध्यम अथवा मध्याह्नमें किये जानेवाले स्नानका जल ही तारुण्यामृत अथवा व्यक्त-यौवन है; (3) उससे श्रेष्ठ स्नान अथवा अपराह्नमें किये जानेवाले स्नानका जल लावण्यामृत अथवा पूर्णयौवन है; अर्थात् कायिक गुणोंकी जो आयु, रूप और लावण्य है, वही तीन प्रकारका स्नान-जल है। वस्त्र दो प्रकारके है- (1) अधोवसन (कमरसे नीचे पहननेवाले वस्त्र) और (2) उत्तरीय (कमरसे ऊपर पहननेवाले वस्त्र)। (1) अधोवसन-लज्जारूपा, वह श्याम रेशमी धागेसे बनी नीली-साड़ी है; (2) उत्तरीय-दूसरा वस्त्र अरुणवर्ण (लाल रङ्गका) है-वही श्रीकृष्णानुराग है। श्रीकृष्णप्रणयमानरूपी चोलीके द्वारा श्रीराधिकाका वक्षःस्थल ढका हुआ है। श्रीराधाके कायिक गुणोंका सौन्दर्य ही कुङ्कुम है और रमणीयता ही सखी-प्रणयरूपी चन्दन है तथा माधुर्य ही स्मितकान्तिरूपी कर्पूर है; ये तीन वस्तुएँ अङ्गोंके लेपन हैं अर्थात् उनके अङ्ग-सौन्दर्य, रमणीयता और माधुर्यसे भूषित हैं। श्रीकृष्णका उज्ज्वल रस ही मृगमद-कस्तूरी है, ये ही कोमलतारूपी कायिक गुण हैं। ‘प्रच्छन्नमान'–हृदयमें वक्रता होनेपर भी बाहरसे दक्षिण-भावका प्रदर्शन। ‘वाम्य'–सरलताके अभावसे वक्रता, मध्यलीला 14/161 संख्याका अनुभाष्य देखें। ‘धम्मिल्ल'–जूड़ा। ‘धीराधीरात्मक गुण'–उज्ज्वलनीलमणिमें— “धीराधीरा तु वक्रोक्त्या सवाष्पं वदति प्रियम्। धीराधीरगुणोपेता धीराधीरेति कथ्यते॥” जो नायिका प्रियतमको धीराके धर्म अर्थात् वक्रोक्तिके द्वारा और अधीराके धर्म अर्थात् नेत्रोंमें अश्रु भरकर कुछ वचन कहती है, वह ‘धीराधीरा' है। मध्यलीला 14/143-153 संख्या देखें। ‘धीराधीरा-मध्या'के जो गुण हैं, ‘धीराधीरा-प्रगल्भा'के भी वही सब गुण होते हैं। ‘प्रगल्भा', ‘मध्या' और ‘मुग्धा',–इन तीनोंमें ‘प्रगल्भा' अत्यन्त क्रोधित होकर डाँटने-फटकारनेवाली है; ‘मध्या' कुछ कम क्रोधित होकर कठोर बात कहनेवाली है एवं ‘मुग्धा' थोड़ासा क्रोध करके रोने लगती है। खण्डित- अवस्थामें इन गुणोंका विशेष प्रकाश होता है। ‘पट्टवास'–पगड़ी; रेशमका उत्तरीय वस्त्र एकपाटा। पाठान्तरमें ‘पटवास'–वस्त्रसमूह, गन्धचूर्ण, पिसे हुए चावलसे बनी पेस्ट, साटिन (एक प्रकारका वस्त्र)। श्रीकृष्णराग ही ताम्बूलका वर्ण है, उसके द्वारा अधर उज्ज्वल होते हैं; प्रेम-कुटिलता ही दोनों नेत्रोंका काजल है। ‘सुद्दीप्त सात्त्विकभाव'–मध्यलीला 6/12 संख्या; ‘हर्षादि तैंतीस सञ्चारीभाव'–मध्यलीला 3/127 संख्या एवं मध्यलीला 14/167-168 संख्याका अमृतप्रवाह भाष्य देखें। ‘किलकिञ्चित् आदि भाव'–मध्यलीला 14/168 संख्या देखें। ‘गुणश्रेणी-पुष्पमाला'–मध्यलीला 23/82-86 संख्या देखें। उज्ज्वलनीलमणिमें लिखे श्रीराधाके पच्चीस गुण— “बहुना किं गुणास्तस्याः संख्यातीता हरेरिव। इत्यङ्गोक्तिमनस्थास्ते परसम्बन्धगास्तथा। गुणा वृन्दावनैश्वर्या इहा प्रोक्ताश्चतुर्विधाः॥” और अधिक क्या कहें, श्रीहरिके समान श्रीराधिकामें भी असंख्य गुणसमूह नित्य वर्तमान है। उनके गुण चार भागोंमें विभक्त हैं— (क) अङ्गस्थ (अङ्गोंमें स्थित गुण) (ख) उक्तिस्थ (वचनोंमें स्थित गुण) (ग) मनस्थ (मनमें स्थित गुण) और (घ) परसम्बन्धग (दूसरोंसे सम्बन्धित गुण)। (क) अङ्गस्थ गुण छह हैं— (1) मधुरा अथवा चारु, अर्थात् वे देखनेमें परम सुन्दरी हैं, । 297

[ 8/165-179 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (2) नववयसा अथवा किशोरी, (3) चपलाङ्गा, अर्थात् चञ्चल कटाक्षवाली हैं, (4) उज्ज्वलस्मिता, अर्थात् उज्ज्वल मृदुमधुर हास्यकारिणी हैं, (5) सुन्दर सौभाग्यको सूचित करनेवाली रेखाओंसे युक्त अथवा पादादि स्थित चन्द्ररेखा, और (6) गन्धोन्मादितमाधवा, अर्थात् अपनी अङ्गगन्धसे श्रीकृष्णको भी उन्मत्त करनेवाली हैं। (ख) उक्तिस्थ गुण तीन हैं— (1) सङ्गीतप्रसराभिज्ञा, अर्थात् सङ्गीतविद्यामें पारदर्शी, (2) रम्यवाक्, अर्थात् मृदुभाषा बोलनेवाली, और (3) नर्मपण्डिता, अर्थात् परिहास करनेमें पटु। (ग) मनस्थ गुण दस हैं— (1) विनिता, (2) करुणापूर्णा, अर्थात् दयालु, (3) विदग्धा, अर्थात् रसविषयमें अत्यन्त चतुर हैं, (4) पाटवान्विता, अर्थात् रसविषयमें अत्यन्त चतुरा हैं, (5) लज्जाशीला अथवा आभिजात्य और शीलता आदिका कारण, (6) मर्यादा अथवा साधुमार्गसे अविचलित रहनेवाली, (7) धैर्यशालिनी अथवा दुःख सहनेमें समर्थ, (8) गाम्भीर्यशालिनी, (9) सुविलासा, अर्थात् सुविलासप्रिया हैं, और (10) महाभाव-परमोत्कर्ष-तर्षिणी अर्थात् महाभावके परमोत्कर्षको प्रकट करनेमें परम व्यग्र रहती हैं। (घ) परसम्बन्ध गुण छह हैं— (1) गोकुलप्रेमवसति, अर्थात् उनको देखते ही गोकुलवासियोंके हृदयमें प्रेम उमड़ पड़ता है, (2) जगत्-श्रेणी लसद्यशा, अर्थात् अखिल ब्रह्माण्डमें उनकी कीर्ति व्याप्त है, (3) गुर्वर्पित-गुरुस्नेहा, अर्थात् गुरुजनोंके स्नेहकी पात्री हैं, (4) सखी-प्रणयितावशा, अर्थात् सखियोंके प्रणयके अधीन रहती हैं, (5) कृष्णप्रियावलीमुख्या, अर्थात् श्रीकृष्णकी समस्त सखियोंमें प्रधाना हैं, और (6) सन्तताश्रवकेशवा, अर्थात् केशव सदा उनकी आज्ञाके अधीन रहते हैं। प्रेमवैचित्त्य'— “प्रियस्य सन्निकर्षेऽपि प्रेमोत्कर्ष-स्वभावतः। या विश्लेषधियार्त्तिस्तत् प्रेमवैचित्त्यमुच्यते॥” अत्यधिक प्रेमके स्वभावके कारण प्रियके निकट होनेपर भी उनसे वियोग होनेके भयसे जिस क्लेशकी (आर्त्तिकी) उत्पत्ति होती है, वही 'प्रेमवैचित्त्य' है; वही रत्न है। 'तरल'–हारके बीच स्थित मणि, धुकधुकी। मध्यवयस किशोरीभाव ही सखीके कन्धेपर हाथ रखना है और निकटमें स्थित सखियाँ–श्रीकृष्णलीलाकी मनोवृत्तिरूपा हैं। 'निजाङ्ग-सौरभालये'–अपने अङ्गरूपी सौरभके भवनमें। 'गर्व-पर्यङ्क'–गर्वरूपी पलङ्ग अथवा खाटपर। 'अवतंस'–कानके विशेष अलङ्कार; श्रीकृष्ण नाम-गुण-यश ही उनके कानोंके अलङ्कार हैं। श्रीकृष्णनाम-गुण-यशकी वाक्यावलीका स्त्रोत (प्रवाह) ही श्यामरस-मधु-धारा है; श्रीमती राधिका वही श्रीकृष्णको पान कराती हैं। श्रीराधा ही श्रीकृष्णका प्रणय विकार अर्थात् श्रीकृष्णप्रेमकी मूर्त्तिविग्रह अर्थात् उनके मानसिक भाव, कायिक अङ्ग-प्रत्यङ्ग, वेषादि, समस्त ही श्रीकृष्णप्रेमकी एक-एक शोभा अथवा भूषण हैं–उसको विश्लेषण करके यहाँ दिखला रहे हैं॥165-179॥ अमृतानुकणिका–“'कारुण्यामृत-धाराय स्नान प्रथम'। बाल्यकालमें चपलता रहती है। धीरे-धीरे पौगण्ड भाव 298 ।

