भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1194

[ 9/42-48 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला महाप्रभुके द्वारा समस्त मतवादियोंके विचारोंका खण्डन :— तार्किक-मीमांसक, यत मायावादिगण। सांख्य, पातञ्जल, स्मृति, पुराण, आगम ॥ 42 ॥ निज-निज-शास्त्रोद्ग्राहे सबाइ प्रचण्ड। सर्व मत दुषि' प्रभु करे खण्ड खण्ड ॥ 43 ॥ वेदान्तके अचिन्त्यभेदाभेदरूप भक्तिसिद्धान्तकी स्थापना :— सर्वत्र स्थापय प्रभु वैष्णवसिद्धान्ते। प्रभुर सिद्धान्त केह ना पारे खण्डिते ॥ 44 ॥ महाप्रभुके अकाट्य सिद्धान्तसे पराजित व्यक्तियोंके द्वारा भक्तिसिद्धान्त-ग्रहण :— हारि' हारि' प्रभुमते करेन प्रवेश। एइमते 'वैष्णव' करिल दक्षिण देश ॥ 45 ॥ अनुवाद—वहाँ तार्किक, मीमांसक, मायावादी, सांख्यक, पातञ्जल-योगी, स्मृति, पुराण और आगम शास्त्रोंको माननेवाले बड़े-बड़े पण्डित लोग थे, वे सभी अपने-अपने शास्त्रोंके प्रमाण देकर अपने मतको स्थापित करनेमें प्रवीण थे। महाप्रभुने उन सबके मतोंके दोषोंको दिखलाकर उन सभीके सिद्धान्तोंको खण्ड-खण्ड करके सर्वत्र वैष्णव सिद्धान्तको स्थापित किया, परन्तु कोई भी महाप्रभुके सिद्धान्तका खण्डन न कर सका। पराजय स्वीकार करके सभी दार्शनिकोंने महाप्रभुके मतमें प्रवेश किया। इस प्रकार महाप्रभुने दक्षिण-भारतको वैष्णव बना दिया॥ 42-45 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'तार्किक'—गौतमीय नैयायिक और कणादीय वैशेषिक। 'मीमांसक'—जैमिनी-मतके स्थापक। 'मायावादी'—शङ्करके मतके स्थापक। 'सांख्य'—कपिल-मत। 'पातञ्जल'—योगशास्त्र। 'स्मृति'—मन्वादि आदि बीस धर्मशास्त्रीय संहिता। 'पुराण'—अठारह महापुराण और अठारह उपपुराण। 'आगम'—तन्त्रशास्त्र। 'शास्त्रोद्ग्राहे'—शास्त्र-संस्थापन करनेमें। 'प्रभुर सिद्धान्त', 'एइमते'—महाप्रभुका मत अर्थात् वेद, वेदान्त और ब्रह्मसूत्रके द्वारा स्थापित अचिन्त्यभेदाभेद-सिद्धान्त॥ 42-45 ॥ पाखण्डी बौद्धाचार्यका अपने शिष्योंके साथ आगमन :— पाषण्डी आइल यत पाण्डित्य शुनिया। गर्व करि' आइल सङ्गे शिष्यगण लञा ॥ 46 ॥ अनुवाद—जब पाखण्डी (बौद्धाचार्य)ने महाप्रभुके पाण्डित्यके विषयमें सुना, तो अपनी विद्वताका अभिमान करते हुए वह अपने शिष्योंके साथ महाप्रभुके पास आया॥ 46 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'पाषण्डिगण'—वेद, स्मृति, दर्शन, पुराण और आगम आदि शास्त्रोंसे बहिर्भूत मतवादियोंको पाखण्डी कहा जाता है॥ 46 ॥ उसका तर्क :— बौद्धाचार्य महापण्डित विजन वनेते *। प्रभुर आगे उद्ग्राह करि' लागिला बलिते ॥ 47 ॥ *पाठान्तरमें 'निज नवमते'। अनुवाद—बौद्धाचार्य महापण्डित 'विजन वनेते' (अर्थात् एकान्तमें) महाप्रभुके पास आकर अपने सिद्धान्त स्थापित करनेके लिये तर्क करने लगा। पाठान्तरमें 'निज नवमते', अर्थात् अपने नये मत॥ 47 ॥ असम्भाष्य होनेपर भी कृपाको प्रकाशित करके उसके विचारका खण्डन :— यद्यपि असम्भाष्य बौद्ध अयुक्त देखिते। तथापि बलिला प्रभु गर्व खण्डाइते ॥ 48 ॥ अनुवाद—यद्यपि बौद्धोंसे वार्त्तालाप नहीं करना चाहिये और यहाँ तक कि उनको देखना तक नहीं चाहिये, तथापि महाप्रभुने उसके अभिमानको चूर करनेके लिये उसके साथ बातचीत की॥ 48 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'असम्भाष्य'—बातचीत करनेके योग्य नहीं, क्योंकि वे वेदविरुद्ध और भक्तिसे बहिर्मुख हैं। 'देखिते अयुक्त'—निरीश्वर बौद्धादिको देखनेपर 'सचेलं जलमाविशेत्' [वस्त्रोंसहित स्नान करना चाहिये], 346 ।