श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 9/25-33 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला करनेका स्वभाव था, वह परिवर्तित होकर श्रीकृष्णनाम-जपका स्वभाव हो गया ॥ 25 ॥ 'राम'-शब्दका व्युत्पत्तिगत अर्थ :- (पद्मपुराणमें श्रीरामचन्द्र शतनामस्तोत्रका आठवाँ श्लोक) - रमन्ते योगिनोऽनन्ते सत्यानन्दे चिदात्मनि। इति रामपदेनासौ परं ब्रह्माभिधीयते ॥ 29 ॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 29 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अनन्त सत्यानन्द-चिदात्मस्वरूप परमतत्त्वमें सभी योगी रमण (आनन्द प्राप्त) करते हैं। इसलिये परमब्रह्म-वस्तुको रामनामसे कहा जाता है॥29॥ अनुभाष्य- योगिनः (विषयनिवृत्ताः) अनन्ते (जड़ातीते) सत्यानन्दे चिदात्मनि (सच्चिदानन्दे) रमन्ते। इति [अतः] रामपदेन असौ (रामचन्द्रः) परं ब्रह्म अभिधीयते (कथ्यते)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 29 ॥ 'कृष्ण'-शब्दका व्युत्पत्तिगत अर्थ :- श्रीधरस्वामी-उद्धृत महाभारतमें उः पः (71/4)- कृषिर्भूवाचकः शब्दो णश्च निर्वृतिवाचकः। तयोरैक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते ॥ 30 ॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 30 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'कृष-धातु'-भू अर्थात् आकर्षक सत्त्वा-वाचक है; ण-शब्द निवृत्ति अर्थात् परमानन्द-वाचक है। कृष-धातुमें ण-प्रत्यय लगानेसे उन दोनोंके एक होनेपर 'कृष्ण'-शब्दसे परमब्रह्म प्रतिपादित हुए हैं॥30॥ अनुभाष्य- कृषिः-शब्दः भूः-वाचकः (सत्ता-निर्धारकः) णश्च निर्वृत्ति-वाचकः (आनन्दाभिधः); तयोः (द्वयोः) ऐक्यं कृष्णः परं ब्रह्म इति अभिधीयते (कथ्यते)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 30 ॥ रामनाम और कृष्णनामका लीलागत वैचित्र्य :- परंब्रह्म दुइनाम समान हइल। पुनः आर शास्त्रे किछु विशेष पाइल ॥ 31 ॥ अनुवाद - अनुभाष्य देखें ॥ 31 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-पूर्वोक्त दो श्लोकोंका तात्पर्य लेनेपर, राम और कृष्ण नाममें परमब्रह्म समान अर्थवाले हैं, तथापि शास्त्रोंमें और भी कुछ कहा गया है, उसे बादमें कहा जा रहा है ॥ 31 ॥ अनुभाष्य- 'राम' और 'कृष्ण', ये दोनों नाम ही परब्रह्मके हैं। उनमें समानता वर्तमान है। परन्तु शास्त्रोंमें इन दोनों नाम-परब्रह्मके रस-तारतम्यके वैशिष्ट्यका अनुसन्धान करनेपर एक विशेष बात समझमें आती है॥31॥ सहस्र विष्णुनामके समान एक रामनाम :- पद्मपुराणमें श्रीरामचन्द्र शतनामस्तोत्र 9वाँ श्लोक, उत्तरखण्डमें श्रीविष्णु सहस्रनाम-स्तोत्रमें (72/335)- राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे। सहस्रनामभिस्तुल्यं रामनाम वरानने ॥ 32 ॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 32 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'राम' 'राम' 'राम' कहकर मनोरम जो राम हैं, मैं उनमें रमण (आनन्द प्राप्त) करता हूँ। हे वरानने (सुन्दरी), एक राम-नाम सहस्र विष्णुनामोंके तुल्य है ॥ 32 ॥ अनुभाष्य- हे वरानने, अहं राम रामेति रामेति सङ्कीर्त्त्य मनोरमे (मनोहरे) रामे रमे (आनन्दं प्राप्नोमि)। [एकं] राम-नाम सहस्रनामभिः (विष्णुसहस्रनामभिः) तुल्यम्। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 32 ॥ तीन बार रामनामके समान एक कृष्णनाम :- (ब्रह्माण्डपुराणका वचन)- सहस्रनाम्नां पुण्यानां त्रिरावृत्त्या तु यत्फलम्। एकावृत्त्या तु कृष्णस्य नामैकं तत् प्रयच्छति ॥ 33 ॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 33 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- (विष्णुके) पवित्र सहस्रनामोंका तीनबार पाठ करनेसे जो फल होता है, कृष्णनाम एक 344 ।