आठवाँ अध्याय 8/166-174 ] आनेपर श्रीराधाके अङ्ग थोड़े-से स्थूल होने लगे और सुन्दरता आदि वर्धित होने लगी। उसके बाद वय-सन्धि अर्थात् प्रथम कैशोरमें शरीरकी जो चञ्चलता थी, वह आँखों में आ गयी। वय-सन्धिमें पहले यह पूर्वराग होता है। भागवतमें मिलनेके पूर्व पूर्वरागका वर्णन है। पूर्व-रागमें श्रीकृष्णके दर्शनके लिये उनमें अत्यन्त व्याकुलता, आतुरता, उत्कण्ठा जाग्रत होती है जिसके द्वारा उनमें करुणा आ जाती है। इस करुणाके लिये ही कहा है कि वे करुणाकी धारामें पहली बार स्नान करती हैं। श्रीकृष्णके प्रति श्रीराधाका स्नेह, अनुराग, उत्कण्ठा, लालसा आदि जिसमें किञ्चित् रूपसे प्रेम प्रकाशित हो जाता है, यही उनका प्रथम स्नान है। 'तारुण्यामृत धाराय स्नान मध्यम', इसका प्रकाश मध्य कैशोर अवस्थामें होता है। इसमें अङ्गोंमें सुकुमारता, सौन्दर्य, माधुर्य आदिका विकास होता है। नवयौवन रूप तारुण्यधारामें युगल मिलन होता है। कुञ्जोंमें केलि-महोत्सव, रासलीला आदिका आरम्भ इसीमें होता है। 'लावण्यामृत धाराय तदुपरि स्नान'-मुक्ताओँके भीतरसे जिस प्रकार स्वाभाविक रूपसे निर्मल-कान्ति बाहरमें प्रकाशित होती है, उसी प्रकार अङ्ग-प्रत्यङ्गोंसे अतिस्वच्छतापूर्वक स्वाभाविक प्रतिक्षण उदीयमान कान्तिकदम्बको लावण्य कहते हैं। श्रीकृष्णके द्वारा प्राप्त लावण्यमें स्नान करनेसे श्रीराधाके समस्त अङ्ग अत्यन्त लावण्यमय हो जाते हैं। उस समय श्रीकृष्ण उन्हें देखकर अत्यन्त मुग्ध हो जाते हैं। यह शेष कैशोर और पूर्ण यौवनकी दशामें प्रकाशित होता है। इसी अवस्थामें श्रीकृष्ण श्रीराधाके प्रेमका आस्वादनकर आनन्दित होते हैं। एक समय कृष्ण मिलन हेतु उपस्थित हुए। वहाँ उन्होंने देखा कि सम्पूर्ण वन पीत-आभासे सुशोभित है; समस्त तरुलता सुवर्ण रङ्गके हैं। वे अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर सोचने लगे कि 'यह क्या है? किसकी आभासे ये सम्पूर्ण वन सुवर्ण आभाका हो गया! मैं विश्वको आनन्दित करता हूँ। किन्तु मुझे आनन्द प्रदान करनेवाली यह कौन है?' तब उन्होंने अत्यन्त आनन्दित होकर जाना कि यह सब श्रीराधाकी अङ्गकान्तिका प्रभाव है। श्रीराधाकी आयु, रूप और लावण्य ही उनका तीन प्रकारका स्नानजल है। प्रत्येक अवस्थामें वे परमसुन्दरी नवनवायमान सौन्दर्यको धारण करती हुई विराजमान होती हैं। स्नानके पश्चात् वस्त्र धारण किये जाते हैं। परिधान दो प्रकारके होते हैं—अधोवस्त्र और उत्तरीय। अधोवस्त्र लज्जा निवारण करनेवाली श्यामवर्णकी रेशमी साड़ी है तथा उत्तरीय वस्त्र श्रीकृष्ण-अनुरागरूपी लालवर्णका है। श्रीराधा प्रणय-मान कञ्चुलिकाके द्वारा अपने वक्षस्थलका आच्छादन करती हैं। 'प्रणय' अर्थात् प्रगाढ़ विश्वास। इस अवस्थामें प्रियतम प्रेयसीके वशीभूत हो जाता है, अर्थात् नायिका स्वाधीनभर्तृका होकर अपनी सेवाके लिये भी आदेश देती है, जैसे—मेरी वेणी गूँथ दो, पाँवमें अलता लगा दो आदि। 'मान'—यह अत्यन्त उत्कृष्ट रूपमें श्रीराधाकृष्ण युगलको नित्य नव-नव माधुर्यका अनुभव करवाता है। कभी मान किसी हेतुसे होता है और कभी अहैतुक। एक समय श्रीराधा श्रीकृष्णके साथ वनमें विहार कर रही थीं। उस समय श्रीकृष्णके सङ्गसे उनका चित्त अत्यन्त द्रवीभूत हो रहा था। इस कारण श्रीराधाकी आँखोंसे अश्रुओँकी धाराबहने लगी। उस स्थानसे कुछ दूर गायें चर रही थीं और उनके खुरोंसे धूलि उड़ रही थी। श्रीराधा अवहित्थाके द्वारा अपने भावोंको छिपाकर कहने लगीं कि गायोंके खुरोंसे उठी धूलिके मेरे नेत्रोंमें प्रवेश करनेसे अश्रुधारा निकल रही है। श्रीकृष्णने कहा-'मैं अभी फूँककर तुम्हारे नेत्रोंको शीतल कर देता हूँ।' ऐसा कहकर श्रीकृष्ण मुखसे उनके नेत्रोंमें फूँकने लगे। श्रीराधा कहने लगीं—'आप रहने दीजिये! आपके कपट प्रेमके द्वारा मुझे क्या लाभ होगा? व्यर्थ ही कपटतापूर्ण आदरकी कोई आवश्यकता नहीं है।' ऐसा कहकर उन्होंने भृकुटी तान ली। अर्थात् मानवती हो गईं। इसमें कोई कारण नहीं है, यह अहैतुकी मान है। कुछ समय बाद अपने । 299

[ 8/166-180 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला आप दूर हो जाता है। सहेतुक मान कारण दूर होनेपर ही दूर होता है। 'सौन्दर्य-कुङ्कुम, सखी-प्रणय-चन्दन'-श्रीराधाका अपना सौन्दर्य ही कुङ्कुम है, सखियोंका उनके प्रति प्रणय चन्दन है, स्मितकान्ति कर्पूर है-इन तीनोंका मिश्रण उनके अङ्गोंका लेप है। सखियोंके प्रणयका अर्थ श्रीराधाका श्रीकृष्णके प्रति अनुरागको वर्धन करना है। जिस प्रकार हवाकी तरङ्गें आकर समुद्रको उद्वेलित करती हैं, उसी प्रकार श्रीराधाके महाभाव-समुद्रको सखियाँ श्रीकृष्ण-विषयक प्रसङ्गोंके द्वारा उनके प्रेम, स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, भाव, महाभाव तकको तरङ्गायित करती हैं। 'कृष्णेर-उज्ज्वल-रस-मृगमद- भर'-श्रीराधाके हृदयमें श्रीकृष्णके प्रति उन्नत-उज्जवलरस मृगमद कस्तूरी है, जो श्रीकृष्णको मदान्ध कर देता है। यही श्रीराधाका विचित्र कलेवर है। 'प्रछन्न-मान-वाम्य- धम्मिल-विन्यास'-श्रीराधा अपने कुटिल कुन्तल, घुँघराले केशोंको जूड़ेके रूपमें ऐसे बाँध देती हैं मानो श्रीकृष्णके मतवाले हाथीरूपी मनको उसमें बाँध दिया हो। "धीराधीरात्मक' गुण-अङ्गे पट्टवास'-श्रीराधा अपने धीराधीरात्मक गुणको रेशमी उत्तरीयके समान धारण करती हैं। श्रीराधा अपने धीराधीरात्मक गुणके द्वारा श्रीकृष्णको वशीभूत कर लेती हैं। रासलीलामें जब श्रीकृष्ण मन्मथ-मन्मथ रूपमें पुनः प्रकट हो गये, तब विभिन्न प्रकारकी गोपियोंने विभिन्न प्रकारसे उनका स्वागत किया, परन्तु श्रीराधा निकट न आकर दूरसे ही कुटिल-वक्र दृष्टिसे श्रीकृष्णको देखने लगीं। यह वक्र-दृष्टि वाम्य भाव है तथा यह अधीरा-नायिकाका गुण है। वे साथ ही नयनोंके द्वारा श्रीकृष्णके नवनवायमान मुखकमलके अमृतका पान भी कर रही थीं। यह धीरा नायिकाका गुण है। वे अपने इन्हीं गुणोंके द्वारा श्रीकृष्णको वशीभूतकर रसपान करवाती हैं। 'राग-ताम्बूलरागे अधर उज्ज्वल'-श्रीकृष्णके प्रति श्रीराधाका राग उनका ताम्बूल है। प्रेमकी एक विशेष अवस्था, जब प्रणयकी उत्कर्षताके कारण अत्यन्त दुःख भी अत्यन्त सुखके रूपमें अनुभूत होता है, उसे राग कहते हैं। श्रीराधा मध्याह्नकालमें सूर्यकी प्रखर किरणोंसे तप्त नुकीली शिलाओंपर खड़ी हुई श्रीकृष्णदर्शनके आनन्द-सिन्धुमें मग्न होकर सुध-बुध सम्पूर्णतः भूल गयी थीं और उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वे सुकोमल कमलदल शय्या पर खड़ी हैं। प्रेम्रकौटिल्य-नेत्रयुगले कज्ज्वल'-श्रीकृष्णके प्रति कुटिल भाव ही श्रीराधाका काजल है। रासलीलामें अन्तर्धानके पश्चात् पुनः आविर्भूत श्रीकृष्णको देखकर श्रीराधा प्रणयकोपके आवेशसे विवश होकर भृकुटि चढ़ाकर कटाक्षपात करते हुए अपने अधर दंशन करने लगीं। यहाँ भृकुटि धारण, कटाक्ष निक्षेप और अधर-दंशन- इन तीनोंके द्वारा कौटिल्यकी अभिव्यक्ति हुई है। "सुदीप्त-सात्त्विक' भाव, हर्षादि 'सञ्चारी"-महाभाव स्वरूपा होनेके कारण श्रीराधामें सभी सात्त्विक भाव सुदीप्त रूपमें प्रकाशित होते हैं। श्रीकृष्ण दर्शन, स्पर्श, आलिङ्गनसे हर्षादि सञ्चारी भाव उदित होकर उनके अङ्गोंमें सुदीप्त रूपसे प्रकाशित होते हैं। किलकञ्चित आदि भाव ही उनके अङ्गोंके भूषण हैं। 'हर्षोत्पन्न गर्व, अभिलाष, रोदन, स्मित, असूया, भय और क्रोध-इन सबके एक ही समयमें उदित सम्मिश्रणको किलकञ्चित भाव कहते हैं।' श्रीराधामें इनका उदय दानघाटी-लीलामें देखा जाता है।"-श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी॥ 166-174 ॥ श्रीराधिका ही मूर्तिमान श्रीकृष्णप्रेम-सिन्धु :- कृष्णेर विशुद्धप्रेम-रत्नेर आकर। अनुपम-गुणगण-पूर्ण कलेवर ॥ 180 ॥ अनुवाद-श्रीराधा श्रीकृष्णके विशुद्धप्रेमरूप रत्नोंकी खान हैं। इन सब अनुपम गुणोंसे श्रीराधाजीका कलेवर (शरीर) सदैव सुसज्जित रहता है॥ 180 ॥ 300 ।

