भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1191

नौवाँ अध्याय 9/18-28 ] वहाँ रामसेवक एक वैष्णव ब्राह्मणके द्वारा महाप्रभुको भिक्षा प्रदान :- रघुनाथ देखि' कैल प्रणति स्तवन। ताँहा एक विप्र प्रभुर कैल निमन्त्रण॥ 18॥ सेइ विप्र रामनाम निरन्तर लय। 'राम' 'राम' बिना अन्य वाणी ना कहय॥ 19॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीरघुनाथजीके दर्शन करके उन्हें प्रणामकर उनकी स्तव-स्तुति की। वहाँ एक ब्राह्मणने महाप्रभुको भोजनके लिये निमन्त्रण दिया। वह ब्राह्मण निरन्तर रामनामका जप किया करता था। 'राम' 'राम'के अतिरिक्त वह मुखसे कुछ भी नहीं बोलता था॥ 18-19॥ उसके घरमें एक दिन वास और उसपर कृपा :- सेइ दिन ताँर घरे रहि' भिक्षा करि'। ताँरे कृपा करि' आगे चलिला गौरहरि॥ 20॥ अनुवाद—उस दिन महाप्रभु उस ब्राह्मणके घरमें रहे और भिक्षा ग्रहण की। उसपर कृपा करके महाप्रभु आगे यात्रापर चल पड़े॥ 20॥ स्कन्दक्षेत्रमें स्कन्द और त्रिमठमें वामन-विग्रहका दर्शन :- स्कन्दक्षेत्र-तीर्थे कैल स्कन्द-दरशन। त्रिमठ आइला ताँहा देखि' त्रिविक्रम॥ 21॥ अनुवाद—स्कन्दक्षेत्र-तीर्थमें आकर महाप्रभुने स्कन्द (कार्तिकेय)का दर्शन किया। फिर त्रिमठमें आकर उन्होंने श्रीत्रिविक्रम (वामन भगवान्)का दर्शन किया॥21॥ अनुभाष्य—'स्कन्द'—कार्तिकेय। यह तीर्थ हैदराबादमें है॥ 21॥ पूर्वोक्त ब्राह्मणका रामनामके बदले कृष्णनाम ग्रहण :- पुनः सिद्धवट आइला सेइ विप्र-घरे। सेइ विप्र कृष्णनाम लय निरन्तरे॥ 22॥ अनुवाद—त्रिमठसे महाप्रभु पुनः सिद्धवटमें उसी ब्राह्मणके घर लौटकर आये। तब वह ब्राह्मण निरन्तर कृष्णनामका जप कर रहा था॥ 22॥ महाप्रभुके प्रश्न और विप्रका उत्तर :- भिक्षा करि' महाप्रभु ताँरे प्रश्न कैल। “कह विप्र, एइ तोमार कोन् दशा हैल ? ॥ 23 ॥ पूर्वे तुमि निरन्तर लैते रामनाम। एबे केने निरन्तर लओ कृष्णनाम ॥” 24 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने उस ब्राह्मणके घर भिक्षा ग्रहण करनेके बाद उससे पूछा,—“हे ब्राह्मण ! कहो तुम्हारी यह दशा कैसे हुई? पहले तो तुम निरन्तर रामनामका जाप करते थे, अब क्यों निरन्तर कृष्णनामका कीर्तन कर रहे हो? ॥” 23-24 ॥ विप्र बोले,—“एइ तोमार दर्शन-प्रभाव। तोमा देखि' गेल मोर आजन्म-स्वभाव ॥ 25 ॥ बाल्यावधि रामनाम-ग्रहण आमार। तोमा देखि' कृष्णनाम आइल एकबार ॥ 26 ॥ सेइ हैते कृष्णनाम जिह्वाते बसिला। कृष्णनाम स्फुरे, रामनाम दूरे गेला ॥ 27 ॥ बाल्यकाल हैते मोर स्वभाव एक हय। नामेर महिमा-शास्त्र करिये सञ्चय ॥ 28 ॥ अनुवाद—उस ब्राह्मणने उत्तर दिया,—“यह आपके दर्शनका प्रभाव है। आपके दर्शनसे मेरा आजन्म-स्वभाव चला गया। मैं बाल्यकालसे ही श्रीरामनाम करता था, परन्तु आपके दर्शनसे मेरे मुखमें एकबार श्रीकृष्णनाम उदित हुआ। तभीसे श्रीकृष्णनाम मेरी जिह्वापर बैठ गया और अब जिह्वापर श्रीकृष्णनाम ही स्फुरित होता है और श्रीरामनाम दूर चला गया। बाल्यकालसे मेरा एक स्वभाव है कि मैं शास्त्रोंसे नामकी महिमाको संग्रह करता आया हूँ॥ 23-28 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जन्मसे ही जो श्रीरामनाम-जप । 343