श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 9/54-63 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—उसी समय वहाँ एक विशाल पक्षी उड़ता हुआ आया और अपनी चोंचमें अन्न-सहित थालीको उठाकर ले गया। ऊपर आकाशमें जाकर वह थाली पक्षीकी चोंचसे छूट गयी और सारा अपवित्र अन्न उन्हीं बौद्धोंके सिरपर आ गिरा और थाली बौद्धाचार्यके सिरपर गिरी, जिससे बहुत जोरका शब्द हुआ। वह थाली तिरछी होकर ऐसे बौद्धाचार्यके सिरपर आकर गिरी, जिससे उसका सिर फट गया और वह मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ा॥54-56॥
गुरुकी दशाको देखकर शिष्योंके द्वारा महाप्रभुके चरणोंमें शरणागति :- हाहाकार करि' कान्दे सब शिष्यगण। सबे आसि' प्रभु-पदे लइल शरण॥57॥ “तुमि त' ईश्वर साक्षात्, क्षम अपराध। जीयाओ आमार गुरु, करह प्रसाद॥”58॥
अनुवाद—अपने गुरुकी दशा देखकर सभी शिष्य हाहाकार करते हुए रोने लगे। तब सब आकर महाप्रभुके चरणोंकी शरण लेकर कहने लगे,–“आप तो साक्षात् भगवान् हैं, हमारे अपराध क्षमा कीजिये। कृपा करके हमारे गुरुदेवको पुनः जीवित कर दीजिये॥”57-58॥
शरणागतिके बाद महाप्रभुके द्वारा उन्हें कृष्णनाम-दान :- प्रभु कहे,–“सबे कह 'कृष्ण' 'कृष्ण' 'हरि'। गुरुकर्णे कह कृष्णनाम उच्च करि'॥59॥
महाप्रभुके मुखसे कीर्तित कृष्णनामके श्रवणसे ही अचैतन्य मायावादी जीवको चेतना एवं वैष्णवताकी प्राप्ति :- तोमा-सबार गुरु तब पाइबे चेतन।” सब बौद्ध मिलि' करे कृष्णसङ्कीर्त्तन॥60॥ गुरु-कर्णे कहे सबे 'कृष्ण' 'राम' 'हरि'। चेतन पाञा आचार्य बोले 'हरि' 'हरि'॥61॥
अनुवाद—तब महाप्रभुने उनसे कहा,–“तुम सब मिलकर 'कृष्ण' 'कृष्ण' 'हरि' आदि नामोंका कीर्तन करो। और अपने गुरुके कानमें भी उच्चस्वरसे कृष्णनाम कहो, तब तुम सबके गुरुकी चेतनता लौट आयेगी।” सभी बौद्ध मिलकर कृष्णनाम-सङ्कीर्तन करने लगे और गुरुके कानमें सब 'कृष्ण' 'राम' 'हरि' नाम सुनाने लगे। नाम सुनकर बौद्धाचार्यकी चेतना लौट आयी और वह भी 'हरि' 'हरि' बोलने लगा॥59-61॥
अनुभाष्य—'सब बौद्ध'—बौद्धगण महाप्रभुके श्रीमुखसे कृष्णनाम-दीक्षा प्राप्त करनेपर अब पहलेकी भाँति पाखण्डवत् आचरण करनेवाले बौद्ध नहीं रहे। अब उन्होंने 'वैष्णव' बनकर जीवोंके स्वरूपधर्म-विष्णुपूजाको आरम्भ किया।
गुरु ही शिष्यका उद्धार करते हैं अर्थात् वे अचैतन्य (आत्माको भूले हुए) शिष्यको चैतन्य (आत्माकी स्मृति) सम्पादन करके विष्णु-पूजाका ज्ञान प्रदान करके उसे उसमें नियुक्त करते हैं—यही 'दीक्षा' अथवा दिव्यज्ञान है।
किन्तु यहाँ देखते हैं कि अचेतन बौद्धाचार्यके पूर्व शिष्योंने ही महाप्रभुकी कृपासे कृष्णनामसे चैतन्य प्राप्त करके उन नाममात्रके गुरुके कानमें कृष्णनामका उच्चारण करके आचार्यका कार्य किया। बाहरी दृष्टिकोणसे बौद्धाचार्य गुरु थे और स्वयंको उनका शिष्य माननेवाले उनके शिष्य थे। परन्तु इस घटनाके बाद गुरु और शिष्यकी परस्पर पदवी विपरीत हो गयी। क्योंकि जो वास्तवमें श्रीकृष्णकृपासे चैतन्य-लाभ करके श्रीकृष्णनामका उच्चारण करते हैं, वे ही 'गुरु' हैं और अचैतन्य-व्यक्ति ही 'लघु' अर्थात् उनके शिष्य हैं—यही जगद्गुरु महाप्रभुकी शिक्षा है॥59-61॥
बौद्धके द्वारा महाप्रभुको श्रीकृष्ण जानकर स्तुति :- कृष्ण बलि' आचार्य प्रभुरे करेन विनय। देखिया सकल लोक हइल विस्मय॥62॥
महाप्रभुका अन्तर्धान होना :- एइरूपे कौतुक करि' शचीर नन्दन। अन्तर्धान कैल, केह ना पाय दर्शन॥63॥
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