आठवाँ अध्याय 8/180-186 ] अनुभाष्य-श्रीमती राधिका ही श्रीकृष्णके निर्मल प्रेमरूपी रत्नोंकी खान अर्थात् श्रीकृष्णप्रेमसिन्धुकी मूर्तिविग्रह हैं एवं श्रीराधिकाकी देह-अतुलनीय गुणोंसे परिपूर्ण है। मध्यलीला 23/81-86 संख्या देखें॥180॥ याँर सौन्दर्यादि-गुण वाञ्छे लक्ष्मी-पार्वती। याँर पतिव्रता-धर्म वाञ्छे अरुन्धती॥183॥ याँर सद्गुण-गणने कृष्ण ना पाय पार। ताँर गुण गणिबे केमने जीव छार॥"184॥ श्रीराधिका ही श्रीकृष्णप्रेमकी मूल भण्डार :- श्रीगोविन्दलीलामृत (11/122)- का कृष्णस्य प्रणयजनिभूः श्रीमती राधिकैका कास्य प्रेयस्यनुपमगुणा राधिकैका न चान्या। जैह्मयं केशे दृशि तरलता निष्ठुरत्वं कुचेऽस्या वाञ्छापूर्त्त्यै प्रभवति हरे राधिकैका न चान्या॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥181॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णके प्रणयकी जन्मभूमि कौन हैं?-एकमात्र श्रीमती राधिका। श्रीकृष्णकी अनुपम गुणोंवाली प्रिया कौन हैं?-एकमात्र श्रीमती राधिका, अन्य कोई नहीं। केशोंमें कुटिलता (घुंघरालापन), नेत्रोंमें तरलता (चञ्चलता), दोनों कुचोंमें (स्तनोंमें) निष्ठुरता (कठोरता) आदि श्रीराधिकामें ही है। एकमात्र श्रीराधिका ही श्रीहरिकी वाञ्छा पूर्ण करनेमें समर्थ हैं, और कोई भी नहीं है॥181॥ अनुवाद-जिनके सौभाग्य-गुणोंकी सत्यभामा अभिलाषा करती हैं, जिनसे समस्त व्रजरमणियाँ कला-विलासकी शिक्षा लिया करती हैं, जिनके सौन्दर्य आदि गुणोंकी लक्ष्मीजी एवं पार्वतीजी वाञ्छा किया करती हैं, जिनके पातिव्रत्यधर्मकी सतीशिरोमणि अरुन्धतीजी भी कामना किया करती हैं, जिनके सद्गुणोंका गान करते-करते श्रीकृष्ण भी पार नहीं पाते, उन श्रीराधिकाके गुणोंकी गणना एक तुच्छ जीव किस प्रकार कर सकता है?"182-184॥ अनुभाष्य-आदिलीला 4/69, 75-79, 90-96, 122-124, 240-248, 255 संख्या देखें॥182-184॥ यहाँ तक श्रीराधाकृष्णतत्त्व; अब रस-प्रेम-तत्त्व वर्णनारम्भ :- प्रभु कहे,-"जानिलुँ कृष्ण-राधा-प्रेमतत्त्व। शुनिते चाहिये दुँहार विलास-महत्त्व॥"185॥ अनुभाष्य- (प्रश्नोत्तरक्रमेण श्रीराधिका-माहात्म्यं वर्णयति-) कृष्णस्य प्रणयजनिभूः (प्रणयस्य जन्मभूमिः) का?-एका राधिका। अस्य कृष्णस्य प्रेयसी (प्रेमपात्री) का?-अनुपमगुणा (अतुलनीयगुणसमन्विता) एका राधिका, न च अन्या। अस्याः (राधिकायाः एव) केशे जैह्मयं (कौटिल्यं), दृशि (नयने) तरलता (चञ्चलता), कुचे निष्ठुरत्वं (काठिन्यं) हरेः वाञ्छा-पूर्त्त्यै (वासनापूरणाय) प्रभवति (शक्नोति), न च अन्या (कापि तादृशी)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥181॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-"मैंने कृष्णतत्त्व, राधातत्त्व और उनके परस्परके प्रेमतत्त्वको तो जान लिया है, अब मैं राधा-कृष्णके विलासकी महिमाको श्रवण करना चाहता हूँ॥"185॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'विलास-महत्त्व'-दोनोंके प्रेमविलासकी महिमा॥185॥ व्रजके किशोर-किशोरीके चरित्रका वर्णन :- राय कहे,-"कृष्ण हय 'धीर-ललित'। निरन्तर कामक्रीड़ा-याँहार चरित॥186॥ श्रीराधिकाके श्रीकृष्णवशकारी विविध गुण :- याँर सौभाग्य-गुण वाञ्छे सत्यभामा। याँर ठाञि कलाविलास शिखे व्रजरामा॥182॥ अनुवाद-श्रीरामानन्द रायने कहा,-"श्रीकृष्ण 'धीरदलित' नायक हैं। निरन्तर काम-क्रीड़ा ही उनके चरित्रका वैशिष्ट्य है॥186॥ । 301

[ 8/187-192 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/230) :- विदग्धो नवतारुण्यः परिहास-विशारदः। निश्चिन्तो धीरललितः स्यात् प्रायः प्रेयसीवशः ॥ 187 ॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 187 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - जो पुरुष चतुर, नवतरुण, परिहास-पटु, निश्चिन्त और प्रेयसीके वशीभूत होता है, वह - 'धीर-ललित' है ॥ 187 ॥ अनुभाष्य- विदग्धः (रसिकः) नवतारुण्यः (नवयौवनयुक्तः) परिहास- विशारदः (रहस्यनिपुणः) निश्चिन्त (उद्वेगरहितः) धीरललितः (नायकः) प्रायः प्रेयसीवशः (प्रेयसीनां प्रेमतारतम्येन वशीभूतः) स्यात्। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 187 ॥ श्रीराधाके साथ नित्य विलासमें रत श्रीकृष्ण :- रात्रि-दिन कुञ्जे क्रीड़ा करे राधा-सङ्गे। कैशोर-वयस सफल कैल क्रीड़ा-रङ्गे ॥ 188 ॥ अनुवाद - श्रीकृष्ण रातमें और दिनमें भी श्रीराधाके साथ कुञ्जमें विभिन्न प्रकारकी क्रीड़ाएँ करते हैं और इस प्रकार उन्होंने क्रीड़ारङ्गमें अपनी कैशोरवस्थाको सफल किया है ॥ 188 ॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/231) :- वाचा सूचितशर्वरीरतिकला-प्रागल्भ्या राधिकां व्रीड़ाकुञ्चित-लोचनां विरचयन्नग्रे सखीनामसौ। तद्वक्षोरुहचित्रकेलिमकरीपाण्डित्यपारं गतः कैशोरं सफलीकरोति कलयन् कुञ्जे विहारं हरिः ॥ 189 ॥ अनुवाद - श्रीकृष्ण प्रगल्भ (वाक्चातुर्य) वाक्योंके साथ पूर्वरात्रिमें श्रीमती राधिकाके सङ्ग घटित रतिकलाका वृत्तान्त वर्णन करने लगे। उससे लज्जावशतः श्रीमती राधिकाके दोनों नेत्र नीचे हो गये। तब श्रीकृष्ण उनके स्तनयुगलपर चित्रकेलि-भ्रमरादि चित्रित करते हुए सखियोंके मध्य विशेष पाण्डित्यका प्रकाश करने लगे। इस प्रकारकी रसक्रीड़ाके द्वारा कुञ्जमें विहार करते हुए श्रीहरिने कैशोर-अवस्थाको सफल किया ॥ 189 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 4/117 संख्या देखें ॥ 189 ॥ नित्य चिन्मयसेवा-विलासकी सर्वोत्तम अवस्था ही 'प्रेमविलास-विवर्त्त', वह जड़ निर्विशेष केवलाद्वैत-सिद्धि नहीं :- प्रभु कहे,- "एहो हय, आगे कह आर।" राय कहे,-"इहा वइ बुद्धि-गति नाहि आर ॥ 190 ॥ येबा 'प्रेमाविलास-विवर्त्त' एक हय। ताहा शुनि' तोमार सुख हय, कि ना हय ॥" 191 ॥ एत बलि' आपन-कृत गीत एक गाहिल। प्रेमे प्रभु स्वहस्ते तौर मुख आच्छादिल ॥ 192 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 190-192 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे रामानन्द! तुमने जो 'साध्य' निर्णय किया है, राधा-कृष्णके (तत्त्वका) वर्णन किया है और दोनोंके विलासकी महिमाको कहा है, वही सत्य है। किन्तु इससे आगे और जो कुछ है, उसे बोलो। श्रीरायने कहा, - इसके आगे बुद्धि और आगे काम नहीं कर पा रही। तो भी 'प्रेमविलास-विवर्त्त' नामक एक भाव है, उसे सुना रहा हूँ, इसको सुनकर आपको सुख होगा या नहीं, मैं कह नहीं सकता। तात्पर्य यह है,- अब तक मैंने 'प्रेम-विलासके स्वरूप' का वर्णन किया था। प्रेमविलासतत्त्वमें दो प्रकारके भाव हैं अर्थात् सम्भोग (मिलन) और विप्रलम्भ (विरह)। विप्रलम्भके बिना सम्भोगकी स्फूर्ति नहीं होती। विच्छेद (वियोग) का नाम ही विप्रलम्भ है। वही प्रेमविलासका विवर्त्त है अर्थात् विरहके समयमें अधिरूढ़भाववशतः सम्भोगके अभावमें भी सम्भोगकी स्फूर्त्ति होती है। श्रीराय रामानन्दके द्वारा स्वरचित इस रसके एक सङ्गीतके गान करते ना करते महाप्रभुने अपने भावमें विह्वल होकर 302 ।

३. मध्य-लीला (उत्तरार्ध): रामानन्द राय संवाद, वृन्दावन यात्रा, रूप-सनातन शिक्षा

आठवाँ अध्याय 8/190–192 ]

उनके मुखको ढक दिया। गीत-विरहकालमें श्रीमतीजीकी उक्ति है, इसलिये विप्रलम्भदशामें सम्भोगकी स्फूर्ति हुई॥ 190–192 ॥

अनुभाष्य- “व्यतीत्य भावनावर्त्म यश्चमत्कार-भारभूः। हृदि सत्त्वोज्ज्वले बाढं स्वदते स रसो मतः॥”

विशुद्ध-सत्त्वसे उज्ज्वल चित्तमें ही 'रस'का आस्वादन होता है। वह बाह्य-जगत् या अन्तर्जगत्के स्थूल-सूक्ष्म-उपाधियुक्त देह और मनके आस्वादन योग्य कार्य नहीं है। गौण स्थूल-सूक्ष्म-जगत्में जो अस्मिताका आभास लक्षित होता है, उसे अनात्म 'बुद्धि' और 'मनः' कहा जाता है। रसमय विषय रससे परिपूर्ण इन्द्रियोंके द्वारा ही ग्रहण किया जा सकता है। रसपूर्ण-इन्द्रियाँ रसमय-दर्शन-स्पर्शनादिके द्वारा रसिकशेखर, रसस्रोत, विषयविग्रह श्रीनन्दनन्दनकी प्रेममय सेवा करती हैं। यह निर्विशेषवादियोंकी प्राकृत-जगत्से परे जड़रहित अवस्था मात्र नहीं है, इसलिये 'रस'की संज्ञामें भावनावथका विशेष रूपसे अतिक्रमण लिखा गया है। भौतिकवादी लोग जड़जगत्में इन्द्रियभोगसे जो अनुभूति प्राप्त करते हैं, वे केवल उसके विपरीत भावका चिन्तन कर सकते हैं, परन्तु इस प्रकारके विचारोंसे वे अप्राकृत रसको नहीं समझ सकते। देह और मनके धर्मोंसे जो चमत्कारिता उत्पन्न होती है, वह असम्पूर्ण, लघु और नश्वर है, इसलिये ही कहा गया है कि चिन्मय-रस चमत्कारके गुरुत्वको प्रकाशित करता है। प्रेमा-शुद्ध और चिन्मय वस्तु है। अचित् वस्तुओंमें प्रीति-नश्वर है। तुच्छ-धर्म काममें ही अवस्थित है। जड़जगत्में इन्द्रियसुखमें बाधा होनेसे जो दुःख आता है, वह जड़-प्रीतिका 'विवर्त्त' है। दूसरी ओर प्रेमविलास और विलास-विवर्त्त किसी भी प्रकारका अभाव, निकृष्टता और अमङ्गल उत्पन्न नहीं करते। अप्राकृत-रस-रसिक श्रीरायरामानन्दने स्व-रचित जिस गीतका कीर्तन किया है, वह श्रीगौरसुन्दरके द्वारा अनुमोदित है या नहीं, ऐसी लीलाका अभिनय करते हुए उन्होंने प्रेम-विलास-विवर्त्तका वर्णन किया।

