भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1146, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1146

[ 8/165-179 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (2) नववयसा अथवा किशोरी, (3) चपलाङ्गा, अर्थात् चञ्चल कटाक्षवाली हैं, (4) उज्ज्वलस्मिता, अर्थात् उज्ज्वल मृदुमधुर हास्यकारिणी हैं, (5) सुन्दर सौभाग्यको सूचित करनेवाली रेखाओंसे युक्त अथवा पादादि स्थित चन्द्ररेखा, और (6) गन्धोन्मादितमाधवा, अर्थात् अपनी अङ्गगन्धसे श्रीकृष्णको भी उन्मत्त करनेवाली हैं। (ख) उक्तिस्थ गुण तीन हैं— (1) सङ्गीतप्रसराभिज्ञा, अर्थात् सङ्गीतविद्यामें पारदर्शी, (2) रम्यवाक्, अर्थात् मृदुभाषा बोलनेवाली, और (3) नर्मपण्डिता, अर्थात् परिहास करनेमें पटु। (ग) मनस्थ गुण दस हैं— (1) विनिता, (2) करुणापूर्णा, अर्थात् दयालु, (3) विदग्धा, अर्थात् रसविषयमें अत्यन्त चतुर हैं, (4) पाटवान्विता, अर्थात् रसविषयमें अत्यन्त चतुरा हैं, (5) लज्जाशीला अथवा आभिजात्य और शीलता आदिका कारण, (6) मर्यादा अथवा साधुमार्गसे अविचलित रहनेवाली, (7) धैर्यशालिनी अथवा दुःख सहनेमें समर्थ, (8) गाम्भीर्यशालिनी, (9) सुविलासा, अर्थात् सुविलासप्रिया हैं, और (10) महाभाव-परमोत्कर्ष-तर्षिणी अर्थात् महाभावके परमोत्कर्षको प्रकट करनेमें परम व्यग्र रहती हैं। (घ) परसम्बन्ध गुण छह हैं— (1) गोकुलप्रेमवसति, अर्थात् उनको देखते ही गोकुलवासियोंके हृदयमें प्रेम उमड़ पड़ता है, (2) जगत्-श्रेणी लसद्यशा, अर्थात् अखिल ब्रह्माण्डमें उनकी कीर्ति व्याप्त है, (3) गुर्वर्पित-गुरुस्नेहा, अर्थात् गुरुजनोंके स्नेहकी पात्री हैं, (4) सखी-प्रणयितावशा, अर्थात् सखियोंके प्रणयके अधीन रहती हैं, (5) कृष्णप्रियावलीमुख्या, अर्थात् श्रीकृष्णकी समस्त सखियोंमें प्रधाना हैं, और (6) सन्तताश्रवकेशवा, अर्थात् केशव सदा उनकी आज्ञाके अधीन रहते हैं। प्रेमवैचित्त्य'— “प्रियस्य सन्निकर्षेऽपि प्रेमोत्कर्ष-स्वभावतः। या विश्लेषधियार्त्तिस्तत् प्रेमवैचित्त्यमुच्यते॥” अत्यधिक प्रेमके स्वभावके कारण प्रियके निकट होनेपर भी उनसे वियोग होनेके भयसे जिस क्लेशकी (आर्त्तिकी) उत्पत्ति होती है, वही 'प्रेमवैचित्त्य' है; वही रत्न है। 'तरल'–हारके बीच स्थित मणि, धुकधुकी। मध्यवयस किशोरीभाव ही सखीके कन्धेपर हाथ रखना है और निकटमें स्थित सखियाँ–श्रीकृष्णलीलाकी मनोवृत्तिरूपा हैं। 'निजाङ्ग-सौरभालये'–अपने अङ्गरूपी सौरभके भवनमें। 'गर्व-पर्यङ्क'–गर्वरूपी पलङ्ग अथवा खाटपर। 'अवतंस'–कानके विशेष अलङ्कार; श्रीकृष्ण नाम-गुण-यश ही उनके कानोंके अलङ्कार हैं। श्रीकृष्णनाम-गुण-यशकी वाक्यावलीका स्त्रोत (प्रवाह) ही श्यामरस-मधु-धारा है; श्रीमती राधिका वही श्रीकृष्णको पान कराती हैं। श्रीराधा ही श्रीकृष्णका प्रणय विकार अर्थात् श्रीकृष्णप्रेमकी मूर्त्तिविग्रह अर्थात् उनके मानसिक भाव, कायिक अङ्ग-प्रत्यङ्ग, वेषादि, समस्त ही श्रीकृष्णप्रेमकी एक-एक शोभा अथवा भूषण हैं–उसको विश्लेषण करके यहाँ दिखला रहे हैं॥165-179॥ अमृतानुकणिका–“'कारुण्यामृत-धाराय स्नान प्रथम'। बाल्यकालमें चपलता रहती है। धीरे-धीरे पौगण्ड भाव 298 ।