भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1148

[ 8/166-180 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला आप दूर हो जाता है। सहेतुक मान कारण दूर होनेपर ही दूर होता है। 'सौन्दर्य-कुङ्कुम, सखी-प्रणय-चन्दन'-श्रीराधाका अपना सौन्दर्य ही कुङ्कुम है, सखियोंका उनके प्रति प्रणय चन्दन है, स्मितकान्ति कर्पूर है-इन तीनोंका मिश्रण उनके अङ्गोंका लेप है। सखियोंके प्रणयका अर्थ श्रीराधाका श्रीकृष्णके प्रति अनुरागको वर्धन करना है। जिस प्रकार हवाकी तरङ्गें आकर समुद्रको उद्वेलित करती हैं, उसी प्रकार श्रीराधाके महाभाव-समुद्रको सखियाँ श्रीकृष्ण-विषयक प्रसङ्गोंके द्वारा उनके प्रेम, स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, भाव, महाभाव तकको तरङ्गायित करती हैं। 'कृष्णेर-उज्ज्वल-रस-मृगमद- भर'-श्रीराधाके हृदयमें श्रीकृष्णके प्रति उन्नत-उज्जवलरस मृगमद कस्तूरी है, जो श्रीकृष्णको मदान्ध कर देता है। यही श्रीराधाका विचित्र कलेवर है। 'प्रछन्न-मान-वाम्य- धम्मिल-विन्यास'-श्रीराधा अपने कुटिल कुन्तल, घुँघराले केशोंको जूड़ेके रूपमें ऐसे बाँध देती हैं मानो श्रीकृष्णके मतवाले हाथीरूपी मनको उसमें बाँध दिया हो। "धीराधीरात्मक' गुण-अङ्गे पट्टवास'-श्रीराधा अपने धीराधीरात्मक गुणको रेशमी उत्तरीयके समान धारण करती हैं। श्रीराधा अपने धीराधीरात्मक गुणके द्वारा श्रीकृष्णको वशीभूत कर लेती हैं। रासलीलामें जब श्रीकृष्ण मन्मथ-मन्मथ रूपमें पुनः प्रकट हो गये, तब विभिन्न प्रकारकी गोपियोंने विभिन्न प्रकारसे उनका स्वागत किया, परन्तु श्रीराधा निकट न आकर दूरसे ही कुटिल-वक्र दृष्टिसे श्रीकृष्णको देखने लगीं। यह वक्र-दृष्टि वाम्य भाव है तथा यह अधीरा-नायिकाका गुण है। वे साथ ही नयनोंके द्वारा श्रीकृष्णके नवनवायमान मुखकमलके अमृतका पान भी कर रही थीं। यह धीरा नायिकाका गुण है। वे अपने इन्हीं गुणोंके द्वारा श्रीकृष्णको वशीभूतकर रसपान करवाती हैं। 'राग-ताम्बूलरागे अधर उज्ज्वल'-श्रीकृष्णके प्रति श्रीराधाका राग उनका ताम्बूल है। प्रेमकी एक विशेष अवस्था, जब प्रणयकी उत्कर्षताके कारण अत्यन्त दुःख भी अत्यन्त सुखके रूपमें अनुभूत होता है, उसे राग कहते हैं। श्रीराधा मध्याह्नकालमें सूर्यकी प्रखर किरणोंसे तप्त नुकीली शिलाओंपर खड़ी हुई श्रीकृष्णदर्शनके आनन्द-सिन्धुमें मग्न होकर सुध-बुध सम्पूर्णतः भूल गयी थीं और उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वे सुकोमल कमलदल शय्या पर खड़ी हैं। प्रेम्रकौटिल्य-नेत्रयुगले कज्ज्वल'-श्रीकृष्णके प्रति कुटिल भाव ही श्रीराधाका काजल है। रासलीलामें अन्तर्धानके पश्चात् पुनः आविर्भूत श्रीकृष्णको देखकर श्रीराधा प्रणयकोपके आवेशसे विवश होकर भृकुटि चढ़ाकर कटाक्षपात करते हुए अपने अधर दंशन करने लगीं। यहाँ भृकुटि धारण, कटाक्ष निक्षेप और अधर-दंशन- इन तीनोंके द्वारा कौटिल्यकी अभिव्यक्ति हुई है। "सुदीप्त-सात्त्विक' भाव, हर्षादि 'सञ्चारी"-महाभाव स्वरूपा होनेके कारण श्रीराधामें सभी सात्त्विक भाव सुदीप्त रूपमें प्रकाशित होते हैं। श्रीकृष्ण दर्शन, स्पर्श, आलिङ्गनसे हर्षादि सञ्चारी भाव उदित होकर उनके अङ्गोंमें सुदीप्त रूपसे प्रकाशित होते हैं। किलकञ्चित आदि भाव ही उनके अङ्गोंके भूषण हैं। 'हर्षोत्पन्न गर्व, अभिलाष, रोदन, स्मित, असूया, भय और क्रोध-इन सबके एक ही समयमें उदित सम्मिश्रणको किलकञ्चित भाव कहते हैं।' श्रीराधामें इनका उदय दानघाटी-लीलामें देखा जाता है।"-श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी॥ 166-174 ॥ श्रीराधिका ही मूर्तिमान श्रीकृष्णप्रेम-सिन्धु :- कृष्णेर विशुद्धप्रेम-रत्नेर आकर। अनुपम-गुणगण-पूर्ण कलेवर ॥ 180 ॥ अनुवाद-श्रीराधा श्रीकृष्णके विशुद्धप्रेमरूप रत्नोंकी खान हैं। इन सब अनुपम गुणोंसे श्रीराधाजीका कलेवर (शरीर) सदैव सुसज्जित रहता है॥ 180 ॥ 300 ।