भक्तदास बाउल-कृत 'विवर्त्तविलास' ग्रन्थ—श्रीजगदानन्दके 'प्रेमविवर्त्त' और श्रीरामानन्दके प्रेमविलास-विवर्त्तसे सम्पूर्ण विपरीत ग्रन्थ है। आजकलके शिक्षित-अभिमानी व्यक्ति प्रेमविलास-विवर्त्तके विपरीत बुद्धि रखते हुए जड़ीय 'विवर्त्तविलास'के विचारोंका अनुसरण करके 'प्राकृत विद्यामन्दिर' (सांसारिक शिक्षा संस्थानों) से प्राकृत विद्यासागरगणों (सांसारिक विद्वानों) से 'पी.एच.डी.' की उपाधि प्राप्त कर सकते हैं, किन्तु 'परविद्यामन्दिर' (अप्राकृत शिक्षा संस्थान) से 'पी.एच. डी.' की उपाधि प्राप्त करनेके लिये जड़ीय-अहङ्कारको छोड़कर अपने नित्य स्वरूपमें अवस्थित होना पड़ेगा। मनुष्योंके द्वारा रचित धर्मशास्त्र और अप्राकृत दर्शन-शास्त्रमें आकाश-पातालका भेद है। इस भेदको श्रीमन्मध्वाचार्यने परम आदरणीय विचारोंके द्वारा सुन्दर रूपसे दिखाया है। जड़-दार्शनिक लोग जड़ीय-धारणामें ही अवस्थित हैं, इसलिये वे प्रेम-विवर्त्तको अपनी मनघड़न्त अनुभूतिके द्वारा समझनेमें समर्थ नहीं होंगे। थालीके बीचमें जिस प्रकार हाथी नहीं बैठ सकता, उसी प्रकार आरोहवादी कितना भी प्रयास कर लें, उनमें सामर्थ्य नहीं होनेके कारण उनके लिये अप्राकृत अनुभूति असम्भव है।

श्रीरामानन्द रायकी उक्तिसे जिस 'प्रेम-वैचित्त्य'के अन्तर्गत 'मोहन-मादनादि अधिरूढ़ महाभावका विलास-वैचित्र्य और विलास-विवर्त्त कहा गया है, उसको समझनेमें प्राकृत-सहजिया असमर्थ हैं। प्राकृत सहजिया श्रीरामानन्दके गीतका निर्विशेषवादी अर्थ करनेमें लगे रहेंगे, किन्तु वह (निर्विशेषवाद) न तो श्रीरामानन्दके कहनेका और न ही श्रीगौरसुन्दरके श्रवणका विषय था। आजकलके जड़ीय दार्शनिक समाजमें भजनकी निगूढ़ चमत्कारिता और अपूर्वताका प्रचार अविधिपूर्वक है, ऐसा विचार करके ही श्रीगौरसुन्दरने अपने हाथसे श्रीरामानन्दके श्रीकृष्णगानमें रत मुखकमलको ढक दिया था। इसके द्वारा यह स्थापित हुआ है कि यह गीत

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[ 8/190-192 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

जड़-दार्शनिकोंके अनुभवकी वस्तु नहीं है। तो भी, पूर्वोक्त विचारका अवलम्बन करनेसे ही केवलाद्वैतवादके स्थानपर शुद्धाद्वैतवादियोंका मत स्थापित हो सकता है। शुद्धाद्वैतवादी कहते हैं, — द्वैतजगत्में जो निकृष्टता है, उसके विपरीत जिस काल्पनिक अद्वयज्ञानको निर्देश किया जाता है, उसमें प्रेम-विलासका अभाव है। जड़-विवर्त्तवादी “ना सो रमण, ना हाम रमणी” इस पद्यकी व्याख्या विपरीत रूपसे करनेपर विषय-आश्रय-राहित्यरूपी कैवलाद्वैत-सिद्धिको 'अद्वयज्ञान' कहते हैं। ऐसी व्याख्या उन्हें पुनः जड़ीय-विवर्त्तमें ही धकेल देती है। इस विषयमें शुद्धाद्वैतवादी कहते हैं, — “ना सो रमण, ना हाम रमणी”—इस वाक्यमें वास्तव सत्यको ध्वंस नहीं किया गया है, किन्तु वस्तुमें वस्तु-शक्तिके परिचयसे जो अशुद्धाद्वैत-आशङ्का प्रवर्त्तित हुई है, उसका खण्डन ही उद्दिष्ट हुआ है। विशिष्टाद्वैतवादियोंकी भाषामें यह बात इस प्रकार है, — वस्तुका परिचय दुर्ज्ञेय है, किन्तु शक्ति और शक्तिमान्‌को अभिन्न माननेसे शक्तिके परिचयसे ही वस्तुकी जानकारी प्राप्त होती है। जो वस्तुकी शक्तिको वस्तुसे अलग करके, 'रमण' और 'रमणी', — दो वस्तुओंकी कल्पना करते हैं, उनके विचारसे श्रीरामानन्दकी यह उक्ति केवल जड़ीय-शक्तिमान् और जड़ीय-शक्तिके भेदका खण्डन करनेवाली है।

जड़भोक्ता रमणके साथ जड़भोग्या रमणीका भेद है, ऐसा समझकर प्राकृत-सहजिया-सम्प्रदायके लोग अशुद्ध द्वैत विचारका आदर करते हैं। उससे बचनेके लिये चिन्त्यद्वैताद्वैत विचार प्रवर्तित हुआ है। इस विचारसे श्रीरामानन्दका अथवा श्रीगौरसुन्दरका अचिन्त्यभेदाभेद-विचार थोड़ा पृथक् है। शुद्धाद्वैत-विचार और अचिन्त्यभेदाभेद-विचारको इस स्थानपर एक ही तात्पर्यमय समझना चाहिये। शुद्धाद्वैतवादियोंके विचार, शुद्धद्वैतवादियोंके विचार, चिन्त्य-द्वैताद्वैतवादियोंके विचार, विशिष्टाद्वैतवादियोंके विचारसे अचिन्त्यभेदाभेद-विचार पृथक् है, इसीको अचिन्त्यभेदाभेद-आचार्य स्वयं अभिन्न व्रजेन्द्रनन्दन (श्रीचैतन्यदेव)ने अप्राकृत-साहजिक श्रीरामानन्द रायके श्रीमुखसे इस बातका प्रचार किया है। इन श्रीरामानन्दके विषयमें ही श्रीगौरसुन्दरने कहा है, — “सम्पूर्ण दक्षिण देश (भारत)में तुम्हारे समान अप्राकृत-सहज-धर्मावलम्बी मैंने नहीं देखा है; मैं एक पागल हूँ और तुम दूसरे पागल हो। इसलिये तुम और मैं एक समान हैं॥” यह बात कहकर श्रीगौरसुन्दरने अचिन्त्यभेदाभेद विचारका प्रदर्शन किया है, इसलिये श्रीजीवपादने अपनी 'सर्वसम्वादिनी'में गौड़ीयके वेदान्त दर्शनको ही 'अचिन्त्यभेदाभेद' कहकर स्वीकार किया है। अचिन्त्यभेदाभेद-विचारके विषयमें प्राकृत-साहजिक सम्प्रदाय जिस 'तेल लगायी हुई देहसे गंगा-स्नान'की कहानीका उदाहरण देते हैं, वह जड़जगत्का विवर्त्तमात्र है। इस उदाहरणके द्वारा भेदाभेदप्रकाश-तत्त्व नहीं जाना जा सकता।

शक्ति-शक्तिमान्-तत्त्वके अभेदके प्रतिपादनमें विषयका आश्रयके लिये उद्दीपन और आश्रयका विषयके लिये उद्दीपन-भाव सुन्दर रूपसे समझानेके लिये ही श्रीरामानन्दके गीतमें रमण-रमणीका परस्परके स्वरूप-ज्ञानका यथायथ भाव है। अहंग्रहोपासना-चिन्मात्रवादियोंकी मूढ़ता एवं चिद्-विलासका वैपरीत्य मात्र है। 'अद्वयज्ञानवस्तुमें आश्रयजातीय भावका अभाव है', जो ऐसा विचार रखते हैं, उनके लिये ही गोलोकमें स्थित औदार्यमय-प्रकोष्ठमें श्रीकृष्णकी नित्य गौरलीला प्रपञ्चमें अवतीर्ण (प्रकट) हुई है। प्रपञ्चमें अवतीर्ण गौरलीला कभी भी जड़सम्भोगवादी गौरनागरी वालोंकी भोगकी वस्तु नहीं है, इसीको बतानेके लिये ही यह प्रेम-विलास-विवर्त्तकी उदाहरण-लीला है। 'काञ्चना' आदि काल्पनिक दूतियोंकी अप्राकृत प्रेम विलासकी आवश्यकता नहीं है। प्राकृत-सहजिया-सम्प्रदायमें अपने-आपको शुद्ध भक्तोंके समान प्रकाशित करनेकी वासना है। इसलिये श्रीकृष्ण-भजन रसकी कथाको श्रीकृष्णकथाके अकालमय जगत्में प्रचार करनेकी इच्छा करनेपर वे नानामतवाद-विवर्त्तमें पतित हो सकते हैं, ऐसा जानकर यह सब व्याख्या शुद्धभक्तिमान् लोगोंके लिये ही संरक्षित हुई है॥ 190-192॥

