श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1147, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय 8/166-174 ] आनेपर श्रीराधाके अङ्ग थोड़े-से स्थूल होने लगे और सुन्दरता आदि वर्धित होने लगी। उसके बाद वय-सन्धि अर्थात् प्रथम कैशोरमें शरीरकी जो चञ्चलता थी, वह आँखों में आ गयी। वय-सन्धिमें पहले यह पूर्वराग होता है। भागवतमें मिलनेके पूर्व पूर्वरागका वर्णन है। पूर्व-रागमें श्रीकृष्णके दर्शनके लिये उनमें अत्यन्त व्याकुलता, आतुरता, उत्कण्ठा जाग्रत होती है जिसके द्वारा उनमें करुणा आ जाती है। इस करुणाके लिये ही कहा है कि वे करुणाकी धारामें पहली बार स्नान करती हैं। श्रीकृष्णके प्रति श्रीराधाका स्नेह, अनुराग, उत्कण्ठा, लालसा आदि जिसमें किञ्चित् रूपसे प्रेम प्रकाशित हो जाता है, यही उनका प्रथम स्नान है। 'तारुण्यामृत धाराय स्नान मध्यम', इसका प्रकाश मध्य कैशोर अवस्थामें होता है। इसमें अङ्गोंमें सुकुमारता, सौन्दर्य, माधुर्य आदिका विकास होता है। नवयौवन रूप तारुण्यधारामें युगल मिलन होता है। कुञ्जोंमें केलि-महोत्सव, रासलीला आदिका आरम्भ इसीमें होता है। 'लावण्यामृत धाराय तदुपरि स्नान'-मुक्ताओँके भीतरसे जिस प्रकार स्वाभाविक रूपसे निर्मल-कान्ति बाहरमें प्रकाशित होती है, उसी प्रकार अङ्ग-प्रत्यङ्गोंसे अतिस्वच्छतापूर्वक स्वाभाविक प्रतिक्षण उदीयमान कान्तिकदम्बको लावण्य कहते हैं। श्रीकृष्णके द्वारा प्राप्त लावण्यमें स्नान करनेसे श्रीराधाके समस्त अङ्ग अत्यन्त लावण्यमय हो जाते हैं। उस समय श्रीकृष्ण उन्हें देखकर अत्यन्त मुग्ध हो जाते हैं। यह शेष कैशोर और पूर्ण यौवनकी दशामें प्रकाशित होता है। इसी अवस्थामें श्रीकृष्ण श्रीराधाके प्रेमका आस्वादनकर आनन्दित होते हैं। एक समय कृष्ण मिलन हेतु उपस्थित हुए। वहाँ उन्होंने देखा कि सम्पूर्ण वन पीत-आभासे सुशोभित है; समस्त तरुलता सुवर्ण रङ्गके हैं। वे अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर सोचने लगे कि 'यह क्या है? किसकी आभासे ये सम्पूर्ण वन सुवर्ण आभाका हो गया! मैं विश्वको आनन्दित करता हूँ। किन्तु मुझे आनन्द प्रदान करनेवाली यह कौन है?' तब उन्होंने अत्यन्त आनन्दित होकर जाना कि यह सब श्रीराधाकी अङ्गकान्तिका प्रभाव है। श्रीराधाकी आयु, रूप और लावण्य ही उनका तीन प्रकारका स्नानजल है। प्रत्येक अवस्थामें वे परमसुन्दरी नवनवायमान सौन्दर्यको धारण करती हुई विराजमान होती हैं। स्नानके पश्चात् वस्त्र धारण किये जाते हैं। परिधान दो प्रकारके होते हैं—अधोवस्त्र और उत्तरीय। अधोवस्त्र लज्जा निवारण करनेवाली श्यामवर्णकी रेशमी साड़ी है तथा उत्तरीय वस्त्र श्रीकृष्ण-अनुरागरूपी लालवर्णका है। श्रीराधा प्रणय-मान कञ्चुलिकाके द्वारा अपने वक्षस्थलका आच्छादन करती हैं। 'प्रणय' अर्थात् प्रगाढ़ विश्वास। इस अवस्थामें प्रियतम प्रेयसीके वशीभूत हो जाता है, अर्थात् नायिका स्वाधीनभर्तृका होकर अपनी सेवाके लिये भी आदेश देती है, जैसे—मेरी वेणी गूँथ दो, पाँवमें अलता लगा दो आदि। 'मान'—यह अत्यन्त उत्कृष्ट रूपमें श्रीराधाकृष्ण युगलको नित्य नव-नव माधुर्यका अनुभव करवाता है। कभी मान किसी हेतुसे होता है और कभी अहैतुक। एक समय श्रीराधा श्रीकृष्णके साथ वनमें विहार कर रही थीं। उस समय श्रीकृष्णके सङ्गसे उनका चित्त अत्यन्त द्रवीभूत हो रहा था। इस कारण श्रीराधाकी आँखोंसे अश्रुओँकी धाराबहने लगी। उस स्थानसे कुछ दूर गायें चर रही थीं और उनके खुरोंसे धूलि उड़ रही थी। श्रीराधा अवहित्थाके द्वारा अपने भावोंको छिपाकर कहने लगीं कि गायोंके खुरोंसे उठी धूलिके मेरे नेत्रोंमें प्रवेश करनेसे अश्रुधारा निकल रही है। श्रीकृष्णने कहा-'मैं अभी फूँककर तुम्हारे नेत्रोंको शीतल कर देता हूँ।' ऐसा कहकर श्रीकृष्ण मुखसे उनके नेत्रोंमें फूँकने लगे। श्रीराधा कहने लगीं—'आप रहने दीजिये! आपके कपट प्रेमके द्वारा मुझे क्या लाभ होगा? व्यर्थ ही कपटतापूर्ण आदरकी कोई आवश्यकता नहीं है।' ऐसा कहकर उन्होंने भृकुटी तान ली। अर्थात् मानवती हो गईं। इसमें कोई कारण नहीं है, यह अहैतुकी मान है। कुछ समय बाद अपने । 299