भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1189, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1189

नौवाँ अध्याय 9/11-12 ] कोई 'श्रीवैष्णव' थे। महाप्रभुके दर्शनोंसे वे सब विभिन्न वैष्णव श्रीकृष्णके उपासक बन गये और श्रीकृष्णनामका कीर्त्तन करने लग गये ॥ 11-12 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'राम उपासक'—रामात् वैष्णव। 'तत्त्ववादी'—मध्वाचार्य-मतके तत्त्वको स्वीकारकर जो शुद्धद्वैतवाद स्थापित करते हैं। 'श्रीवैष्णव'—रामानुज- सम्प्रदायी वैष्णव ॥ 11 ॥ अनुभाष्य—'तत्त्ववादी'—श्रीमाध्व-वैष्णवोंको श्रीशाङ्कर- मायावादियोंसे पृथक् करनेके लिये माध्व-वैष्णवोंको 'तत्त्ववादी' कहा है। तत्त्ववादी-आचार्यगण केवलाद्वैतवादके काल्पनिक विचारोंसे पुष्ट निर्विशेष-'ब्रह्मवाद'का खण्डन करके 'भगवद्-तत्त्व' स्थापित करते हैं। 'माध्व वैष्णवगण'—ब्रह्मवैष्णव (ब्रह्म सम्प्रदायके अन्तर्भुक्त) हैं, इसलिये वे आदिगुरु ब्रह्माजीकी (दशम स्कन्धमें वर्णित) मोहित अवस्थाको स्वीकार नहीं करते, क्योंकि श्रीमन्मध्वाचार्यने स्वरचित 'भागवत-तात्पर्य' टीकामॆं इस 'ब्रह्ममोहन-लीला'का वर्णन नहीं किया है। श्रीमाध्व-वैष्णवोंमें एक प्रमुख वैष्णव श्रीमाधवेन्द्रपुरीने तत्त्ववादके चरम उद्देश्य प्रेमभक्तिका प्रचार किया। गौड़ीय-वैष्णव माध्व होनेपर भी 'तत्त्ववादी' नहीं कहलाते। 'श्रीवैष्णव'—श्रीरामानुजीय सम्प्रदायकी मूलगुरु 'लक्ष्मी' होनेके कारण उस सम्प्रदायके वैष्णव 'श्रीवैष्णव'के नामसे जाने जाते हैं। 'तत्त्ववादिगण' श्रीकृष्णके उपासक होनेपर भी और 'श्रीवैष्णवगण' श्रीलक्ष्मी-नारायणके उपासक होनेपर भी, दोनोंमें ही श्रीरामचन्द्रकी उपासनाकी प्रबलता देखी जाती है। तत्त्ववादि-सम्प्रदायके वर्तमानकालके लेखक श्रीपद्मनाभाचार्य कहते हैं,—हमारे प्रधान-प्रधान श्रीमाध्वमठोंमें श्रीराम-सीता विग्रहोंकी ही विशेष रूपसे पूजा होती है। 'अध्यात्म-रामायण'—नामक ग्रन्थके बारहसे पन्द्रह अध्यायों तकमें मूल श्रीराम-सीताकी मूर्त्तिकी कहानी इस प्रकार लिखी है—'किसी ब्राह्मणने प्रतिज्ञा की थी कि श्रीरामचन्द्रके प्रतिदिन दर्शन किये बिना वे कुछ भी नहीं खायेंगे। एक बार श्रीरामचन्द्र कार्यमें व्यस्त रहनेके कारण एक सप्ताह तक प्रजाके सामने नहीं आ सके; इसलिये राम-दर्शननिष्ठ ब्राह्मणने सात दिन तक पानीकी एक बूँद तक भी नहीं ग्रहण नहीं की। अन्तमें आठवे दिनके बाद नौंवे दिनमें ब्राह्मणने श्रीरामचन्द्रके निकट उपस्थित होकर उनके दर्शन प्राप्त किये। ब्राह्मणकी निष्ठाको सुनकर श्रीरामचन्द्रने लक्ष्मणजीको आदेश दिया कि वे अपने घरमें रखी हुई राम-सीताकी युगलमूर्ति इस वास्तविक भक्त ब्राह्मणको दे दें। ब्राह्मण लक्ष्मणजीसे दोनों श्रीविग्रहोंको प्राप्त करके अपने जीवन भर उनकी सेवा करता रहा और शरीर त्यागते समय उसने उन श्रीविग्रहोंको श्रीहनुमानको दे दिया। श्रीहनुमानने इन दोनों विग्रहोंको बहुत समय तक वक्षपर धारण करके उनकी सेवा की। बहुत समयके बाद भीमसेन गन्धमादन पर्वतपर श्रीहनुमानके पास गये। श्रीहनुमानने विदा करते समय इन दोनों विग्रहोंको भीमसेनको प्रदान किया। भीमसेनने उन्हें लाकर अपने राजमहलमें संरक्षित रखा। उस राजवंशके अन्तिम राजा 'क्षेमाकान्त'के समय तक यह दोनों विग्रह राजमहलमें ही सेवित हुए। बादमें वे उत्कल (उड़ीसा)के गजपति-राजाओंके हाथोंमें आये तथा उनके राजकोषमें संरक्षित थे। श्रीमन्मध्वाचार्यने अपने शिष्य श्रीनरहरितीर्थको राजकोषसे उन मूल रामसीता विग्रहोंको लेकर उनकी सेवा करनेकी अनुमति दी। ये रामसीताके विग्रह इक्ष्वाकु-राजाके समयसे सूर्यवंशीय राजाओंके द्वारा महलोंमें सेवित होते थे। श्रीरामचन्द्रके जन्मके पहलेसे ही दशरथ महाराज इनकी सेवा करते थे। बादमें लक्ष्मणजी जब उन श्रीविग्रहोंकी सेवा करते थे, तब उन्होंने श्रीरामचन्द्रके आदेशसे उन्हें पूर्वोक्त ब्राह्मणको अर्पित किये थे।' श्रीमन्मध्वाचार्यने अपने तिरोभावसे तीन मास सोलह दिन पहले इन दोनों विग्रहोंको प्राप्त करके उडुपी गाँवके मूल-मठ उत्तर-राढ़ी-मठमें स्थापित किया, तबसे श्रीमाध्व आचार्यगण उनके अधिकारी हैं। । 341

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