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आठवाँ अध्याय 8/193 ] श्रीराय रामानन्दका स्वकृत गान :- गीत “पहिलेहि राग नयनभङ्गे भेल। अनुदिन बाढ़ल, अवधि ना गेल॥ ना सो रमण, ना हाम रमणी। दुँहु-मन मनोभव पेषल जानि'॥ ए सखि, से-सब प्रेमकहिनि। कानुठामे कहबि बिछुरल जानि'॥ ना खोंजलुँ दूती, ना खोंजलुँ आन। दुँहुको मिलने मध्ये पाँचबाण॥ अब् सोहि विराग, तुँहु भेलि दूति। सु-पुरुष-प्रेमक ऐछन रीति॥”193॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥193॥ अमृतप्रवाह भाष्य-“आहा, मिलनके पूर्वरागके समय परस्परके नयन-ईक्षणसे 'राग' नामक एक भावका उदय होता है; वही राग बढ़ते-बढ़ते 'अवधि' अथवा चरम सीमाको प्राप्त नहीं हुआ; वह राग-हम दोनोंके स्वभावसे ही उत्पन्न हुआ है। रमणस्वरूप कृष्ण ही उसके कारण हैं, ऐसा नहीं है, अथवा रमणीस्वरूपा मैं ही उसका कारण हूँ, वैसा भी नहीं है। परस्पर दर्शनसे जो 'राग' उदित हुआ, वही मनोभव अर्थात् मदन हुआ और उसने हमारे मनको पीसकर एक कर दिया था। अब विरहके समय, वे सब प्रेमकी बातें, हे सखी! कृष्ण यदि भूल भी गये हों, तुम तो यह समझ सकती हो, इसलिये उनको कहना, - मिलनके समय हमने किसी दूतीको नहीं ढूँढ़ा था, अथवा और किसीसे भी कोई अनुरोध नहीं किया था, अनङ्गरूपी पाँच बाण ही हमारे मिलनके मध्यस्थ थे। और, अब विरहके समय वही राग 'विराग' होकर अर्थात् विशिष्टराग अथवा विच्छेदगत-राग अथवा अधिरूढ़भावरूपमें, हे सखि, तुम दूतीके रूपमें कार्य कर रही हो! सुन्दर-पुरुषके प्रेममें यही रीति सर्वत्र देखोगी।' तात्पर्य यह है कि, - सम्भोगके समय 'राग' जैसे अनङ्गरूपमें मध्यस्थ होता है, विप्रलम्भके समय वह (राग) उसी प्रकार प्रेमविलास-विवर्त्तमें अधिरूढ़-भावयुक्त दूती होता है अर्थात् विप्रलम्भमें सम्भोग-स्फूर्ति कार्यमें दूतीस्वरूप बननेपर उसको श्रीमती 'सखी' कहकर सम्बोधन करते हुए यह बात कह रही हैं। मूल तात्पर्य यह है कि, - प्रेमविलास-सम्भोगमें भी जैसा आनन्द है, विप्रलम्भमें भी वैसा ही है; विशेषतः विप्रलम्भमें (सेवाकी पराकाष्ठासे कृष्णमें तन्मयभावके कारण) सर्पमें रस्सीके भ्रमके समान तमालवृक्षादिमें श्रीकृष्णभ्रमजनित विवर्त्त-भावयुक्त अधिरूढ़-महाभावरूपी एक प्रकारका सम्भोग उदित होता है॥193॥ अनुभाष्य- 'पहिलेहि'- सर्वप्रथम। 'राग'- पूर्वराग। “रतियाॅ सङ्गमात् पूर्वं दर्शनश्रवणादिजा। तयोरुन्मीलति प्राज्ञैः पूर्वरागः स उच्यते॥” (उःनीः 15/5) “नायक और नायिकाके मिलनसे पूर्व दर्शन, श्रवणादिसे उत्पन्न जिस रतिका आविर्भाव होता है, उसे पूर्वराग कहते हैं।” 'नयन-भङ्गे'-परस्पर दर्शन-विनिमयसे; नयन-भङ्गीसे अर्थात् अपाङ्गदर्शनसे परस्परके चित्तवृत्ति-संयोजक इशारेसे। 'अनुदिन बाढ़ल'- दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगा। 'अवधि ना गेल'-सीमा नहीं रही। 'प्रौढ़ा समर्था-रति'में लालसा, उद्वेग, जागर्य (निद्राका अभाव), तानव (शरीरकी कृशता, दुर्बलता), जड़ता, व्यग्रता, व्याधि, उन्माद, मोह और मृत्यु; अर्थात् चिन्ता, जागर, उद्वेग, अमर, मलिनाङ्गता, प्रलाप, व्याधि, उन्माद, मोह और मृत्यु-ये दस दशाएँ हैं। 'समञ्जसा-रति'में अभिलाष, चिन्ता, स्मृति, गुण-कीर्तन, उद्वेग, सविलाप उन्माद,-ये छह प्रकारकी दशाएँ हैं। 'साधारणी-रति'में सोलह प्रकारकी दशाएँ अर्थात् प्रौढ़ा समर्था-रति और समञ्जसा-रतिके सविलाप उन्माद तक। '(उज्ज्वलनीलमणि पृः 828 से 852 देखें)। 'सो'-वे रमण श्रीकृष्ण; 'हाम'-मैं राधिका रमणी; । 305

[ 8/190-194 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला हम दोनों ही उसके कारण नहीं हैं अथवा हमारी पार्थक्य-बुद्धि नहीं है अर्थात् हम दो हैं—ऐसी बुद्धि नहीं है। 'मनोभव'—अर्थात् कन्दर्पने इसे जानकर, रमण और रमणी, दोनोंके मनको पीसकर एक कर दिया। प्रेम-काहिनी'—प्रेमविलाससमूह। 'कानुठामे'—कृष्णके स्थानमें या निकटमें। 'कहबि'—बोलना। 'विछुरल'—भूल गये हैं। 'जानि'—जानकर। 'खौजलुँ'—ढूँढ़ा था। 'दूती'—जो मध्यस्थ होकर नायक और नायिकाका मिलन कराती है; दूती दो प्रकारकी हैं—'स्वयं-दूती' और 'आप्तदूती'। 'स्वयं-दूती'—कटाक्ष और वंशीध्वनि है; 'आप्तदूती'—वीरा, वृन्दा आदि हैं। 'साधारण-दूती'—शिल्पकारिणी, दैवज्ञा, लिङ्गिनी आदि। 'ना खौजलुँ आन्'—और किसीको भी अनुरोध अथवा अन्वेषण नहीं किया। 'दुहुँके'—श्रीराधा और कृष्ण, इन दोनोंके। 'मिलने'—दोनोंके मिलनसे; 'मध्ये पाँचबाण'—रूप-रस-गन्ध-शब्द-स्पर्शसे प्रकटित पाँच बाण। 'अबु'—इस समय। 'सोहि'—वही राग, 'विराग'—विप्रलम्भमें अधिरूढ़-महाभाव। 'तुहुँ'—तुम। 'भेलि'—होनेपर। 'सु-पुरुख'—उत्तम-नायकके। 'प्रेमक'—प्रेमके। 'ऐछन'—इस प्रकार॥ 193॥ परस्परके भेद-भ्रम-दूरीभूत अवस्था :— उज्ज्वलनीलमणि (14/155)— राधाया भवतश्च चित्तजतुनी स्वेदैर्विलाप्य क्रमाद्- युञ्जन्नद्रि-निकुञ्ज-कुञ्जरपते निर्धूत-भेदभ्रमम्। चित्राय स्वयमन्वरञ्जयदिह ब्रह्माण्डहर्म्योदरे भूयोभिर्नव-राग-हिङ्गुलभरैः शृङ्गार-कारुकृती॥ 194॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 194॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे गोवर्धनपर्वत-निकुञ्जवासि- गजराज, शृङ्गारशिल्प-शास्त्रमें निपुण विधाताने राधिका और तुम्हारे चित्तरूपी लाक्षाको सात्त्विक-विकाररूपी धर्मके द्वारा द्रवीभूत करके [धीरे-धीरे दोनोंको एकत्रकर] भेदभ्रमको दूर करके ब्रह्माण्डरूप देवगृहमें नवराग-कुङ्कुमके द्वारा स्वयं जगत्के आश्चर्यको सम्वर्धित करनेके उद्देश्यसे दोनोंके उन दो चित्तोंको अतिशय रञ्जित किया है॥ 194॥ अनुभाष्य— हे अद्रिनिकुञ्जकुञ्जरपते, (गिरि-गोवर्धन-निकुञ्जारण्य-गजपते, गोवर्धनकुञ्जविहारिन्), शृङ्गार-कारुकृति (शृङ्गार-कारुकर्मणि सुनिपुणः) राधायाः भवतश्च चित्तजतुनी (चित्ते एव जतुनी लाक्षे) स्वेदैः (अन्तर्बहिर्द्रवरूपैः विकारैः अग्नितापैर्वा) क्रमात् (शनैः शनैः) विलाप्य (द्रवीकृत्य) निर्धूतभेदभ्रमं (भेद एव भ्रमः, तं निर्धूतं दूरीभूतं) युञ्जन् (कुर्वन्) इह ब्रह्माण्ड- हर्म्योदरे (ब्रह्माण्डमेव हर्म्यं तस्योदरे) चित्राय (चित्रार्थं, विस्मयवर्द्धनार्थं) भूयोभिः (नानाविधैः) नवराग-हिङ्गुलभरैः (नवानुरागरूप-हिङ्गुल-रञ्जनैः) स्वयम् अन्वरञ्जयत्। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 194॥ अमृतानुकणिका—"महाप्रभु श्रीराय रामानन्दसे श्रीराधाकृष्णके विलासकी महिमाको श्रवण करना चाहते हैं। श्रीरायने कहा कि श्रीकृष्ण 'धीर-ललित' नायक हैं और उसी रूपमें विलास करते हैं। धीर-ललित नायक नवयौवनयुक्त, विदग्ध अर्थात् चतुर, परिहास-पटु अर्थात् परिहास करनेमें अत्यन्त कुशल, निश्चिन्त और अपनी प्रेयसीके वशीभूत होता है। 'परिहास-विशारद'— श्रीकृष्णने शरद पूर्णिमाकी रात्रिमें वंशी बजाकर गोपियोंको बुलाया और जब वे सब कुछ त्यागकर वहाँ आयीं, तो श्रीकृष्ण कहने लगे—'आपका स्वागत है। मैं आपका कौनसा प्रिय कार्य करूँ? आप कैसे पधारीं? ओह! लगता है, आप सब पूर्णिमामें वनकी शोभा और यमुनाका सौन्दर्य देखने आयी हैं? अब आपने यह सब देख लिया है, इसलिये वापिस लौट जाओ, क्योंकि रात्रिके समय स्त्रियोंका वनमें आना उचित नहीं है। वनमें हिंसक प्राणी हैं और यह घोर रात्रि है। आप अपने-अपने घरोंको लौट जाओ। घरमें जाकर पति-सास- ससुर-बच्चोंकी सेवा करो, अन्यथा जघन्य अपराध, पाप होगा और समाजमें निन्दा भी होगी।' पहले तो गोपियाँ कृष्णके आन्तरिक मन्तव्यको समझनेके लिये चुप रहीं, अन्तमें गोपियोंने उनके इस परिहासका उत्तर दिया और रास आरम्भ हुआ। रासके मध्य भी श्रीकृष्ण 306

