भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1190

[ 9/11-17 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

रामानुजीय-सम्प्रदायमें श्रीरामायणको गुरुके रूपमें स्वीकार करनेकी पद्धति प्रचलित है। रामानुजीय भक्त तिरुपति और अन्यान्य स्थानोंपर श्रीराममूर्तिकी पूजा करते हैं। रामानुजीय-सम्प्रदायसे उत्पन्न 'रामानन्दी', 'जमायेत्' या 'रामात्'-सम्प्रदायमें श्रीरामसीताकी उपासना प्रबलरूपसे प्रतिष्ठित हैं। रामानुजीय भक्त श्रीकृष्णकी अपेक्षा श्रीरामके अधिक अनुगत हैं॥11॥ मार्गपर चलते हुए महाप्रभुके द्वारा गान :- राम ! राघव ! राम ! राघव ! राम ! राघव ! पाहि माम्। कृष्ण ! केशव ! कृष्ण ! केशव ! कृष्ण ! केशव ! रक्ष माम्॥13॥ गोमती गङ्गा :- एइ श्लोक पथे पड़ि' करिला प्रयाण। गौतमी-गङ्गाय याइ' कैल गङ्गास्नान॥14॥ अनुवाद— महाप्रभु मार्गमें यह गान करते चल रहे थे—'हे राम! हे राघव! आप मेरा पालन कीजिये। हे कृष्ण! हे केशव! आप मेरी रक्षा कीजिये।' चलते-चलते महाप्रभु गौतमी-गङ्गा पहुँचे और उन्होंने वहाँ स्नान किया॥13-14॥ अमृतप्रवाह भाष्य— श्रील कविराज गोस्वामीने जिस तीर्थ दर्शनका वर्णन किया है, उसमें भौगोलिक क्रम नहीं है, यह उन्होंने स्वयं भी स्वीकार किया है। गोविन्ददास-कृत कड़चेमें (?) जो क्रम प्राप्त होता है, उसकी भौगोलिक विवरणके साथ बहुत कुछ समानता है। पाठकवर्ग उसी ग्रन्थका क्रम देखकर विचार करेंगे। गोविन्ददासके मतानुसार राजमाहेन्द्रिसे महाप्रभु त्रिमन्दे गये थे और वहाँसे दुण्डिराम तीर्थ गये। इस ग्रन्थके मतानुसार राजमाहेन्द्रिसे गौतमी-गङ्गा जाकर महाप्रभुने मल्लिकार्जुन तीर्थके लिये गमन किया॥14॥ अनुभाष्य— 'गौतमी गङ्गा'—गोदावरी नदीकी एक धारा है। राजमाहेन्द्रिके दूसरे तटपर गौतम-ऋषिका आश्रम था, इसलिये गोदावरीका नाम वहाँ गौतमी-गङ्गा है॥14॥ मल्लिकार्जुन-तीर्थमें रामदास शम्भुका दर्शन :- मल्लिकार्जुन-तीर्थे याइ' महेश देखिल। ताँहा सब लोके कृष्णनाम लओयाइल॥15॥ अनुवाद— मल्लिकार्जुन-तीर्थमें जाकर महाप्रभुने श्रीमहेशका दर्शन किया। महाप्रभुने उस तीर्थके सभी लोगोंसे श्रीकृष्णनाम कीर्तन करवाया॥15॥ अनुभाष्य— 'मल्लिकार्जुन'—श्रीशैलम्; यह कर्णूलसे सत्तर मील दूर कृष्णा नदीके दक्षिण तटपर अवस्थित है। घिरी हुई चारदीवारीके केन्द्रमें प्रधानदेवता 'मल्लिकार्जुन' शिवका मन्दिर है। यह ज्योतिर्लिङ्गोंमें एक प्रसिद्ध शिवलिङ्ग है (कर्णुल म्यानुयेल)॥15॥ अहोबल नृसिंहका दर्शन :- रामदास महादेवे करिल दरशन। अहोबल-नृसिंहरे करिला गमन॥16॥ अनुवाद— रामदास महादेवके दर्शन करके महाप्रभु अहोबल-नृसिंहदेवके दर्शनके लिये गये॥16॥ अनुभाष्य— 'अहोबल-नृसिंह'—मध्यलीला 1/106 देखें॥16॥ सिद्धवटमें श्रीराम और सीताके विग्रहोंका दर्शन :- नृसिंह देखिया ताँरे कैल नति-स्तुति। सिद्धवट गेला याँहा मूर्ति सीतापत्ति॥17॥ अनुवाद— महाप्रभुने नृसिंह भगवान्के दर्शन करके उनको प्रणाम और स्तुति की। वहाँसे वे सिद्धवट पहुँचे, जहाँ सीतापति श्रीरामचन्द्रका विग्रह विराजमान है॥17॥ अनुभाष्य— 'सिद्धवट'—कुडापा नगरके दस मील पूर्वमें स्थित है। यह स्थान 'सिधौट'—नामसे और पहले किसी समय 'दक्षिण-काशी'के नामसे भी प्रसिद्ध था। 'आश्रम-वटवृक्ष'से इस नाम 'सिद्धवट'की उत्पत्ति हुई है (कुडापा म्यानुयेल)॥17॥

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