श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबार उच्चारित होनेसे ही वही फल देते हैं। तात्पर्य यह है कि एक रामनाम सहस्र विष्णुनामके समान है। इसलिये तीन बार रामनामका फल एक बार कृष्णनामसे ही प्राप्त होता है॥ 33 ॥ अनुभाष्य- पुण्याणां (पवित्राणां) सहस्रनाम्नां (विष्णुसहस्रनाम्नां) त्रिरावृत्त्या (वारत्रयपठनेन) यत् फलं प्राप्नोति, कृष्णस्य एकं नामं एकवृत्त्या (सकृत्तदुच्चारणेन) तत् फलं तु प्रयच्छति (ददाति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 33 ॥ श्रीकृष्णनामका सर्वश्रेष्ठ माहात्म्य :- एइ वाक्ये कृष्णनामेर महिमा अपार। तथापि लइते नारि, शुन हेतु तार ॥ 34 ॥ ब्राह्मणके द्वारा पहले श्रीकृष्णनाम नहीं लेनेका हेतु :- इष्टदेव राम, ताँर नामे सुख पाइ। सुख पाञा रामनाम रात्रिदिन गाइ ॥ 35 ॥ श्रीकृष्णविग्रह ही श्रीकृष्णनाम प्रदान करनेमें समर्थ होनेके कारण ब्राह्मणका महाप्रभुमें श्रीकृष्ण-ज्ञान :- तोमार दर्शने यबे कृष्णनाम आइल। ताहार महिमा तबे हृदये लागिल ॥ 36 ॥ सेइ कृष्ण तुमि-इहा साक्षात् निर्धारिल।” एत कहि' विप्र प्रभुर चरणे पड़िल ॥ 37 ॥ अनुवाद-यद्यपि इस श्लोकमें कहा गया है कि श्रीकृष्णनामकी महिमा अपार है, तथापि मैं श्रीकृष्णनाम नहीं लेता था, इसका कारण सुनिये। मेरे इष्टदेव श्रीरामचन्द्र हैं और उनके नामके कीर्तनसे मुझे बहुत आनन्द मिलता था। इसलिये मैं रात-दिन श्रीरामनामका कीर्तन करते हुए आनन्द प्राप्त करता था। परन्तु आपके दर्शन करके जब मेरी मुखमें श्रीकृष्णनाम स्फुरित हुआ, तभीसे मेरे हृदयमें श्रीकृष्णनामकी महिमा प्रकाशित हुई। आप ही वे श्रीकृष्ण हैं, यह मुझे साक्षात् अनुभव हुआ है।” यह कहकर ब्राह्मण महाप्रभुके चरणोंमें गिर पड़ा॥ 34-37 ॥ वृद्धकाशीमें शम्भुका दर्शन :- ताँरे कृपा करि' प्रभु चलिला आर दिने। वृद्धकाशी आसिं' कैल शिव-दरशने ॥ 38 ॥ अनुवाद-उस ब्राह्मणपर कृपा करके महाप्रभु अगले दिन वहाँसे चले गये और वृद्धकाशीमें आकर उन्होंने शिवजीका दर्शन किया॥ 38 ॥ अनुभाष्य- 'वृद्धकाशी'- वर्तमान नाम 'वृद्धाचलम्' है। यह दक्षिण आर्कट-जिलेकी भेलार-नदीकी एक उपनदी 'मणिमुख'के तटपर अविस्थित है। पहले इसका नाम 'वृद्धकाशी' था (दक्षिण-आर्कट म्यानुयेल)। कोई-कोई 'कालहस्तिपुर'को वृद्धकाशी कहते हैं। श्रीरामानुजाचार्यके मौसेरे भाई गोविन्दने इन्हीं शिवकी बहुत दिनों तक सेवा की थी॥ 38 ॥ उसके बाद अन्य ग्राममें वास और महाप्रभुके दर्शनोंके लिये बहुतसे लोगोंका आना :- ताँहा हैते चलि' आगे गेला एक ग्रामे। ब्राह्मण-समाज ताँहा, करिल विश्रामे ॥ 39 ॥ प्रभुर प्रभावे लोक आइल दरशने। लक्षार्बुद लोक आइसे ना याय गणने ॥ 40 ॥ अनुवाद-महाप्रभु वृद्धकाशीसे आगे चले। एक ग्राममें उन्होंने देखा कि अधिकांश व्यक्ति ब्राह्मण थे, तब महाप्रभुने उस स्थानपर ही विश्राम किया। महाप्रभुके प्रभावसे लाखों-लाखों लोग उनके दर्शनके लिये आने लगे। जितने लोग आये उनकी गणना नहीं की जा सकती॥ 39-40 ॥ महाप्रभुके दर्शनोंसे सभीको वैष्णवताकी प्राप्ति :- गोसाञिर सौन्दर्य देखि' ताते प्रेमावेश। सबे 'कृष्ण' कहे, 'वैष्णव' हैल सर्वदेश ॥ 41 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके सौन्दर्यको और उसके ऊपर उनके प्रेमके आवेशको देखकर सभी 'कृष्ण' नामका कीर्तन करने लगे। इस प्रकार वहाँके सब देशवासी वैष्णव बन गये ॥ 41 ॥ । 345