आठवाँ अध्याय 8/190-194 ] गोपियोंके प्रेम-वर्धन हेतु छिप जाते हैं। यह श्रीकृष्णका प्रेमविलास-विवर्त्तमें यह ऐक्य भावगत है, वस्तुगत नहीं परिहास-कौशल और विदग्धता है। 'नवतारुण्य'— है, अर्थात् देह-मन-प्राणका पृथक् अस्तित्व बना रहता नवयौवनावस्था विलासके योग्य है। श्रीकृष्ण रात-दिन है, भाव तथा मननमें ऐक्य होता है। जिस प्रकार श्रीराधाके साथ हास-परिहास और कुञ्जोंमें विभिन्न लाखके दो टुकड़े अग्निके प्रभावसे पिघलकर एक हो प्रकारकी क्रीड़ाएँ करते हैं। वे निश्चिन्त हैं, क्योंकि जाते हैं, उसी प्रकार श्रीराधाकृष्णका मन प्रेमके प्रभावसे अत्यन्त प्रेमवशतः माता-पिताने उन्हें किसी कार्यका पिघलकर एक हो जाता है। मनका भेद मिट जानेपर दायित्व नहीं दिया। इस प्रकार वे अपनी किशोरावस्थाको दोनोंको अपने पृथक् अस्तित्वका ज्ञान नहीं रहता, सफल कर रहे हैं। धीर-ललित नायक अपनी प्रेयसीके किन्तु पृथक् अस्तित्व बना रहता है; विलास-सुख अधीन रहता है, यह उसका एक विशेष गुण है। ऐक्यताकी अनुभूति रहती है और विलास-सम्बन्धी प्रेमविलास-विवर्त्त—विवर्त्तका अर्थ है विशेष रूपसे चेष्टा भी रहती है। यही प्रेमविलासकी चरमोत्कर्ष आवर्त्त। जब प्रेम अपनी चरम अवस्थापर उपस्थित हो अवस्था है। जाता है, तब उसे प्रेम-विवर्त्त कहते हैं। अनुरागका प्रेमविलास-विवर्त्तके दो बाह्य लक्षण हैं—भ्रम और आश्रय या नींव है राग; रागकी नींव है प्रणय, जिसमें विपरीतता। तन्मयताके कारण भ्रम या आत्म-विस्मृति नायक और नायिकामें विश्रम्भभाव उदित होता है हो जाती है। इस अवस्थामें परस्परका सुख वर्धन अर्थात् दोनोंमें अपने देह-प्राणादिको एक माननेकी करनेकी चरम उत्कण्ठाके कारण उनकी चेष्टाओंमें प्रवृत्ति जन्मती है। प्रणयका विकास जब अनुरागमें होता विपरीतता आ जाती है, अर्थात् कान्ताका भाव और है, तब यह अपनी चरम सीमामें पहुँचकर 'यावदाश्रय आचरण कान्तमें और कान्तका भाव और आचरण वृत्ति' लाभ करता है। प्रेमसे लेकर महाभाव तक कान्तामें सञ्चरित होता है। किन्तु यह विपरीतता जितनी प्रकारकी आश्रय-वृत्तियाँ हैं, उनमें जब सभी अबुद्धिपूर्वक ही होती है। सात्त्विक भावादि पूर्णरूपसे सुद्दीप्त अवस्थाको प्राप्त होते श्रीराधा कह रही हैं—'पहिलहि राग नयनभङ्गे भेल' हैं, तब उस परिपक्व अवस्थाको 'यावदाश्रय वृत्ति' अर्थात् पलक गिरनेमें जितना समय लगता है, उतनी कहते हैं। इसमें आश्रय और विषय अपने प्रेमकी चरम देरमें कृष्णसे मेरा प्रथम राग हो गया। यही पूर्वराग पराकाष्ठा तक पहुँचते हैं, प्रेमका आगे बढ़नेका कोई प्रेमकी प्रथम स्थिति है। स्थान नहीं रहनेपर भी वह बढ़ता रहता है। महाभावकी विदग्धमाधवमें यह प्रसङ्ग वर्णित है—श्रीराधाने पहले दूसरी विशेषता है—उसकी स्वसंवेद्य दशा। इस अवस्थामें तो श्रीकृष्णका नाम सुना, फिर वंशी ध्वनि सुनी और मिलनमें प्रेम एक ऐसी स्थितिमें पहुँचता है जिसमें तत्पश्चात् उनका चित्रपट देखा। वे तीनोंपर ही मोहित केवल मिलनके आनन्दकी ही अनुभूति रह जाती है, हो गईं। किन्तु फिर सोचने लगीं कि 'तीन पुरुषोंमें मेरी आस्वादक और आस्वाद्यका ज्ञान लुप्त हो जाता है। रति कैसे हुई! अब मैं प्राण त्याग दूँगी।' तब ललिताने 'न सो रमण, न हाम रमणी'—अनुरागकी ऐसी अवस्थाको उन्हें समझाया कि ये तीन पुरुष नहीं हैं। जिनका नाम इङ्गित करता है जिसमें केवल रसका ही अनुभव होता कृष्ण है, उन्हींकी वंशी-ध्वनि तुमने सुनी और यह है। इस मादनाख्य भावमें अनुरागकी जो चरम पराकाष्ठा चित्र भी उन्हींका ही है। ये तीनों व्यक्ति एक (कृष्ण) है, उसमें विषय और आश्रय—दोनोंके प्राण, देह, मन ही हैं। आदिका भी ऐक्य हो जाता है, जिसका इङ्गित 'ये सब प्रेमकाहिनी कानुठामे कहबि बिछुरल 'दुहुँ-मन मनोभव पेषल जानि' में किया गया है। जानि' अर्थात् अब हम बिछुड़ गये हैं, तो क्या कृष्ण । 307

[ 8/190–204 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

वह सब प्रेम कहानी भूल गये हैं?' 'न खोंजलुँ दूती, न खोंजलुँ आन' अर्थात् हे सखी! तुम उनसे कहना कि हमारे मिलनके समय दूती केवल हमारी दृष्टि थी, कन्दर्पके पाँच बाणोंने ही हमारी मध्यस्थता की थी, किन्तु अब मैं बड़ी विचित्र बात देख रही हूँ कि वे सब भूल गये हैं। उसीको याद दिलानेके लिये मैं तुम्हें भेज रही हूँ। 'अब् सोहि विराग', यहाँ श्रीराधामें अधिरूढ़ महाभाव उदित हुआ है। पहले मिलनमें कन्दर्प मध्यस्थ था, अब विरहमें अधिरूढ़ भाव दूती बन गया। श्रीराधा उसीको 'सखी' कहकर सम्बोधित कर रही हैं और कह रही हैं-'क्या सुपुरुषके प्रेमकी ऐसी ही गति होती है, जिससे प्रेम किया उसीको भूल जाना?' यह सब वार्तालाप वे स्वयंसे कर रही हैं। उनके कर-कमलोंमें कोई पत्र भी नहीं है, वे तो प्रेमकी चरमावस्थामें हैं-यही प्रेम-विलास विवर्त्त है। यह सब श्रवणकर महाप्रभुने श्रीराय रामानन्दके मुखको अपने हस्तकमलसे ढक दिया और कहा—'साध्य वस्तु यही है और आगे मत कहो।' महाप्रभुको अपने कृष्ण-स्वरूपका स्मरण हो आया और श्रीरामानन्दके आगे कहनेसे उनका कृष्ण-स्वरूप प्रकट हो जायेगा, इसलिये महाप्रभु उन्हें आगे कहने नहीं दिया। यह अन्तरङ्ग कारण है और इसका बहिरङ्ग कारण यह है कि इस गूढ़ रहस्यको जगत्में प्रकाशित नहीं किया जा सकता। इसे सुनने और समझनेवाले इस जगत्में विरले ही हैं।"–श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी॥ 190–194॥

यहाँ तक साध्यकी सीमा :- प्रभु कहे, —“'साध्यवस्तुर अवधि' एइ हय। तोमार प्रसादे इहा जानिलुँ निश्चय ॥ 195 ॥

साधनके द्वारा ही साध्यकी प्राप्ति :- 'साध्यवस्तु' 'साधन'-बिना केह नाहि पाय। कृपा करि' कह, राय, पावार उपाय ॥" 196 ॥

अनुवाद—महाप्रभुने कहा, – “यही साध्य वस्तुकी अन्तिम सीमा है। तुम्हारी कृपासे मैंने इस साध्य वस्तुके तारतम्यको समझा है। किन्तु ऐसी दुर्लभ साध्य वस्तुकी उपलब्धि, बिना साधनके नहीं हो सकती। इसलिये कृपा करके इस साध्य वस्तुकी प्राप्तिका उपाय भी बतलाइये॥" 195–196 ॥

महाप्रभुकी इच्छासे श्रीराय वशीभूत :- राय कहे, —“येइ कहाओ, सेइ कहि वाणी। कि कहिये भाल-मन्द, किछुइ ना जानि ॥ 197 ॥

त्रिभुवन-मध्ये ऐछे हय कोन् धीर। ये तोमार माया-नाटे हइबेक स्थिर ॥ 198 ॥

श्रीरायके मुखसे महाप्रभु स्वयं ही वक्ता, स्वयं ही श्रोता :- मोर मुखे वक्ता तुमि, तुमि हओ श्रोता। अत्यन्त रहस्य, शुन, साधनेर कथा ॥ 199 ॥

साधनके रहस्यका वर्णन; केवल मधुर-रसमें 'कान्तभाव'की प्राप्ति :- राधाकृष्णेर लीला एइ अति गूढ़तर। दास्य-वात्सल्यादि-भावे ना हय गोचर ॥ 200 ॥

अनुगत सखियोंके द्वारा ही राधाकृष्णविलासकी पुष्टि :- सबे एक सखीगणेर इँहा अधिकार। सखी हैते हय एइ लीलार विस्तार ॥ 201 ॥

सखी बिना एइ लीला पुष्ट नाहि हय। सखी लीला विस्तारिया, सखी आस्वादय ॥ 202 ॥

सखी बिना एइ लीलाय अन्येर नाहि गति। सखीभावे ये ताँरे करे अनुगति ॥ 203 ॥

राधाकृष्ण-कुञ्जसेवा साध्य सेइ पाय। सेइ साध्य पाइते आर नाहिक उपाय ॥ 204 ॥

अनुवाद-श्रीरामानन्द रायने विनम्र भावसे कहा, – “जो आप मेरी वाणीसे कहलवा रहे हैं, मैं वही कहता जा रहा हूँ। इसमें क्या अच्छा है और क्या बुरा-इस विषयमें मैं कुछ नहीं जानता। इन तीन लोकोंमें कौन ऐसा धैर्यवान् पुरुष है, जो आपकी इस मायाके

