भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1195

नौवाँ अध्याय 9/48-56 ] क्योंकि (सात्वत) शास्त्र-वाक्यानुसार नास्तिक बौद्धादिका दर्शन अनुचित है ॥ 48 ॥ अश्रौतपन्थी बौद्ध-शास्त्रका विचार-युक्तिसे खण्डन :- तर्क-प्रधान बौद्धशास्त्र 'नव मते'। तर्केइ खण्डिल प्रभु, ना पारे स्थापिते ॥ 49 ॥ बौद्धाचार्य 'नव प्रश्न' सब उठाइल। दृढ़ युक्ति-तर्के प्रभु खण्ड खण्ड कैल ॥ 50 ॥ अनुवाद-बौद्धशास्त्र मुख्यतः तर्कपर आधारित हैं और इनमें नौ प्रधान सिद्धान्त हैं। महाप्रभुने तर्कके द्वारा ही उनके तर्कका खण्डन कर दिया और बौद्धाचार्य अपना मत स्थापित न कर सका। बौद्धाचार्यने अपने नौ प्रधान सिद्धान्तोंके आधारपर सब प्रश्न उठाये, परन्तु महाप्रभुने दृढ़ युक्ति और तर्कोंसे उनके समस्त विचारोंका खण्डन कर दिया ॥ 49-50 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-बौद्धमतमें 'हीनायन' और 'महायन' दो प्रकारके मार्ग है। उस मार्गपर गमन करनेके प्रस्थान-स्वरूप नौ सिद्धान्त हैं; जैसे-(1) विश्व अनादि है, इसलिये ईश्वरशून्य है, (2) जगत् असत्य है, (3) अहंतत्त्व, (4) जन्म-जन्मान्तर (पुनर्जन्म) और परलोक सत्य हैं, (5) बुद्ध ही तत्त्व-प्राप्तिका उपाय हैं, (6) निर्वाण (मुक्ति) ही परमतत्त्व है, (7) बौद्धदर्शन ही वास्तविक दर्शन है, (8) वेद मानवके द्वारा रचित हैं, (9) दया आदि सद्-धर्मका आचरण ही बौद्ध-जीवन है ॥ 49 ॥ बौद्धाचार्यकी पराजय देख लोगोंका हास्य :- दार्शनिक पण्डित सबाइ पाइल पराजय। लोके हास्य करे, बौद्ध पाइल लज्जा-भय ॥ 51 ॥ अनुवाद-सभी (पाखण्डी) दार्शनिक और पण्डित महाप्रभुसे पराजित हुए और जब लोग उनपर हँसने लगे, तब बौद्ध लोग लज्जित और भयभीत हुए ॥ 51 ॥ अनुभाष्य-'दार्शनिक पण्डित सबाइ'-उपस्थित पाखण्डी दर्शन-आचार्यगण ॥ 51 ॥ वैष्णव सिद्धान्तको श्रवणकर महाप्रभुको वैष्णव सम्प्रदायके अन्तर्गत जानकर बौद्धाचार्यका षड़यन्त्र :- प्रभुके वैष्णव जानि' बौद्ध घरे गेल। सकल बौद्ध मिलि' तबे कुमन्त्रणा कैल ॥ 52 ॥ 'महाप्रसाद'के नामपर महाप्रभुको अपवित्र अन्नके द्वारा छलनेकी चेष्टा :- अपवित्र अन्न एक थालिते भरिया। प्रभु-आगे निल 'महाप्रसाद' बलिया ॥ 53 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके विचारोंसे बौद्धलोग जान गये कि वे वैष्णव हैं। अपने मठमें जाकर सभी बौद्धोंने मिलकर षड़यन्त्र रचा। उन बौद्धोंने अपवित्र अन्नसे भरकर एक थाली लाकर महाप्रभुके आगे रख दी और कहा कि यह भगवान्का 'महाप्रसाद' है ॥ 52-53 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'अपवित्र'-वैष्णवोंके द्वारा ग्रहण करने अयोग्य ॥ 53 ॥ अनुभाष्य-अवैष्णवोंके द्वारा अर्पित नैवेद्य (भोग) कितना भी सुन्दर रूपमें क्यों ना सजाया गया हो, उसमें बिन्दुमात्र भी त्रुटि ना हो, हजार बार हजार मुखोंसे उसे 'महाप्रसाद' कहनेपर भी वास्तवमें उनमें विष्णुदास्य या चिद्-दर्शनका अभाव अर्थात् उनकी विष्णुविमुखताके कारण उस अन्नको विष्णु कभी भी ग्रहण नहीं करते। इसलिये शुद्धवैष्णवदास उसको 'अपवित्र' मानकर कभी भी उसे ग्रहण करते या खाते नहीं हैं ॥ 53 ॥ जैसा कर्म, वैसा फल :- हेनकाले महाकाय एक पक्षी आइल। ओठे करि' थालि-सह अन्न लञा गेल ॥ 54 ॥ बौद्धगणेर उपरे अन्न अमेध्य हञा। बौद्धाचार्येर माथाय थालि पड़िल बाजिया ॥ 55 ॥ पाखण्डी बौद्धकी सजा :- तेरछे पड़िल थालि, -माथा काटि' गेल। मूर्च्छित हञा आचार्य भूमिते पड़िल ॥ 56 ॥ । 347