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नाटकको देखकर स्थिर रह सके? मेरे मुखसे आप ही वक्ता हैं और आप ही श्रोता बने हुए हैं। आप इस अत्यन्त रहस्यमय साधनके विषयमें सुनिये। श्रीराधाकृष्णकी यह लीला अति रहस्यमयी है। दास्य, सख्य, वात्सल्यादि भावाश्रित परिकरोंके द्वारा भी यह नहीं समझी जा सकती। एकमात्र श्रीराधाजीकी सखियोंका ही इस लीलामें अधिकार है और सखियोंसे ही लीलाका विस्तार होता है। सखियोंके बिना लीलाकी पुष्टि नहीं होती। सखियाँ ही इस लीलाका विस्तार करती हैं और वे ही इसका आस्वादन करती हैं। सखीके अतिरिक्त अन्य किसीका इस लीलामें प्रवेश करनेका अधिकार नहीं है। जो सखीभावसे सखीका आनुगत्य करता है, वही श्रीराधाकृष्णकी कुञ्जसेवारूप साध्य-वस्तुकी प्राप्ति कर सकता है—इसके अतिरिक्त इस साध्यकी प्राप्तिका और कोई उपाय नहीं है ॥ 197–204 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुने इतना श्रवण करके कहा,—साध्यवस्तुके विषयमें सब कुछ कहना हो गया, अब इस चरमसाध्य-वस्तुको प्राप्त करनेका जो साधन अथवा उपाय है, उसे कहो। श्रीराय रामानन्दने उसके उत्तरमें कहा,—दास्य-वात्सल्यादि रसोंमें यह गूढ़तत्त्व प्राप्त नहीं होता, व्रजसखीके बिना इस लीलामें दूसरोंका प्रवेश असम्भव है; व्रजसखीका भाव ग्रहण करके सखीके आनुगत्यमें साधन कर पानेसे श्रीराधाकृष्ण- कुञ्जसेवारूप साध्यवस्तु प्राप्त होती है, इसको पानेका अन्य कोई उपाय नहीं है॥ 202–204 ॥ अनुभाष्य—'सखी',—उज्ज्वलनीलमणिमें जैसे— “प्रेमलीलाविहारिणां सम्यग्विस्तारिका सखी। विश्रम्भरत्नपेटी च॥” श्रीकृष्णकी प्रेमलीला और विहारादिका सम्पूर्णरूपसे विस्तार करनेवालीको 'सखी' कहते हैं। सखियाँ—श्रीकृष्णकी विश्वासरूपी रत्नोंकी पेटीस्वरूपा हैं। सखियोंकी वृत्ति— “मिथः प्रेमगुणोत्कीर्त्तिस्तयोरासक्तिकारिता। अभिसारो द्वयोरेव सख्याः कृष्णे समर्पणम्। नर्माश्वासन-नेपथ्यं हृदयोद्घाटनपाटवम्। छिद्रसंवृत्तिरेतस्याः पत्यादेः परिवञ्चना। शिक्षा सङ्गमनं काले सेवनं व्यजनादिभिः। तयोर्द्वयोरापालम्भः सन्देशप्रेषणं तथा। नायिकाप्राणसंरक्षा प्रयत्नाद्याः सखीक्रियाः॥” (1) नायक और नायिकाके परस्परके प्रेम-गुणोंका कीर्त्तन, (2) एककी दूसरेके प्रति आसक्तिको वर्धित करना, (3) दोनोंको अभिसार कराना, (4) कृष्णके प्रति सखीको समर्पित करना, (5) परिहास, (6) आश्वासन-प्रदान, (7) नेपथ्य अर्थात् नायक-नायिकाकी वेशरचना या उनका शृङ्गार, (8) हृदयके भावोंको प्रकाशित करनेकी निपुणता, (9) नायिकाके दोषोंको छिपाना, (10) पति आदिकी वञ्चना, (11) शिक्षा, (12) उचित कालमें नायक-नायिकाका मिलन कराना, (13) चामर आदि डुलाना, (14) आवश्यक होनेपर दोनोंके प्रति तिरस्कार, (15) संवाद भेजना, (16) नायिकाके प्राणोंकी रक्षाके लिये यत्न करना। आदिलीला 4/211, 217-218 संख्या देखें। 'सखीभेकी' और 'गौरनागरी' आदि प्राकृत सहजिया सम्प्रदायके लोग देहात्म-बुद्धि होनेके कारण इस जड़ शरीर, जो मरनेके बाद कुत्ते-सियारका भोजन बन जायेगा, उसकी और चमड़ीकी शोभा बढ़ाकर श्रीकृष्णको आनन्द देना चाहते हैं, परन्तु श्रीकृष्णसे इतर ये सब कृत्रिम चेष्टाएँ जड़ेन्द्रियोंकी ही तृप्ति करनेवाली हैं, इसलिये श्रीकृष्ण उनका उपभोग करके आनन्द प्राप्त नहीं करते। चिन्मयी श्रीराधा और उनकी सखियोंकी देह, गेह, वेश-भूषणादि तथा सभी क्रियाएँ अथवा चेष्टाएँ चिन्मय हैं, वे कृष्णेन्द्रिय-प्रीतिकर और श्रीकृष्णको वशीभूत करनेवाली हैं। वे देवीधामके अन्तर्गत चौदह भुवनोंकी कोई क्रिया अथवा वस्तु नहीं है। श्रीकृष्ण भुवनमोहन होनेपर भी वे (गोपियाँ) भुवनमोहिनी नहीं, भुवनमोहन-मनोमोहनी हैं। भोगपरायण मनोधर्मके वशीभूत होकर अपनी । 309

[ 8/202–205 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला काल्पनिक सिद्धदेहमें अपनेको 'सखी' मानकर अभिमान करना भी अहंग्रहोपासना ही हो जाता है; फलस्वरूप, कल्पनाकारीका देवीधाममें (इस संसारमें) ही वास होता है (भगवद्धामकी प्राप्ति नहीं होती)। श्रील जीवगोस्वामी प्रभुने प्राकृत-जीवोंको इस विषयमें सतर्क भी किया है—जैसे, भः रः सिः पूर्व विभाग द्वितीय लहरी— “लुब्धैर्वात्सलसख्यादौ”—श्लोककी 'दुर्गमसङ्गमनी' टीका— 'न तु व्रजेन्द्रादित्वाभिमानेनापीत्यर्थः। पितृत्वाद्यभिमानो हि द्विधा सम्भवति—स्वतन्त्रत्वेन, तत्पित्रादिभिरभेदभावनया च। तत्रान्त्यमनुचितं भगवदभेदोपासनावत्तेषु भगवद्वदेव नित्यत्वेन प्रतिपादयिष्यमाणेषु तदनौचित्यात्; तथा तत्परिकरेषु तदुचितभावना-विशेषेणापराधापातात्॥' श्रील जीवगोस्वामीने 'दुर्गम-सङ्गमनी'-टीकामें कहा है,—'वात्सल्य-सख्यादिभावोंसे लुब्ध साधकगण किन्तु व्रजराज श्रीनन्दादि-अभिमानके द्वारा भक्ति साधन नहीं करेंगे, यह अर्थ है। पिता होनेका अभिमान दो प्रकारका होता है—स्वतन्त्ररूपसे और श्रीकृष्णके पिता श्रीनन्दादिके साथ अभेद-भावनारूपसे। इनमेंसे बादमें कहा गया अभिमान अनुचित है, क्योंकि भगवान्‌के साथ अभेद होनेके लिये उपासनाके जैसे ही भगवान्‌के सदृश ही नित्यत्वरूपसे (श्रीनन्दादि नित्यसिद्धरूपसे) प्रतिपादन करेंगे, इस प्रकारका अभिमान अनुचित है। परन्तु [स्वतन्त्ररूपसे] भगवान्‌के पिता-सखादिरूप परिकर-अभिमानसे उसके उपयोगी विशेष भावनाके द्वारा अपराध नहीं होता।' इसलिये ही (भःरःसिः, पूःविः, 2लः)में श्रील रूप गोस्वामी प्रभुने कहा है,— “कृष्णं स्मरन् जनञ्चास्य प्रेष्ठं निज-समीहितम्। तत्तत्कथारतश्चासौ कुर्याद्वासं व्रजे सदा। सेवा साधकरूपेण सिद्धरूपेण चात्र हि। तद्भावलिप्सुना कार्या व्रजलोकानुसारतः॥” इस श्लोककी दुर्गमसङ्गमनी टीका— “व्रजलोकास्त्वत्र कृष्णप्रेष्ठजनास्तदनुगताश्च तदनुसारतः॥” श्लोकार्थ,—'श्रीकृष्णको और निज-अभीष्ट श्रीकृष्णप्रेष्ठ-जनको स्मरण करते-करते उन-उन कथामें रत होकर सर्वदा व्रजमें वास करेंगे। इस भावके लोभीगण साधकरूपमें और अन्तश्चिन्तित सिद्ध-स्वरूपसे व्रजवासियोंके अनुगामी होकर सेवा करेंगे।' दुर्गमसङ्गमनी टीकाार्थ,—'यहाँपर 'व्रजवासियों' अर्थात् श्रीकृष्णप्रेष्ठजन और उनके अनुगतगण,—उनके अनुसरणके द्वारा, यह अर्थ है।' मध्यलीला 22/155 और 157 संख्या देखें॥ 202–204॥ सखियोंके द्वारा शृङ्गार-रसकी पुष्टि :— श्रीगोविन्द-लीलामृत (10/17)— विभुरपि सुखरूपः स्वप्रकाशोऽपि भावः क्षणमपि न हि राधाकृष्णयोर्या ऋते स्वाः। प्रवहति रसपुष्टिं चिद्विभूतीरिवेशः श्रयति न पदमासां कः सखीनां रसज्ञः॥ 205॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 205॥ अमृतप्रवाह भाष्य—राधा-कृष्णका भाव स्वप्रकाश होनेपर भी और सुख विभु अर्थात् अनन्त होनेपर भी सखियोंके बिना एक क्षणके लिये भी रसपुष्टि लाभ नहीं कर सकता, जिस प्रकार ईश्वरकी चिद्-विभूतिके बिना ईश्वरत्व पुष्टि प्राप्त नहीं करता, उसी प्रकार। इसलिये उसमें प्रविष्ट कौन रसज्ञ सखियोंका पदाश्रय नहीं करेगा?॥ 205॥ अनुभाष्य— राधाकृष्णयोः (व्रजनवयुवद्वन्द्वयोः) भावः (चिद्विलासः) विभुः (परममहान्) अपि, सुखरूपः (सच्चिदानन्दमयः) स्वप्रकाशः (स्वयंप्रकाशरूपः) अपि स्वाः (निजसम्बन्धिन्यः कायव्यूह- स्वरूपिण्यः याः सखीः) ऋते (बिना) रसपुष्टिं न हि प्रवहति; यथा ईशः (ईश्वरः) चिद्विभूतीः इव, [सच्चिदानन्दः ईश्वरः यथा निजनित्यचिदैश्वर्यादिकं बिना पुष्टिं न प्राप्नोति, तथेत्यर्थः अतः कारणात्] कः रसज्ञः (कृष्णतत्त्ववित् कृति) आसां सखीनां पदं न श्रयति? (आश्रयति? सर्वे सनिपुणाः मधुररसज्ञाः भक्ताः सखीपदं आश्रयन्तीत्यर्थः)। 310 ।

आठवाँ अध्याय 8/205-210 ] [बायाँ स्तम्भ] श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। (यथा केवलाद्वैतवादिनां कल्पनाङ्गितविग्रहः अज्ञान- समष्ट्यधिष्ठातृदेव ईश्वरः अज्ञान-व्यष्ट्यधिष्ठातृ-मलिनसत्त्व- विकाराख्य-जीवादि-विभूतिमयोऽपि षण्ढवत् नित्यसत्यविलास-रहितः, विशिष्टाद्वैतवादिनामाराध्यो नित्यसच्चिदानन्दविग्रह ईश्वरो नित्यचिदानन्दमयः स्वगत-सजातीय-विजातीय-नित्यविशेष- विभूतिभिः शान्त-दास्य-सख्य-सार्द्धद्वय-रसपुष्टिं करोति, तथा परिपूर्णौ सुखरूपौ श्रीवार्षभानवी-व्रजेन्द्रनन्दनौ स्वयं-प्रकाशरूपौ सन्तावपि सखीभिः नित्यरसपुष्टिं कुरुत इति भावः।) केवलाद्वैतवादियोंके कल्पना-निर्मित-विग्रह 'अज्ञान-समष्टि'के अधिष्ठातारूप ईश्वर हैं—'अज्ञान- व्यष्टि'के अधिष्ठाता और मलिन-सत्त्वके विकाररूप जीव आदि विभूतियुक्त होनेपर भी वे क्लीववत् नित्य-सत्य-विलाससहित हैं। विशिष्टाद्वैतवादिगणोंके आराध्य नित्य सच्चिदानन्दविग्रह ईश्वर—नित्य चिदानन्दमय और स्वगत-सजातीय-विजातीय नित्य-सविशेष समस्त विभूतियोंके साथ शान्त, दास्य और आधे सख्यकी (अड़ाई) रस पुष्टि करते हैं। परिपूर्ण-सुखस्वरूप श्रीवृषभानुनन्दिनी और श्रीव्रजेन्द्रनन्दन स्वयं प्रकाशित रूप होनेपर भी (अर्थात् अन्य-अपेक्षारहित होनेपर भी) सखियोंके साथ नित्यरसकी पुष्टि करते रहते हैं,—यही अर्थ है॥205॥ सखियोंका श्रीराधाप्रेम :— सखीर स्वभाव एक अकथ्य-कथन। कृष्ण-सह निजलीलाय नाहि सखीर मन॥ 206 ॥ कृष्णसह राधिकार लीला ये कराय। निज-सुख हैते ताते कोटि सुख पाय॥ 207 ॥ अनुवाद—सखियोंका स्वभाव अपूर्व और अवर्णनीय है। वे स्वयं कभी भी श्रीकृष्णके सङ्गरूपी सुखको प्राप्त करनेकी अभिलाषा नहीं करतीं। श्रीकृष्णके साथ श्रीराधिकाकी लीलाएँ करानेमें उनको जिस सुखकी अनुभूति होती है, उस सुखको वे स्वयं श्रीकृष्णके साथ क्रीड़ाविलास करनेसे भी कोटि गुणा अधिक मानती हैं॥ 206-207 ॥ [दायाँ स्तम्भ] राधा और सखियोंका परस्परका प्रेम-सम्बन्ध :— राधार स्वरूप—कृष्णप्रेम-कल्पलता। सखीगण हय तार पल्लव-पुष्प-पाता॥ 208 ॥ कृष्णलीलामृत यदि लताके सिञ्चय। निज-सुख हैते पलवाद्येर कोटि-सुख हय॥ 209 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 208-209 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीराधा ही श्रीकृष्णकी प्रेम-कल्पलतास्वरूपा हैं और सखियाँ उस लताके पल्लव, पुष्प एवं पत्र हैं। लतारूप श्रीराधिकाका पदाश्रय लेकर लताका जलसे सिञ्चन करनेपर पल्लवादि अत्यन्त प्रफुल्लित हो जाते हैं। पल्लवादिमें जल देनेसे जैसे पल्लवादि प्रफुल्लित नहीं होते, उसी प्रकार गोपियोंको श्रीकृष्ण-मिलन सुखसे भी श्रीराधाकृष्ण-मिलनके द्वारा ही अधिक सुख होता है॥ 208-209 ॥ श्रीगोविन्द-लीलामृत (10/16) :— सख्यः श्रीराधिकाया व्रजकुमुदविधोर्ह्लादिनी-नामशक्तेः सारांश-प्रेमवल्याः किशलयदलपुष्पादितुल्याः स्वतुल्याः। सिक्तायाः कृष्णलीलामृतरसनिचयैरूल्लसन्त्याममुष्यां जातोल्लासां स्वसेकाच्छतगुणमधिकं सन्ति यत्तन्न चित्रम्॥ 210 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 210 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—व्रजकी सखियाँ श्रीराधाके तुल्य और व्रजकुमुदचन्द्रकी ह्लादिनी नामक शक्तिस्वरूपा श्रीराधिकाकी सारांश-प्रेमलताके कोंपल, पत्र, पुष्पादि स्वरूप हैं। श्रीकृष्णलीलामृतरस-समूहके द्वारा परमोल्लासमयी श्रीराधिकाके सिञ्चित होनेपर ही सखियाँ अपने सिञ्चनसे सौ गुणा अधिक उल्लसित होती हैं—यह कोई विचित्र बात नहीं है॥ 210 ॥ अनुभाष्य— व्रजकुमुदविधोः (व्रजवासिकुमुदानन्दकृष्णचन्द्रस्य) ह्लादिनीनामशक्तेः (ह्लादिन्याख्यशक्तेः) श्रीराधिकायाः सारांश-प्रेमवल्याः (सारांशः यः प्रेमा सः एव वल्ली लता तस्याः) किशलय-दल-पुष्पादितुल्याः । 311

[ 8/200-214 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (नवीनपत्रकुसुमादिसमाः), अतएव स्वतुल्याः सख्यः (ललितादिप्रियनर्मसख्यः) कृष्णलीलामृत-रस-निचयैः सिक्तायां अमुष्यां (राधायाम्) उल्लसन्त्यां च [सत्यां ताः] सख्यः स्वसेकात् (स्व-सेचनात्) शतगुणम् अधिकं जातोल्लासाः (हर्षान्विताः) भवन्ति, इति यत्, तत् न चित्रं (विस्मयकरम्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥210॥ श्रीराधिकाकी सखियोंके प्रति प्रीति :- यद्यपि सखीर कृष्ण-सङ्गमे नाहि मन। तथापि राधिका यत्ने करान सङ्गम॥211॥ नाना-छले कृष्णे प्रेरि' सङ्गम कराय। आत्मसुख-सङ्ग हैते कोटि-सुख पाय॥212॥ श्रीराधा और सखियोंकी परस्पर प्रीतिमें कृष्णका सुख :- अन्योन्ये विशुद्ध प्रेमे करे रस पुष्ट। ताँ-सबार प्रेम देखि' कृष्ण हय तुष्ट॥213॥ सहज गोपीर प्रेम,—नहे प्राकृत काम। कामक्रीड़ा-साम्ये तार कहि 'काम'-नाम॥214॥ अनुवाद—यद्यपि सखियोंकी श्रीकृष्णके साथ सङ्गमकी थोड़ीसी भी इच्छा नहीं होती, तथापि श्रीराधाजी बड़े प्रयत्नके साथ उनका श्रीकृष्णसे सङ्गम करा ही देती हैं। श्रीराधाजी अनेक प्रकारके छल, चतुरायी, युक्तियोंसे उन्हें श्रीकृष्णके पास भेजती हैं। श्रीराधाजीको भी अपने सङ्गम-सुखसे जितना आनन्द होता है, उससे भी करोड़ों गुणा अधिक सखियोंको श्रीकृष्णसे मिलानेमें प्रसन्नता होती है। राधाजी और सखियोंका एक दूसरेके प्रति विशुद्ध प्रेम रसका निरन्तर पोषण करता रहता है। इनके परस्पर प्रेमकी परिपाटीको देखकर श्रीकृष्ण बड़े सन्तुष्ट होते हैं। गोपियोंका श्रीकृष्णप्रेम सहज-स्वाभाविक है, इसमें प्राकृत कामकी लेशमात्र गन्ध भी नहीं है। लौकिक कामक्रीड़ाके समान प्रतीत होनेके कारण ही इस प्रेमको 'काम' कहा गया है॥211-214॥ अनुभाष्य—'अन्योन्थे'—परस्पर। श्रीराधिका और उनकी सखियाँ अपने-अपने सुखकी अभिलाषामें किसी प्रकारसे चेष्टाशीला न होकर एक-दूसरेके द्वारा श्रीकृष्ण सेवा करवाकर प्रेमको पुष्ट कराती है, उसको देखकर श्रीकृष्ण सन्तुष्ट होते हैं॥213॥ अमृतानुकणिका—'प्रेम विलास विवर्त्त'के विषयमें श्रवण करके महाप्रभुने सन्तोष व्यक्त किया कि साध्य वस्तुकी अवधि यही है, अब आप इसे प्राप्त करनेका साधन बताइये। तब श्रीरायने कहा—'साधनकी कथा अत्यन्त रहस्यपूर्ण है। सखियोंके अतिरिक्त श्रीराधाकृष्णकी लीलामें किसीका अधिकार नहीं है। क्योंकि वे श्रीराधाकी समतजातीय हैं, उनकी भावनाओंको समझती हैं, उन्हींके समान महाभाव-स्वरूपा है तथा प्रेम और सेवाकी परिपाटीमें सुदक्ष हैं। वे ही अभिसार करवाना, शृङ्गार रचना, संवाद भेजना आदि लीला-विस्तारक सेवाओंमें कुशल हैं। वे श्रीराधा और श्रीकृष्ण—दोनोंकी ही परम विश्वासपात्री हैं। श्रीराधाकृष्णकी कुञ्जलीलाओंमें उन्हींका आश्रय ग्रहण करके प्रवेश सम्भव है। कुञ्ज-सेवा प्राप्तिका लोभ और रसिक वैष्णवोंका सङ्ग ही इसका हेतु है। परन्तु जो अभी जड़देहमें आबद्ध हैं, उन्हें मनके द्वारा भी कदापि ऐसा विचार या आचरण नहीं करना चाहियें। समुद्र-मन्थनसे उत्पन्न विषका पान केवल श्रीरुद्र ही कर सकते हैं, अन्य कोई करे तो वह निश्चय ही विनाश को प्राप्त होगा। श्रीराधाकृष्णकी लीलाएँ चिन्मय एवं विशुद्ध हैं। सम्पूर्ण रूपसे स्थूल देहगत सुखोंसे अपरिचित होकर इनमें प्रवेश प्राप्त होगा, अन्यथा जीव अधःपतित होकर नरकगामी हो जाता है। गोविन्दलीलामृत (10/17)—'विभुरपि सुखस्वरूप' —सर्वव्यापी ईश्वर जिस प्रकार निज चिदैश्वर्यके बिना पूर्ण नहीं होते, उसी प्रकार अति महान स्वप्रकाश और सुख स्वरूप अर्थात् अनन्त होनेपर भी श्रीराधाकृष्णका भाव सखियोंके बिना क्षणमात्रके लिए भी रसयुक्त नहीं हो सकता। कौन ऐसा रसिक व्यक्ति होगा जो परम रसिक-रसज्ञ गोपियोंका आश्रय ग्रहण नहीं करेगा, 312 ।